भरत प्रसाद








भरत प्रसाद ने आलोचना के साथ-साथ कविताएँ और कुछ कहानियां भी लिखीं हैं. ‘का गुरू’ भरत की एक नवीनतम व्यंग्परक कहानी है जिसमें उन्होंने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त दुराचारों को अपनी कहानी का विषय बनाया है. भरत खुद भी पूर्वोत्तर विश्वविद्यालय शिलांग में हिन्दी के एक प्रोफ़ेसर हैं और वे इस बुद्धिजीवी समुदाय में व्याप्त अनाचारों दुराचारों से भलीभांति अवगत हैं. किस तरह ये प्रोफ़ेसर शोध कराने के नाम पर अपनी शोध छात्राओं का शोषण करते हैं इसकी एक बानगी इस कहानी में प्रस्तुत है.










का गुरू !







आपने, उसने, हम सब ने गुरू की एक से बढ़कर एक परिभाषाएँ पढ़ी, सुनी और कंठस्थ की होंगी। मसलन गुरूर् ब्रह्मा गुरूर् विष्णु, गुरूर् देवो............। या फिर ‘गुरू, गोविन्द दोऊ ख़ड़े..........। जरा ठहरिए एक सेकेण्ड तो......... भक्त सूरदास ने भी गुरुजी पर रमकर गाया है - ‘श्री बल्लभ नख-चन्द्र छटा बिनु, सब जग माहीं अंधेरो।’ मगर वे तो हुई पुरानी बातें, गयी-बीती कहावतें। अब कहाँ ऐसे शिष्य, और कहाँ ऐसे...........? आजकल गुरु लोग बनिया हो गये हैं - रुपया गिनते हैं। दुकानदारी चमका लिए हैं - बुद्धि बेंचते हैं। चारण बन गये हैं - साकार ईश्वरों की जयघोष करते हैं । निन्नानबे नहीं, सौ प्रतिशत यकीन कीजिए मियाँ ! गुरू खिलाड़ी है, गुरू इश्कावतार है, गुरू गोटीबाज है, गुरू कामदास जी है, गुरू चामदास जी है, गुरू जामदास जी है, गुरू चाटुकार है, गुरू बुहुरुपिया है, गुरू मालामाल है, गुरू बवाल है, गुरू घंटाल है। आजकल कबीर बाबा होते तो जरुर अपनी गुरु-भक्ति पर पुनर्विचार करते और अपनी बानी में बौखला कर जरूर कहते कुछ इस तरह - ‘गुरू, कामदेव दोऊ खड़े, को सेवक को स्वामी। गुरुवा का बलिहारी जाऊँ, कामदेव बस नामी।’ संस्कृत तो आजकल मरणासन्न भाषाओं में शुमार है, वरना गुरु-महिमा का बखान यह भाषा भी कुछ कम नहीं करती। नमूना पेश-ए-खिदमत है - ‘गुरूर् गड्ढा, गुरूर् खाई, गुरूर् कुँआ महेश्वरः, गुरूर् साक्षात् अंधकारम्, अंधकाराय नमोनमः।’ भक्तवर सूरदास भी अपना क्रोध निकालने में कहाँ पीछे रहते, ब्रज की बोली में दो चार विस्फोटक पंक्तियाँ गाते ही। मगर जाने भी दीजिए। अब गुरु- महिमा का बखान खड़ी बोली में जरा इत्मीनान से, दम ले लेकर, विस्तापरपूर्वक क्यों न किया जाय ?



‘रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध कवियों की प्रौढ़ा नायिकाओं का तुलनात्मक अनुशीलन’:



भारतवर्ष के एक प्रदेश की राजधानी का विश्वविद्यालय, जिसमें साठ वर्षीय युवा प्रोफेसर नायक निहायत सम्मानित और इज्जतदार शिक्षक हैं। बाबू वैसे तो हिन्दी विभाग के बादशाह हैं- मगर उनका सिक्का (अर्थात् रूतबा) पूरी यूनिवर्सिटी में चलता है। संक्षेप में उनका भौगोलिक परिचय भी बूझ लीजिए। कद मुकम्मल 6 फीट, रंग अरहर की साबूत दाल जैसा, वजन अनुमानतः 75 किलो, सिर पर आधे चन्द्रमा की स्थायी उपस्थिति, टार्च के बल्ब की तरह अपनी जगह अथक नाचती हुई घुची-घुची आँखें, सिर के निचले किनारे-किनारे उगे हुए बाल अमावस्या की रात से भी ज्यादा घने और काले।



नायक बाबू देश के न जाने कितने नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों में ‘इक्जामिनर- हैं, एक्सपर्ट हैं, कमेटियों के मेम्बर हैं। पेपर सेटिंग के लिए अब प्रोफेसर साहब को फुर्सत नहीं, सो, पल्ला झाड़ लिया इस शुष्क परिश्रम से। बस चलता तो अपने भी विश्वविद्यालय की पेपर- सेटिंग से मुक्ति ले लेते। मगर इसका मतलब यह भी न लगा - लीजिएगा कि कापियाँ भी नहीं जाँचते। जाँचते हैं। जी-जान से जाँचते हैं, थोक के थोक जाँचते हैं, मशीन की तरह जाँचते हैं, मगर बांच कर नहीं। एकहिं- साधे सब सधे..........’ कबीर के इस दोहे के चौथाई वाक्य को नायक बाबू ने अपने जीवन का मूलमंत्र बना रखा है ; मंत्र तो और भी महान कवियों का बनाया है - मसलन तुलसीदास का, बिहारी का, रहीम का - मगर न जाने क्यों वे कबीर के दोहों के अतिरिक्तवत् आशिक हैं। कभी प्रहसन, कभी चुटकुला, कभी बुझा-बुझौवल और कभी संकेत समझाने के अर्थ में कबीर-तुलसी के दोहों का दनादन इस्तेमाल करते हैं। वे ऐसा कोई काम नहीं उठाते, जो सिर्फ एक मकसद के लिए हो। प्रोफेसर साहब बहुउद्देशीय सोच के स्वामी हैं। एक काम से एक ही मकसद सधे- उसमें कुछ मजा नहीं, कुछ रस नहीं, कोई एडवेंचर नहीं। अपने विभाग या विश्वविद्यालय के अन्य प्रोफेसर जो सामान्य तौर पर करते हैं, उसमें नायक बाबू को यकीन नहीं - मसलन टाइम-टेबिल के अनुसार निर्धारित कक्षाएँ लेना, कोर्स के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करना, अपना कोर्स एक बार तरोताजा कर फिर विद्यार्थियों को पढ़ाना इत्यादि-इत्यादि। आपके तन, मन, बुद्धि आत्मा, भावना, एहसास और भी न जाने शरीर के किस-किस जगह चंचला देवी पल्थी मारकर बैठी हुई हैं। कुछ यूँ समझिए कि आप अस्थिर चित्त के महावतार हैं। क्लास ले रहे हैं - तो मन फलाँ यूनिवर्सिटी की कापी न आने पर बावला है। छात्र कोई कठिन सवाल पूछ बैठे हैं तो चित्त अन्दर-अन्दर मारे क्रोध के उछलने लग रहा है। प्रिय छात्राएँ कुछ जानना चाह रही हैं तो निगाहें उनकी रेशमी बालों की चमक पर फिसल-फिसल जाती हैं। पत्नी-बच्चों के बीच बैठे हैं, तो अंग्रेजी डिपार्टमेन्ट में नवनियुक्त, अविवाहिता, सहायक प्रोफेसरा नयनतारा के साथ इण्टरवल में स्पेशल चाय की याद बेचैन किए हुए हैं। अब यह खुलासा करने या अनुमान लगाने की जरूरत नहीं कि चंचल चित्तधारी प्रोफेसर साहब सोते वक्त किस-किस के सपने देखते होंगे ? वैसे उनके बारे में एक अनुमान अक्सर लगाया जाता है कि नायक बाबू वह सपना देखते ही नहीं, जिसे वे पूरा न कर सकें। और यदि वे सपना देख लिए, तो उस सपने की औकात ही क्या, जो उनकी मुट्ठी में कैद न हो। होशोहवाश में, जानबूझ कर, खुली-जगी आँखों से देखे गये मनपसन्द सपने को पूरा करके ही दम लेते हैं नायक बाबू। उनके सपने भी अनोखे रंग वाले होते हैं - मसलन नैन-नक्श और मुस्कान में मोनालिसा को भी नाचीज साबित कर देने वाली नवागंतुक छात्राओं के बीच कैंटीन में पसरकर चाय-पकौड़ी काटना। पत्नी के न रहने पर छुट्टी के दिन किसी छात्रा को सुमधुर आदेश के साथ बुलाना और किचन में उसके साथ चाय उबालते हुए नाजुक-नाजुक गप्प लड़ाना। छात्रों से दरोगा टाइप दूरी बनाने में उन्हें कोई हिचक या शर्म नहीं महसूस होती थी, मगर छात्राओं से ? यहाँ ‘दूरी’ शब्द से ही मर्मान्तक पीड़ा होती थी। यहाँ वे साम्यवादी मुद्रा धारण कर लेते थे। सीने में सहृदयता की बाढ़ उमड़ने लगती थी। जी उछलने लगता कि छात्राओं को अपना प्रशंसक बनाने के लिए क्या से क्या न कर डालूँ ? उन्हें खिलाने-पिलाने, का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते थे। मार्के का रहस्य यह भी बूझ लीजिए कि ऐसी अदाओं, कलाओं और छलाओं के विशेषज्ञ प्रो. नायक विश्वविद्यालय में अकेले ही नहीं थे। विश्वविद्यालय के अन्य विभागों मसलन - राजनीति विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, दर्शनशास्त्र, अंग्रेजी साहित्य, जीव विज्ञान यहाँ तक कि गणित जैसे घनघोर शुष्क विभाग में भी ऐसे रसाचार्य सशरीर जीवित थे। और अपने-अपने अभियानों को सिद्धि की अवस्था तक पहुँचाने में सन्नद्ध थे। विश्वविद्यालय के कुछ विभागों का तो बाकायदा इतिहास ही था - रसानन्द को व्यावहारिक जीवन में उतारना। राजनीति विज्ञान विभाग पढ़ाई के लिए कम, लडा़ई-भिडा़ई के लिए अधिक विख्यात (?) था। भला दर्शनशास्त्र विभाग इस मामले में क्यों पीछे रहे ? इस विभाग के कुछ सिद्धयोगी आचार्य रस की अलौकिक अनुभूतियों का प्राणायाम सिखाते थे। ऐसी साधना में असफलता का सवाल ही नहीं। चूँकि इस प्राणायाम का शुभारंभ ‘स्पर्शमुद्रा’ से होता था, इसीलिए इसे स्पर्शयोग भी कहा जाता था। प्रो. नायक इस योग के दुर्लभ साधक थे। उनके बारे में तो यहाँ तक प्रचलित था कि स्पर्शयोग के वे साक्षात् अवतार थे। जितनी बारीकियाँ, जितने चमत्कार, जितने जादुई रहस्य इस योग में हो सकते हैं, वह सब साध चुके थे - प्रो. नायक। ‘न भूतो, न भविष्यति’ की हैसियत प्राप्त कर चुके थे - स्पर्शयोग में।



प्रो. नायक मात्र छात्राओं को ही मोक्ष का लाभ देने योग्य क्यों पाते थे, वे खुला भेद था। मोक्ष-प्राप्ति की इस यात्रा में कौन सी छात्रा सर्वाधिक उपयुक्त है - इसका चुनाव नायक महाशय खुद करते थे। भला किस छात्रा की हिम्मत थी कि ईश्वर की तरह पहुँच रखने वाले गुरुवर के प्रस्ताव को इंकार कर सके ? जिस तरह किसी भी साधना के कुछ चरण होते हैं - वैसे ही इस ‘स्पर्शयोग’ के भी चार चरण थे। पहले चरण में कोई भी शिष्या - विशुद्ध छात्रा, दूसरे चरण- प्रिय भक्त, तीसरे चरण में नायिका और चौथे चरण में ? तीसरे चरण से स्पर्शयोग की शुरुआत होती थी, जिसकी चरम परिणति चौथे चरण में होती थी। छात्रा से नायिका बन उठना इस योग का निर्णायक मोड़ मानते थे - योगी नायक। फिर तो आगे की सिद्धि में इतनी कठिनाइयाँ नहीं थी, क्योंकि अब तक छात्रा की आमूल-चूल कण्डीशनिंग हो चुकी होती थी। नायक बाबू के निर्देशन में रिसर्च करने वाले विद्यार्थियों की संख्या कुछ ज्यादा न थी, मगर उनके अण्डर में जितने भी स्कालर थे, लगभग सभी झुकते-झुकते अपनी रीढ़ की हड्डी खो चुके थे, चुप रहते-रहते गूंगे हो गये थे और जी हाँ कहते-कहते बिन पेंदी का लोटा हो चुके थे। इसमें क्या शक, कि नायक महोदय हिन्दी साहित्य के ही प्रोफेसर थे, मगर अपने प्रत्येक शोध छात्र को वे आला दर्जे का विषय सौंपते थे। चार नमूना तो देख लीजिए - ‘ब्रजभूषण बिहारी के काव्य में रस-तत्व की मीमांसा’, ‘देवदत्त के उपन्यासों में चित्रित शहरी नारी का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन’, ‘कवयित्री चित्रांगदा के प्रेमपरक गीतों में विरह की महानता’, ‘रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध कवियों की प्रौढ़ा नायिकाओं का तुलनात्मक अनुशीलन’। शोधरत छात्रों, छात्राओं और खुद नायक बाबू को भी बखूबी पता था कि ब्रजभूषण, देवदत्त या चित्रांगदा साहित्य के किस खेत की मूली हैं ? मगर शोधार्थियों को इससे क्या वास्ता कि उन्हें किस विषय पर शोध करना है? उन्हें बस डिग्री से मतलब था। टॉपिक अल्लम-गल्लम कुछ भी हाथ में थमा दो।



शोध करने वाली अपनी प्रिय छात्राओं के बीच से ही एक शिष्या देखते ही देखते प्रो. नायक की नायिका बन उठी। 24-25 के आसपास की उम्र, कद 5 फीट 6 इंच, रंग सांवला, विश्वास न कर पाने की हद तक सुन्दर और आकर्षक। तन-मन-धन से लट्टू मियाँ बन उठे प्रो. नायक। विश्वविद्यालय में छुट्टियों के दिन अपनी पत्नी को खेती-बारी की जिम्मेदारियाँ याद दिलाकर गाँव भेज देते थे। बेटा-बेटी सयाने हो चुके थे। 22 साल का बड़ा लड़का एम. बी. ए. प्रथम वर्ष में था और बीस साल की बेटी बी. एस. सी. कम्पलीट कर मेडिकल की तैयारी कर रही थी। पिछले पाँच वर्षों से मियाँ-बीबी दोनों बच्चों के बगैर अकेले रह रहे थे। आजकल बच्चों की अच्छी पढ़ाई-लिखाई अपने पास रख कर कहाँ हो पाती है ? इसीलिए प्रोफेसर साब ने जिम्मेदार पिता का प्रमाण देते हुए भेज दिया दोनों बच्चों को दूसरे शहर में। विश्वविद्यालय की ओर से न जाने कितनी बार कैम्पस में आवास का प्रस्ताव भी मिला, मगर प्रो. नायक को विश्वविद्यालय परिसर में रहने से चिढ़ थी। गाँव के संस्कारों में पली-बढ़ी सरला-सज्जना पत्नी को आर्थिक लाभ का पुलाव खिला कर सरकारी आवास से घृणा करने के लिए पटा लेते थे। प्रो. नायक को यह शहर खुला अभ्यारण्य नजर आता था, जिसमें वे चौड़े से बांहें फरकाए घूम सकते थे, हिक्क भर चर सकते थे, खुशफैल मुद्रा में डँकार ले सकते थे और रात घिरने की हसरत भरी प्रतीक्षा कर सकते थे। जबकि कैम्पस सीमित दायरे में घिरा हुआ जेलखाना था। जहाँ आदमी तो छोड़िए, हवाओं को भी एक-दूसरे की खबर लगती रहती थी। साँस बाहर निकली नहीं कि सभी को पता चल गया - फलाँ महाशय की साँस फूलने की हकीकत क्या है ?



जून माह की अगिया-बैताल गर्मी ; घर, बाहर सर्वत्र तपिश की ताण्डव लीला चरम पर। भेज दिया नायक बाबू ने पत्नी को गाँव, दो-चार दिन नहीं, पूरे दो महीने के लिए। मैडम के कलेजे में शंका की तरंगें तो मचलती थीं, मगर किसी पुख्ता प्रमाण के अभाव में टूटकर बिखर जाती थीं। वैसे भी परले दर्जे की चालाकियाँ, अपने बेपर्द होने का प्रमाण बड़ी मुश्किल से छोड़ती हैं। फिर भी शंका तो शंका, प्रमाण न भी मिले, तो भी बुलबुले की तरह मन की गहराइयों में उठती ही रहती है ; और अपने होने का औचित्य हर पल ढूंढ़ा करती है। धर्म पत्नी गाँव की ओर प्रवास कीं, इधर नवोदिता नायिका ने यहाँ अपना विश्रामधाम बना लिया। प्रो. नायक की सुबह नायिका की सुमधुर चाय से होती थी और शाम उसी के हाथों कॉफी पीने के बाद ही ढलती थी। किचन में भोजन पकाने की किच-किच से नायक को एलर्जी थी। 1 लाख की पगार आखिर किस दिन के लिए ? ऐसे ही गाढ़े दिनों के लिए न ! शाम घिरने के घण्टा भर बाद नायक अपनी नायिका के साथ कलरफुल शीशे वाली कार में बैठ कर शहर निकल जाते और दरबान युक्त, प्रदूषण मुक्त, नीले प्रकाश वाले अलकापुरीनुमा होटल में एक हजारी भोजन का लुत्फ उठा कर सौंफ चबाते हुए नायिका संग वापस आ जाते। आगे की हिन्दी-कथा - ‘केशव कहीं न जाइ का कहिए। समझ-बुझकर चुप्पऽ रहिए।’ नायक, नायिका हैं और नायिका, नायक । नायक का होना नायिका पर निर्भर है और नायिका का होना, अनिवार्यतः नायक पर। साँसों की भाषा परखने वाला कोई विज्ञानी होता तो पक्का नायक-नायिका की साँसों में एक दूसरे का नाम ‘राम-राम’ की तरह सुन लेता। न जाने क्यों, इस क्षण कवि पंत की ये पंक्तियाँ दिल में मचलने लगी हैं- ‘सैकत शय्या पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा ग्रीष्म विरल, लेटी है शांत, क्लान्त, निश्चल।’



ग्रीष्मावकाश किसी न किसी दिन बीतना ही था, सो बीत गया, मगर प्रो. नायक मन ही मन जून माह को गालियाँ दे रहे थे - साला चैनखोर ! इतना जल्दी बीता क्यों ? और महीने बीतते हैं, तो पता चलता है कि बीत रहे हैं, मगर यह ? लगता है - कल आया था और आज चल दिया। काश ! यह साला जून साल भर आता-जाता रहता । अब तो दो-चार दिन में पत्नी भी गाँव से वापस आ जाएगी। फिर तो यह निछद्दम परमानन्द कान्टीन्यू कहाँ नसीब ? ‘स्पर्शयोग’ को पटरी पर लाने में ही 15-20 दिन खर्च हो जाते हैं। कोई पत्नी को समझाता क्यों नहीं, कि छुट्टी बीतते ही तत्काल घर से नहीं चल दिया जाता। बैर, प्रेम, खांसी, खुशी छिपाए नहीं छुपते। यह निहायत पुरानी कहावत बन चुकी है, एकदम घिसी-पिटी जंक खायी हुई, लगभग बेस्वाद। अब छुपाए और क्या-क्या नहीं छुप सकते, तनिक माथा दौड़ाइए, सोच भिड़ाइए। चलिए, लीजिए नमूना। काम, क्रोध, दारू औीर ‘हवा’ को भी छिपाना मुश्किल है। इसी तरह चिन्ता, ईर्ष्या, चतुराई और चुगुलखोरी को भी बूझ लीजिए। दबती तो भूख-प्यास भी नहीं है। चाहे पेट की हो या? ये तो ऐसी अन्दरूनी बला हैं कि छिपाने पर और भड़क उठती हैं, दबाने पर और बवाली। प्रो. नायक जो अपनी स्पर्श-विद्या को छिपाने के लिए उपाए-दर-उपाय, जुगाड़-दर-जुगाड़, तिकड़म-दर-तिकड़म भिड़ाते रहते थे, कामयाब नहीं हुआ। विश्वविद्यालय की हवाओं में प्रो. नायक की बहादुरी की सुगन्ध फैल गयी। शुरुआत हुई छात्राओं के बीच से, मुद्दा उबलना शुरू हुआ छात्रों के बीच और बिना बादल के घुमड़ने-गरजने लगा कैम्पस के सैकड़ों प्रोफेसरों और शिक्षकों के मध्य में। सिर्फ मृतक व्यक्ति ही इस धराधाम पर शत्रुहीन हो सकता है जिन्दा इन्सान, कत्तई नहीं। ऐसे कई शिक्षक प्रो. नायक को बेपनाह ईर्ष्या की निगाहों से देखते थे जो स्पर्शयोग की साधना में बारम्बार फेल्योर हुए या फिर उस महान सफलता के योग्य खुद को नहीं निर्मित कर पाए। आए दिन उन्हें दिन-रात मलाल रहता कि नयकवा सशरीर जन्नत की सैर कैसे कर सकता है ? ऐसा कौन सा मायावी जादू है उसकी वाणी में जो एक से बढ़ कर एक नायिकाओं की लाइन लगा लेता है। प्रो. नायक की असाधारण उन्नति से जलने-गलने-बुझने वाले प्रोफेसर ऐसे ही नाजुक मौके की तलाश में थे, जब नायक के खिलाफ प्रशासन के मुखिया अर्थात् वाइस चांसलर के कान भरे जा सकें। इधर अपनी अंगुलियों को पैर बना कर नायिका के अंग रूपी सीढ़ियों पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ने में दत्तचित्त रहने वाले नायक बाबू अपने खिलाफ उठ रही इस आँधी से बेखबर थे। एक दिन नायक की नायिका को वी. सी. ऑफिस से आदेश मिला कि वाइस चांसलर के दरबार में तुरन्त हाजिर हो। नायिका ने भाँप लिया कि आज उसे क्या ‘खुशखबरी’ मिलने वाली है। पहुँची वी. सी. के समक्ष, हकबकाते हुए बैठ गयी कुर्सी पर। वी. सी. महोदय ने पारदर्शी ग्लास का स्वच्छ शीतल जल पिलाते हुए प्रो. नायक से उसके रिश्तों पर सवाल-दर-सवाल किए। शुरुआती हिचकिचाहट और शर्म के बाद नायिका ने स्वीकार कर लिया प्रो. नायक से प्रगाढ़-अन्तरंग सम्बन्धों को। अन्तिम बार वी. सी. महोदय ने अचूक तीर चलाया - ‘अच्छा, ये बताओ प्रो. नायक का तुम से रिश्ता केवल जिस्मानी है या फिर सच्चे प्रेम का ?’ नायिका ने इस प्रश्न का उत्तर कुछ दिया ही नहीं - सिर्फ सिर झुका लिया और रोते हुए हाथ जोड़ कर बोली - ‘मुझे बचा लीजिए सर !’



‘रावण-महिमा श्यामा विभावरी, अन्धकार’...................



विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोर कमेटी की आपात् बैठक बुलाई, जिसमें वे सारे छिपे दुश्मन खुलकर शामिल हुए, जो आधा दर्जन सालों से प्रो. नायक की परमानन्दी प्रोग्रेस से जलते-भुनते थे। उठे सवाल, छिड़ी बहस, गरमाया माहौल। आखिरकार एक स्वर में प्रस्ताव पारित हुआ कि प्रो. नायक जैसे शिक्षक विश्वविद्यालय के स्वस्थ वातावरण के लिए विषधर जीव हैं, जिनके मौजूद रहते छात्राओं के कैरियर और चरित्र की सुरक्षा नहीं हो सकती। अतः प्रो. नायक को अनिश्चितकाल के लिए सस्पेंड किया जाय। कमेटी यह भी निर्णय लेती है कि प्रो. नायक प्रशासन की अनुमति लिए बगैर शहर छोड़कर कहीं भी यात्रा नहीं करेंगे। तीन दिन के भीतर प्रो. नायक को सस्पेंसन ऑर्डर थमा दिया गया। नायक बाबू को ‘स्पर्शयोग’ से सीधे ‘विश्राम योग’ की अवस्था में पहुँच जाने की ऐसी आशंका न थी। बेचारे ‘मोक्ष-पत्र’ लिए-लिए अपनी कुर्सी में घण्टों धंसे रहे। इस बीच न जाने कितने असंख्य, अपार, क्षणिक मगर तीव्र विचारों का भूचाल उठता, गिरता, शांत होता रहा। -वी. सी. साब को कैसे खबर लग गयी ? किस हरामी-कुकर्मी ने मेरे खिलाफ जहर उगला ? सब मेरे दुश्मनों की जालसाजी है। साले मुझे सुखी देख कर खड़े-खड़े जल रहे हैं। क्या मैं ही अकेला अपराधी हूँ। यहाँ तो इस फील्ड में हमसे भी बढ़ कर जहरीले नाग हैं,सूटेड-बूटेड, टाई तथा डाई वाले, इज्जतदार। कोई आकर मुझसे पूछे तो क्यों न उगल दूँ नाम उन दर्जनों दैत्यों का ? लगता है मेरी पत्नी ने मेरे खिलाफ रिर्पोट लिखायी है। नहीं, मैं भी कैसा सनक रहा हूँ ? वह क्यों बगावत करेगी? कुछ भी हो, है तो मेरी वाइफ ही। वह भी गाँव की सीधी-सादी, भुग्गा। मुझे अब भी पक्का यकीन है कि मेरे कारनामों से वह बेखबर है। वैसे भी, मेरे खिलाफ जाने के पहले मुझसे पूछती, मुझसे लड़ती, झगड़ती, मुझे दो-चार पत्नियोचित गालियाँ भी देती। हो सकता था - वह पत्नियोचित थप्पड़ भी लगा देती। मैं खुशी-खुशी खा लेता गालियाँ, सह लेता थप्पड़। घर की बेइज्जती, घर में ही रह जाती। मगर अब तो शहर भर में, पूरे जिले में, प्रदेश भर में, यहाँ तक कि सारे देश में खबर उड़ जाएगी कि एक बुड्ढे गुरु ने अपने बेटी समान शिष्या से नाजायज सम्बन्ध बनाया। अर, रे, रे, रे.......... कहीं यह मेरी शिष्या की कारस्तानी तो नहीं ? पिछले एक हफ्ते से मिलने को कौन कहे, वह दर्शन तक नहीं दे रही। रहस्य अब समझ में आया। इसके पहले और भी कई आईं, मगर प्रेम करके धोखा किसी शिष्या ने नहीं दिया, यही स्वर्ग से स्पेशल उतर कर आयी थीं। घबराओ मत मुन्नी ! मार दिया न आँखों में तीर। तुम्हें तो कोर्ट में घसीटूँगा। अपनी अम्मा का दूध याद दिला दूँगा।’



कुलपति महोदय ने अपने पद-प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हुए एक और कदम उठा लिया- -नायक-नायिका लीला- की पूरी छानबीन के लिए पाँच सदस्यीय इन्क्वायरी कमेटी अर्थात् ‘जाँच समिति’ गठित कर दी। समिति में दो प्रभावशाली प्रोफेसर ऐसे थे, जिन्होंने आज के पाँच साल पहले स्पर्श योग-साधना में मुँह की खाई थी। इसीलिए एकांत में मुट्ठी भींच कर कसम खाये थे कि प्रेमयोग के गुर न सिखाने वाले प्रो. नायक को एक दिन सबक सिखा के रहेंगे। चूँकि यह यौन शोषण का मुद्दा था, इसीलिए जाँच समिति में एक बेदाग, सुपवित्र, निर्मल, सद्चरित्रा प्रो. वन्दना जी को चुना गया, जिनके बारे में अफवाहें इतनी घोर श्रृंगारिक थीं कि कम से कम एक प्रेम-ग्रंथ लिखा जा सकता था, लेकिन उनके खिलाफ खुलने वाली आज तक कोई जुबान ही नहीं बनी।



अपनी ‘सफलता’ का प्रमाण पत्र लेकर प्रो. नायक क्वार्टर के बरामदे में मरी पड़ी कुर्सी पर मरे हुए की तरह पसर गये। सिर्फ चाहत ही नहीं, हार्दिक उम्मीद भी थी कि बीवी एक कप गरमागरम चाय जरूर बना के देगी, फिर उठूँगा, अन्दर चल कर बताऊँगा, समझाऊँगा कि यह सब दुश्मनों की जालसाजी है। मगर ये क्या ? न चाय आयी, न दरवाजा खुला। आधे घण्टे तक चाय की प्रतीक्षा दिल आधा-आधा कर डालने के लिए काफी थी। बैठे-बैठे खुद ही लगाई आवाज। ‘मंगला’ ! ............ कोई उत्तर नहीं। ‘देवी जी’ ! ............ भीतर से कोई आवाज ही नहीं। नायक बाबू खुद ही दरवाजा खोलने को मजबूर हुए। पाँवों को दिया कमरे में। मंगला सिर झुकाए टपाटप आँसू बहा रही थी और हिचकियाँ ले-लेकर रो रही थीं। प्रो. नायक बूझ गये सारा रहस्य। आखिर आग यहाँ तक पहुँच गयी। थोड़ा भोले-भाले अंदाज में हथेलियाँ लहरा कर पूछा - ‘क्या हुआ ? क्यों रो रही हो ?’ मंगला जी के लिए यह प्रश्न न जाने कितना निरर्थक था, जिसका उत्तर देना तो दूर, उसे रत्ती भर भी सुनने का धैर्य वे खो चुकी थीं। आज एक सुशिक्षित पति को अपनी अर्द्धशिक्षिता पत्नी मंगला, अमंगला देवी नजर आ रही थी। अचानक उनकी निगाह पत्नी के बगल में पड़ी कुछ सनसनीखेज वस्तुओं पर गयी। आँखें चौंधिया देने वाले थे - वे सामान। ऊँची हिल वाली ब्रांडेड सैंडिल, ब्रांडेड परफ्यूम, नहीं-नहीं, परफ्यूम्स, आइलाइनर। ये दुखदायी सामान ही मंगला देवी के उत्तर थे। उठीं तैश खा कर और छाप दिया पति-परमेश्वर के गाल पर एक स्पष्ट थप्पड़। नायक बाबू कुछ संभल पाते कि तब तक उसी पिराते गाल पर एक और सन्नाटेदार...............। यह तो ठीक वैसे ही रसीद हुआ जैसी उन्होंने कल्पना की थी। ऐसा चमत्कार कैसे हो गया ? कल्पना और हकीकत में जरा भी अन्तर नहीं ? थप्पड़ों की संख्या भी उतनी ही, जितनी कल्पना में सोचा था, न एक कम, न एक ज्यादा ? मगर नहीं, कल्पना और हकीकत में कहीं न कहीं अन्तर तो आ ही जाता है। पत्नी ने थप्पड़ मारने के बाद ही गाली दी, जबकि कल्पना में पत्नी ने थप्पड़ देने के पहले गाली दी थी। ये गालियाँ उतनी पचनीय नहीं थीं, जितनी कल्पना में नायक ने सोचा था। सबसे आश्चर्यजनक अन्तर यह दिखा कि कंठ भर लताड़ने, धिक्कारने, गरियाने के बावजूद एक कप गरम चाय जरूर बना कर दिया धर्मपत्नी ने। यह मैटर कल्पना में तो सूझा ही नहीं था। आज मंगला जी ने सिद्ध कर दिया कि पत्नी ही असल पत्नी होती है, उसकी जगह कोई नहीं ले सकता। इस ‘स्पर्श लीला’ में घटित एक-एक काण्ड की मार्मिक जानकारी हासिल करने के लिए गठित की गयी कमेटी के समक्ष लगभग हर हफ्ते नायक-नायिका को हाजिर होना था। दोनों ‘वीरों’ के आने का दिन अलग, समय अलग, सवाल अलग। कमेटी के सवाल कोई चलताऊँ टाइप नहीं, खुफिया विभाग के जैसे या फिर वैसे - जैसे यौन शोशण के केस में वकील अपराधी खोद-खोद कर उगलवाते हैं - ‘तो नायक जी, आप कितने सालों से इस धन्धे में लिप्त हैं ?’ ‘अगर आप बुरा न मानें तो क्या आपकी पूर्व प्रेमिकाओं के नाम जान सकता हूँ ?’ ‘शिष्या के साथ ठहरने के लिए क्या आपने कभी होटल भी बुक करवाए ?’ ‘आप पर यह भी आरोप है कि सम्बन्ध कायम करने के लिए आपने अपने पद, अधिकार और पहुँच का दुरूपयोग भी किया, जैसे- नेट की डिग्री दिला देना, टॉप करा देना, दूसरे कॉलेजों-सकूलों में नौकरी दिला देने के वादे करना ?’ ये सवाल मिसाइलनुमा थे, कटार थे, तलवार थे, बम थे या बारूद, प्रो. नायक किंकर्तव्यविमूढ़ता के मारे तय नहीं कर पा रहे थे। कमेटी के प्रेम-प्रश्नों का उत्तर प्रो. नायक ने प्रश्न पूछ कर ही दिया। जैसे - ‘आपको कैसे मालूम ?’ ‘किसने बताया आपको ?’ ‘यह आप कैसे कह सकते हैं ?’ ‘यह सूचना आपको कैसे मिली ?’ कमेटी भीतर ही भीतर खुश थी कि नायक महाशय में अपने प्रश्न पूछने के अंदाज में ही सारे प्रश्नों का उत्तर दे डाला, अतः डरा-धमका कर पूछने की जरूरत नहीं पड़ी। उधर हिन्दी विभाग के उबलते छात्रों का एक वर्ग इस मौके की तलाश में था कि गुरू जी को इस बहादुरी का पुरस्कार समारोहपूर्वक दिया जाय। ऐसी वीरता तो इतिहास में कोई-कोई ही दुहरा पाता है। अतः एक दिन इन्क्वायरी कमेटी के सवालों को राणासांगा की तरह शरीर पर झेल कर प्रो. नायक जैसे ही बाहर निकले,एक साथ तीन-चार शिष्यों ने मित्रवत् अंदाज में खैर-खबर ली - ‘का गुरू ! हालचाल ठीक बा ?’ प्रो. नायक अभी कुछ उत्तर देते कि तीन शोध छात्र आगे बढ़ आए और मुँह, बाल, गर्दन को रंगारंग बना डाला। वज्र काला, आबनूस भी फेल कर जाय। प्रो. नायक की भयातुर आँखों की चमक ही उनके पास इंसानी सिर का अनुमान देती थीं, वरना तो हू-ब-हू वही दृश्य कि - ‘रावण महिमा श्यामा विभावरी अन्धकार।’ इस रंगारंग सम्मान समारोह के उपरान्त प्रो. नायक को पदक स्वरूप एक माला पहनाई गयी। जिसमें नामी-गिरामी कम्पनियों के ‘चरण-सेवक’ झूल रहे थे। कौन वर्णन करने में समर्थ है - नायक बाबू की इस अनुपम सौंदर्य छटा का ? अभूतपूर्व सम्मान के ये दोनों शिष्टाचार सम्पन्न कर लेने के बाद छात्रों ने गुरू जी के सम्मान में नारे लगाए - ‘प्रोफेसर नायक ! मुर्दाबाद !’ ‘मुर्दाबाद, मुर्दाबाद !’ प्रो. नायक, शर्म करो। हम तुम्हारी जागीर नहीं।’ ‘जब तक सूरज-चाँद रहेंगे, नायक सर बदनाम रहेंगे।’ घण्टे भर बाद यह समारोह सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ और सारे छात्र हँसते-खिल्ली उड़ाते हुए अपने-अपने छात्रावास की ओर चले। इस समारोह में मात्र वे ही छात्राएँ और छात्र नहीं शामिल हुए जिन्हें रीतिकालीन कवियों की प्रौढ़ा नायिकाओं के तुलनात्मक अध्ययन पर अभी थीसिस जमा करनी थी, अथवा ‘ब्रजभूषण बिहारी के काव्य में रसतत्व’ की मीमांसा’ पर शोध-प्रबंध प्रस्तुत करना था।









संपर्क-  

भरत प्रसाद
सहायक प्रोफेसर
हिन्दी विभाग
पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय
शिलांग – 793022
मोबाईल- 09863076138



टिप्पणियाँ

  1. भरत भाई को कथाकार के इस रूप में देखना एक सुखद अनुभव है | जिस समस्या को हम लोग लंबे समय से सुनते आये हैं , उन्होंने उस पर लेखनी चलाकर उसे विधिवत उद्घाटित किया है ...बधाई उन्हें ... ज्ञानेंद्रपति की एक कविता है

    वे जो सर कहाते है
    धड भर है
    उनकी शोध छात्राओं से पूछ देखो |

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  2. बेहद संवेदनशील , जटिल और प्रासंगिक विषय उठाया . लेकिन विषय बहाना मात्र बन कर रहा गया . कहानी में जो भी तनाव है , वह शिक्षकों की आपसी राग-द्वेष का परिणाम है. जिस विषय को कहानी में प्रमुखता दी गयी है , उस का कहानी की सरंचना से कोई आत्यंतिक संबद्ध बन ही नहीं पाया . शैली भी यातना का बयान करने वाली नहीं , रस लेने वाली है . भरत ने कहानी का नया मोर्चा खोला है . अपनी लगन और मेहनत से इस क्षेत्र में भी वे जरूर कविता और आलोचना जैसी सफलता हासिल कर सकेंगे . हमारी शुभकामनाएं .

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  3. सच्चाई को उजागर करना तलवार की धार पर चलने से कम नहीं है भाई । बधाई स्वीकारें ।

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  4. ........... गुरु घंटालों के पोल खोलती एक बेहतरीन कहानी ! लेकिन आज के शिष्य भी कुछ कम नहीं हैं !

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  5. Keshav Tiwari- Bharat ji wah kya kissa goi ka andaj ha.aur poora sanyam barta ha aapne kahani jara bhi kahin nahi fisli ha. Sadhuwad swikaren.

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  6. "इतिहास रचने की चुनौती " पढ़ रहा हूँ इनदिनों .....भरत जी को पढ़ना अच्छा लगता है .हर विधा में .

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