हीरा लाल



हीरा लाल

हीरा लाल का  जन्म  इलाहाबाद   के ऊँचामंडी मुहल्ले   में १ जनवरी 1949 को  एक  सामान्य परिवार में हुआ. घरेलू परिस्थितियों  के चलते  हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने के बावजूद आगे की पढ़ाई नहीं कर सके. बहुत दिनों तक मिठाई बेच कर जीविकोपार्जन करते रहे. अभी हाल  ही में इनका पहला कविता संग्रह 'कस में  हीरा लाल' प्रकाशित हुआ है.
हीरा लाल की कवितायेँ सहज-सरल होने  के बावजूद अपने कथ्य में सघन होती हैं. इन्होने अपनी काव्य भाषा  ईजाद  की है,  बिलकुल अपनी. जो  जीवन से गहरे  जुड़ाव और तमाम जद्दोजहद से ही मिल पाती है.  दरअसल किसी किस्म की  बनावट से कोसो दूर हीरालाल कबीर की गोती के हैं और इनकी जात आदमी की हैं. इसीलिए एक  बेबाकी इनकी कविताओं में दिखायी पड़ती हैं


संपर्क: ७६, मीरा गली, दारागंज, इलाहाबाद. उत्तर प्रदेश.

गोती कबीर के    

कुछ न मिला तो  सत्तू खाऊँगा
कोई  न मिला तो अपनों से बतियाऊंगा 
आदमी को भजूंगा आदमी का ही हो जाऊँगा 

जात हमारी आदमी की है   
गोती हम कबीर के हुए.

रूको समय         

एक आदमी 
सच्चा  आदमी
सचमुच  का सच्चा आदमी
एक औरत 
सच्ची औरत
सचमुच की सच्ची औरत

दोनों उतर रहे हैं एक दूसरे की आँखों में
गहरे- बहुत गहरे इतने गहरे की
समय, रूक जाओ इस समय

ऊँगली

खुद को तराशे जाने से इंकार नहीं करते
आदमी की तरफ ऊँगली भी उठाओ तो
वह पत्थर उठा लेता है 

जिजीविषा

झरने का गिरता हुआ पानी
तोड़ देता है बड़े- बड़े शिलाखंडों का घमंड
जहाँ किसी का पाँव नहीं जमता
वहां घर बसा लेती है काई 

काई का गीत ध्यान से  सुनो  
टेक में होगा उसके 
जिजीविषा जिजीविषा


हारे हुए घोडे

दम ख़म में नहीं था जिनका कोई सानी
हार गये इसलिए की
नहीं जानते थे वे दाव पेंच युद्ध का

अभी तो बिगुल बजने हैं
अभी तो पताकाये फ़हरनी हैं
अभी तो लहू से जलानी हैं मशालें
हिम्मत नहीं हारे हैं अभी
हारे हुए घोडे


पानी

गर्म करोगे अगर फेंक देगा ढक्कन को
बन जायेगा भाप जला देगा तुम्हें
ठंडा करोगे तो हो जायेगा और सख्त
हवा में फेकोगे बन जायेगा बादल
गिराएगा बिजली
तुम्हारे महल पर
पहाड़ पर गिराओगे कर देगा रेत उनको
मिट्टी में डालोगे मिट्टी में नहीं मिलेगा
हो जायेगा भूमिगत
नदी में डालोगे बन जायेगा सैलाब

कितना भी निचोड़ोगे
थोडा सा बचा रह जायेगा कपड़ों में
पिंजरे में कैद होने वाला सुआ नहीं है
कर नहीं सकती दो टुकड़े उसे कोई तलवार

पानी के अब पाँव हो गये हैं
जाने दो उसे
गुलमोहर की जड़ों तक
युद्धरत सिपाही तक
प्यार करने वाले प्यासे होंठो तक



गणेशजी (टेम्पो)

उनके काले रंग पर मत जाइये
दूसरे को कमा कर खिलाने वाले का रंग काला ही होता है
इस देश से ले कर अमरीकी महाद्वीप तक

अपने डगमगाने में भी उन्होंने एक लय ईजाद कर ली है
कितना भी वे डगमगाते हैं
पहुंचा ही देते हैं
लोगो को उनके गंतव्य तक
चलते तो वे बहुत हैं लेकिन रह जाते हैं
एक हाट से दूसरे हाट तक ही

उनके 'शाकर' बहुत मजबूत नहीं है फिर भी वे
झेल जाते हैं रास्ते के ऊँच नीच को किसी न किसी तरह

कुली हरकारा धोबी हो या मुनीम
किसी के लिए उसके मन में भेद नहीं है
वे पों-पों चिल्लाते हैं
वे बहुत फटफटाते हैं.
झेलते हैं सर्दी-गर्मी-बरसात    नंगे बदन
फिर भी पैसा मालिक पाता है

वह दिन कब आएगा जब
लोहे की कमाई लोहा खुद खायेगा?  

 
 

टिप्पणियाँ

  1. vakai Heera Lal ji ki kavitayen ek tajgi deti hain...apne me sahaj aur saral man me baithati chali jati hain

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  2. accha jamaye hai.

    mumfordganj,alld.

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  3. bahut achhi kavitayen sahaj-saral roop main gahari abhivyakti. ye kavitayen batati hain ki yah kavi aam aadami ke pax main khada kavi hai.....sram ko samman dene vala.....badhai....

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