आस्था सिंह




आस्था ने इसी सत्र में बनारस हिदू विश्वविद्यालय से स्नातक की अपनी पढाई पूरी की है. युवा कवि एवं आलोचक बलभद्र की पुत्री आस्था को बचपन से ही साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश मिला है. ‘फूस के छप्पर पर’ आस्था की पहली ऐसी कविता है जो कहीं पर प्रकाशित हो रही है. इस कविता में फूस के माध्यम से आस्था ने प्राचीन को नवीन के साथ बखूबी जोडने का प्रयास किया है. वह प्राचीन जिससे हमें यानी नयी पीढ़ी को अपने जीवन संग्राम के लिए बहुत कुछ सीखने-समझने-जानने को मिलता है. वह प्राचीन जो तमाम जीवनानुभवों से भरा हुआ है, लेकिन समय के प्रवाह में उन्हें बीता समझ कर आज उपेक्षित किया जा रहा है. पीढीयों के बीच इस दूरी के लिए ‘जेनरेशन गैप’ शब्द प्रयुक्त किया जा रहा है. यह सुखद है कि आस्था ने  कविता में अपनी पुरानी पीढ़ी को समुचित सम्मान देते हुए उनसे अपनी पीढ़ी के गैप को पाटने की सफल कोशिश की है.






फूस के छप्पर पर


फूस के छप्पर पर
हरी लताएँ
फूस भरी लताओं से
बतियाते हुए कुछ बातें
जैसे बूढा कोई बतियाता हो
किसी बच्चे के साथ
 फूस की बातें अनेक
रिझातीं लताओं को
उकसाती बढ़ने को
एक होड़ होती बढ़ने की
छप्पर तक पहुँचने की, छाने की
कथाओं में उलझने की
जिंदगी को समझने की
जिंदगी को जीने की




समझ से परे
जिंदगी के कई मोड़
जी चुके कई पल, कई लम्हें, कई कथाएं
लताओं के लिए अथाह सागर
पूरा जीवन सिमटता नजर आता
फूस में
बूढ़ी बाहों में सुरक्षा का भाव-बोध
प्यार का एहसास
पूरा जीवन जीने की कला




होती है शाम
बूढा बोलता है
चलो हो गयी रात
चलता हूँ अब
मिलेंगे फिर...


टिप्पणियाँ

  1. नेहा का स्वागत है साहित्य की दुनिया में. कविता पढते हुए तो सुना था, पहली बार कविता देखी.

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  2. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. Dhananjay Singh- Ek achchhi kavita jo jaldi samapta ho gayi..,aastha ji se shikayat hai, ek lambi kavita ki sambhawna ko chota karne k liye.swagat hai

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