अमरकान्त जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार


13 मार्च 2012 का दिन इलाहाबाद के साहित्यिक इतिहास में एक अविस्मरणीय दिन के रूप में याद किया जायेगा। इसी दिन ज्ञानपीठ दिल्ली छोड़कर लेखक के शहर इलाहाबाद आया और वर्ष 2009 का ज्ञानपीठ पुरस्कार वरिष्ठ कहानीकार और हम सबके दादा अमरकान्त जी को दिया गया। इलाहाबाद संग्रहालय का ब्रजमोहन व्यास सभागार पूरी तरह खचाखच भरा हुआ था। जितने लोग सभागार में अन्दर बैठे या खड़े थे उससे कुछ ज्यादा ही लोग बाहर खड़े थे। हिन्दी साहित्य की विभूतियॉ इस यादगार पल की गवाह बनी।


नामवर सिंह, शेखर जोशी, ज्ञानपीठ के आजीवन ट्रस्टी आलोक जैन, ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया, ममता कालिया, विश्वनाथ त्रिपाठी, दूधनाथ सिंह, रविभूषण, अखिलेश, राजेन्द्र कुमार, भारत भारत भारद्वाज, हरीश चन्द्र पाण्डेय, सूर्यनारायण, प्रणय कृष्ण, वाचस्पति, सन्तोष भदौरिया, अनिता गोपेश, नीलम शंकर, सन्ध्या निवेदिता, अंशुल त्रिपाठी, सुबोध शुक्ल, कुमार अनुपम समेत हिन्दी साहित्य की कई पीढ़ियां इस यादगार पल की साक्षी बनी।


इसी दिन शाम को दैनिक जागरण की ओर से जब राजेन्द्र्र राव जी द्वारा पुनर्नवा के लिए अमरकान्त जी पर एक आलेख तुरन्त लिख कर भेजने का निर्देश मिला तब मैं ना नहीं कर सका। हॉ इसके लिए मैंने राव साहब से एक दिन की मोहलत जरूर मॉग लिया। अखबारी सीमाओं और पाठकों को ध्यान में रखते हुए मैंने एक आलेख लिखा जो दैनिक जागरण के 19 मार्च 2012 के पुनर्नवा पृष्ठ पर कुछ सम्पादन के साथ प्रकाशित हुआ है। पहली बार के पाठकों के समक्ष मैं पूरी विनम्रता के साथ मूल आलेख को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हॅू।









 

नई कहानी के आदि शिल्पी अमरकान्त




सन्तोष कुमार चतुर्वेदी



प्रख्यात आलोचक रविभूषण जी ने दिसम्बर 1997 ई0 में शेखर जोशी को पहल सम्मान दिये जाने के अवसर पर अपने एक महत्वपूर्ण व्याख्यान में कहा था कि शेखर जोशी, अमरकान्त और मार्कण्डेय की त्रयी ही नयी कहानी की वास्तविक त्रयी है। अब इस बात की सच्चाई में कोई संशय नहीं रह गया है। 13 मार्च 2010 को इलाहाबाद संग्रहालय के खचाखच भरे ब्रजमोहन व्यास सभागार में अमरकान्त जी को जब वर्ष 2009 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जा रहा था तो एक तरह से ज्ञानपीठ न केवल खुद को ही सम्मानित कर रहा था अपितु रविभूषण जी की उस बात को पुष्ट भी कर रहा था। ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया ने जब इसी अवसर पर विश्व के उत्कृष्ट कहानीकारों की सूची में चेखव, ओ हेनरी, सआदत हसन मण्टो के साथ अमरकान्त जी का नाम लिया तो किसी के चेहरे पर आपत्ति का कोई भी भाव नहीं दिखा। यही अमरकान्त जी के साहित्य और उनके लेखन की ताकत है जिसका लोहा उनके प्रबल विरोधी भी मानते हैं।

अमरकान्त जी का नाम एक ऐसा नाम है जिनके बिना साहित्य की महत्वपूर्ण विधा कहानी की कोई भी बात पूरी नहीं होती। निम्नमध्यवर्गीय जीवन के अप्रतिम कथाकार अमरकान्त जी सीधी सरल भाषा में अपने कथानक को इस प्रकार गढते हैं कि सहसा यह  विश्वास ही नहीं होता कि हम गल्प की दुनिया में विचरण कर रहे हैं बल्कि शब्द-दर-शब्द यही अहसास होता है कि हम खुद यथार्थ के सागर में गोते लगा रहे हैं। इनकी कहानी पढते हुए अक्सर यह लगता है अरे यह तो हमारी अपनी ही कहानी है या फिर लगता है कि यह हमारा खुद का ऑखों देखा कोई सच है जिसे किसी ने अत्यन्त सरल-सहज ब्दों में बयॉ कर दिया है। अमरकान्त को कहानी का सूत्र खोजना नहीं पड़ता बल्कि वह तो उन्हें आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन की छोटी छोटी घटनाओं में ही मिल जाता है। इन घटनाओं में रची-पगी कहानी कुछ ऐसी सधी हुई होती है कि कभी एक पल के लिए भी ऐसा महसूस नहीं होता कि किसी भी पात्र को बढा-चढा कर या बिना वजह प्रस्तुत किया गया है। रोंगटे खड़े कर देने वाले कथ्य को भी तटस्थ भाव से प्रस्तुत करने में तो जैसे अमरकान्त जी का कोई सानी नहीं है।

इस यशस्वी कथाकार का वास्तविक नाम श्रीराम वर्मा है जिनका जन्म एक जुलाई 1925 ई को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के भगमलपुर, नगरा गॉव में हुआ था। इण्टर की पढाई के ही दौरान छिड़े भारत छोड़ो आन्दोलन में अमरकान्त शामिल हो गये। फिर एक अन्तराल के पश्चात उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद आए और विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद रोजगार के सिलसिले में आगरा गये जहॉ पर ये ‘सैनिक’ नामक समाचार पत्र से जुड़ गये। साहित्य के प्रारंभिक बीज यहीं पड़े जब अमरकान्त जी प्रगतिशील लेखक संघ की साहित्यिक गोष्ठियों में  शामिल होने लगे। यहीं पर इन्होंने अपनी पहली कहानी ‘इण्टरव्यू’ लिखी। तदनन्तर इलाहाबाद आकर मित्र प्रकाशन की पत्रिका ‘मनोरमा’ से जुड़ गए और यहीं पर लम्बे अरसे तक काम करते रहे। इलाहाबाद में अमरकान्त के लेखन को तब एक नया मोड़ मिला जब भैरव प्रसाद गुप्त जी की ‘कहानी’ पत्रिका के ये पसन्दीदा कहानीकार बन गये। किसी नवोदित लेखक के लिए इस समय यह एक बड़ा सम्मान था। फिर अमरकान्त जी की लेखनी जो एक बार चल पड़ी तब कभी थकी-थमी नहीं। पहले कहानी संग्रह ‘जिन्दगी और जोंक’ से शुरू हुआ सफर ‘देश के लोग’, ‘मौत का नगर’, ‘मित्र मिलन तथा अन्य कहानियॉ’, ‘कुहासा’, ‘तूफान’, ‘कलाप्रेमी’, ‘एक धनी व्यक्ति का बयान’ से होते हुए ‘सुख दुख के साथ’ तक पहुॅच चुका है। कहानी के समानान्तर इनके उपन्यास लेखन का क्र्रम भी अनवरत चलता रहा। इनके ग्यारह उपन्यासों में ‘सूखा पत्ता’, ‘काले उजले दिन’, ‘बीच की दीवार’, ‘आकाशपक्षी’, ‘बिदा की रात’, और ‘इन्हीं हथियारों से’ प्रमुख है। आम तौर पर उपेक्षित समझे जाने बाल साहित्य में भी अमरकान्त ने अपने हाथ सफलतापूर्वक आजमाए। ‘नेउर भाई’, ‘बानर सेना’, ‘खूंटा में दाल है’, ‘सुग्गी चाची का गॉव’, ‘मॅगरी’, ‘झगरू लाल का फैसला’ आदि अमरकान्त जी के बेहतरीन बाल साहित्य ग्रन्थ हैं। भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के अतिरिक्त फ्रेन्च, जर्मन, रसियन, हंगेरियन, जैपेनीज आदि विश्व भाषाओं में इनकी रचनाएॅ अनुदित हो चुकी हैं। अमरकान्त जी को अब तक सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार, महात्मा गॉधी सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, उ0प्र0 हिन्दी संस्थान का साहित्य पुरस्कार, यशपाल पुरस्कार, जन संस्कृति सम्मान, मध्य प्रदेश का कीर्ति सम्मान मिल चुका है। बलिया के 1942 के स्वतन्त्रता आन्दोलन को आधार बना कर लिखे गये इनके उपन्यास ‘इन्हीं हथियारों से’ को वर्ष 2007 का प्रतिष्ठित ‘साहित्य अकादमी सम्मान’ और ‘व्यास सम्मान’ प्रदान किया गया।

अमरकान्त जी उन चुनिन्दा कहानीकारों में से एक हैं जिनके पास एक साथ एक से बढ कर एक कई बेहतरीन कहानियॉ हैं। ‘दोपहर का भोजन’, ‘डिप्टी कलक्टरी’, ‘हत्यारे’, ‘जिन्दगी और जोंक’, ‘बहादुर’, ‘फर्क’, ‘कबड्डी’, ‘मूस’, ‘छिपकली’, ‘मौत का नगर’, ‘पलाश के फूल’, से लेकर ‘बउरैया कोदो’ तक बेहतरीन कहानियों की एक असमाप्त और लम्बी फेहरिस्त है। भूख से जूझते एक परिवार की त्रासद कहानी ‘दोपहर का भोजन’ प्रकारान्तर से भारतीय निम्नमध्यमवर्गीय परिवारों की समवेत कहानी बन जाती है। ‘डिप्टी कलक्टरी’ की तैयारी करते बबुआ में पूरे घर की उम्मीदें परवान चढती है और असफलता हाथ लगने पर निराश बबुआ जो चारपाई पर चित्त लेटा हुआ है, की सांस को नियमित रूप से चलते पा कर पिता सकलदीप बाबू की खुशी का ठिकाना न रहने का प्रसंग इस तरह के परिवारों के बिडम्बना बोध को बखूबी दर्शाता है। इनकी सभी कहानियों का वर्ण्य विषय कुछ ऐसा है जो एक अरसा बीतने के बाद भी प्रासंगिक बना हुआ है। सबमें मिट्टी की एक सोंधी गन्ध मिलती है जो पाठक को सहज ही अपनी ओर खींच लेती है। लगभग सभी कहानियों में जिजीविषा की एक अदम्य लालसा मिलती है जो जीवन को सातत्यता प्रदान करने के साथ-साथ उनके जीवट को भी दर्शाती है। रोजमर्रा के जीवन के सुख, दुख, उदासी, हॅसी-मजाक को किस्सागोई के अद्भुत अन्दाज में अमरकान्त इस प्रकार पेश करते हैं कि इनकी कहानी पढते समय कहीं कोई उबन नहीं होती। बकौल नामवर सिंह ‘गॉव की विनोद वृत्ति का जितना बेहतरतीन चित्रण अमरकान्त ने किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। दरअसल उनके पास शानदार भाषा और किस्सागोई है। अमरकान्त जी के कहानी कहने के अन्दाज में हास परिहास का बोध और आख्यान की अद्भुत कला है।’ दरअसल यही कला अमरकान्त को विशिष्ट कहानीकार बनाती है। 

आमतौर पर छियासी वर्ष की उम्र में जब कोई भी लेखक आराम को ही अपना मुख्य काम समझते हुए लेखन को प्रायः अलविदा कह देता है, अमरकान्त लेखन के मोर्चे पर आज भी निरन्तर सक्रिय बने हुए हैं। ‘लहरें’ और ‘बिदा की रात’ के साथ-साथ पत्रकार जीवन पर आधारित एक उपन्यास लिखने की योजना में वे लगातार मशगूल हैं। यही नहीं ‘बहाव’ नामक पत्रिका के सम्पादन कार्य से भी उन्होने खुद को जोड़ रखा हैं। पत्र-पत्रिकाओं में आज भी उनकी कोई नयी नवेली कहानी पढने को मिल ही जाती है। पुरस्कार को संतोष की मंजिल नहीं अपितु चुनौती मान कर चलने वाले अमरकान्त सचमुच हिन्दी साहित्य के एक जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं जिनसे नवोदित लेखक बहुत कुछ सबक ले सकते हैं और हताशा भरे युग में आशा का संचार कर सकते हैं।



सम्पर्क:

3/1 बी, बी. के. बनर्जी मार्ग
नया कटरा, इलाहाबाद, उ0प्र0
पिनकोड- 211002



मोबाइल-09450614857


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