विमल चन्द्र पाण्डेय




युवा कहानीकारों में विमल चन्द्र पाण्डेय ने अपने अलग शिल्प एवं कथ्य से अपनी एक अलग पहचान बनायी है. 'काली कविता के कारनामे' भी विमल की ऐसी कहानी है जो सहज शिल्प में कथक्कडी के अंदाज में कही गयी है। यह कहानी हमारे समाज में स्त्रियों की विडंबनाओं के साथ-साथ प्राथमिक शिक्षा में व्याप्त घालमेल को भी उजागर करती है। तो आइए पढ़ते हैं विमल की यह कहानी।

 
काली कविता के कारनामे

वहां कुछ अपने नाम जैसा नहीं लगता था। बादल गीले नहीं थे, ज़मीन पौधे नहीं उगाती थी, बच्चे मासूम नहीं लगते थे, मनोहर बिल्कुल भी मनोहर नहीं था और इस लिहाज़ से देखा जाये तो कविता इस जगह के लिये एकदम उपयुक्त थी क्योंकि कविता में किसी भी तरह की कविता की संभावना किसी माई के लाल नहीं देखी थी। उसके एक चाचा, एक फेरी वाले और दुनिया के सभी मर्दों ने उसमें एक अश्लील कहानी की संभावना कभी न कभी ज़रूर देखी थी।

कविता की जिंदगी में खुशियों मार्का यह नौकरी एक वरदान की तरह थी और खबर आने के सिर्फ़ पांच दिनों के अंदर उसने दुनिया में इतना परिवर्तन देखा था कि उसे लगता ही नहीं था कि यह वही दुनिया है जहां वह पड़ोस में सिर्फ चीनी मांगने चली जाये तो लोग उसे बीस तरह की क्रीम का नाम बता दिया करते थे। सिर्फ़ पांच दिन में उसने अपने लिये इतने सम्मानजनक शब्द सुन लिये थे कि ज़िंदगी भर सुनी गयी अपमानजनक टिप्पणियों पर मरहम सा लगने लगा था। वह एकदम से उस मध्यमवर्गीय मुहल्ले में एक आदर्शनुमा चीज़ बन गयी थी। वह सोचने लगी थी कि एक प्राइमरी टीचर की नौकरी मिल जाने पर ये हाल है तो कहीं वह सच में आईएएस या पीसीएस बन जाती तो क्या होता। उसे लगता कि मुहल्ले के आखिरी मकान में रहने वाला अनोखे लाल, जो दो बार आईएएस मेन्स निकाल चुका है, वह इस तरह के कितने अनोखे अनुभव झेल रहा होगा। यह कहानी कविता की है इसलिये अनोखेलाल के बारे में किसी और कहानी में विस्तृत बात की जायेगी। कविता सबकी आवाज़ें पहचानती थी, मां की सहेलियों की सबसे ज़्यादा क्योंकि वही औरतें उसकी सबसे बड़ी निंदक और इस हिसाब से सबसे बड़ी प्रेरक थीं। उसने जो भी बातें सुनीं उन्हें उन्हीं के पिछले बयानों के बरक्स रखा तो उसने पाया कि वे लोग दलबदलू नेताओं से भी चार कदम आगे थीं। उदाहरण के लिये -

सीमा की मां - (पहले) - कविता से दोस्ती खत्म करो सीमा नहीं तो तुम भी उसके जैसी ही हो जाओगी दब्बू और बेवकूफ। दिन भर घर में बैठे रहने से नहीं बनता कोई कुछ, थोड़ा बहुत बाहर भी निकलना पड़ता है। स्मार्ट बनो, उसकी तरह नहीं।

(अब) - मुझे पहले से पता था कि ये लड़की एक दिन मुहल्ले का नाम रोशन करेगी। घर से बाहर निकलना तो दूर घर में भी टीवी सीवी नहीं देखती। एक तू है करमजली जो हर हफ्ते फिल्म देखने चली जाती है। पढ़ाई कर कुछ बन जा. दिन भर ‘साथ निभाना साथिया’ देखने से काम नहीं चलेगा।
रागिनी की मां - (पहले) - कितनी घमंडी है ये करियट्ठी। मैं सामने से गुज़री और मुझे उसने नमस्ते तक नहीं किया। हुंह...पता नहीं अपने को क्या समझती है। भगवान ने थोड़ा रूप दिया होता तब तो हमारा जीना ही दूभर कर देती।

(अब)- अरे कमाल की लड़की है हमारी कविता। जानती हैं दीदी कल मैं गुज़र रही थी उसके घर के सामने और वो बालकनी में बैठी थी। मैंने आवाज़ लगायी लेकिन उसने देखा तक नहीं, ज़रूर कुछ पढ़ रही थी। जब किताबों में घुस जाती है तो आसपास की दुनिया से एकदम कट जाती है। आजकल की लड़कियों की तरह एकदम नहीं है।

                आजकल की लड़कियों की बरसों से बड़ी घिसी-पिटी अवधारणा थी। जो टीवी बहुत देखती हों, सजने-संवरने में बहुत वक़्त लगाती हों और जिनका बनाव-श्रृंगार देखकर भ्रम होता हो कि वे किसी लड़के से फंसी हैं, वे लड़कियां आज की लड़कियां (आज और आज से तीस साल पहले भी) कही जाती थीं। इनमें से एक भी काम में कम रुचि लेने वाली लड़की को आज की लड़की की परिभाषा से बाहर रखा जाता था। कविता शुरू से आज की लड़कियों वाली श्रेणी से बाहर रहती आयी थी, इतना बाहर कि कई बार तो उसकी मां ही सोचती कि मेरी पगली बेटी कभी बाहर घूमने क्यों नहीं चली जाती। कविता के दिल का रंग उजला था और उसकी त्वचा का रंग सांवला था। दिल का देखा जाना एक कठिन किताब के पढ़े जाने जैसा था जिसकी योग्यता सब में नहीं होती थी। त्वचा के रंग का देखा जाना टीवी के किसी घटिया सीरियल देखने जैसा था जिसकी योग्यता सब में, खासकर मांओं में अनिवार्य रूप से पायी जाती थी।

कविता ने ग्रेज्युएशन के बाद से ही आई. ए. एस. की तैयारी शुरू कर दी थी (हालांकि उसने सिर्फ़ किताबें ही खरीदीं थीं लेकिन किताबें खरीदने या संबंधित कोचिंग में प्रवेश लेने पर यह मान लिये जाने का नियम था कि तैयारी शुरू हो चुकी है) जिसकी अप्रत्यक्ष तैयारी उसके पिता के भाषणों और सपनों की दुहाई के ज़रिये इंटर से ही चल रही थी। उसका सामान्य ज्ञान अच्छा था और इतिहास व पब्लिक ऐड जैसा स्कोरिंग विषय लेते वक्त उसके दिमाग में यही चल रहा था कि कम से कम पिता की एक इच्छा तो उसने पूरी कर दी, आई. ए. एस. बने या न बने, विषय तो उनके कहे अनुसार चुन लिये। वह कभी से भी प्रशासनिक सेवा में नहीं जाना चाहती थी, उसे लगता था कि उसकी ज़िंदगी का लक्ष्य एक अच्छी और पूर्णकालिक मां बनना होना चाहिये ताकि वह अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दे सके। पिता बहुत खुश थे। उन्हें कविता का विषय लेना उसके आईएएस बनने से कम नहीं लगा और इस खुशी में उन्होंने अपने जिगरी दोस्त शर्मा के साथ बैठ कर दो चार पैग मार लिये। कविता उनके घर की नाक थी। कविता के पिता को इस बात का घमंड रहता था कि उनकी बेटी आजकल की लड़कियों से बिल्कुल अलग है। कविता अपने पिता की हर इच्छा को पूरा करने का प्रयत्न करती और बिल्कुल उसी तरह पिता के सामने आती जैसा वह चाहते थे।

                तो ये थी दुनिया को दिखायी देने वाली बात। अब वह बात जो दुनिया तो क्या कविता के मां बाप को भी दिखायी नहीं देती थी। कविता वैसे तो हमेशा बहुत शांत रहती क्योंकि सांवले रंग के लिये बचपन से मिले तानों और मज़ाकों ने उसे गंभीर बना दिया था। जब वह रात को अपने बिस्तर पर आती तो चाह कर भी किताबों से दिल नहीं लगा पाती। वह किताबें खोलती और कुछ पन्नों के सफ़र के बाद उसके जे़हन के अकेले कमरे में कुछ ऐसे लोगों की आमद हो जाती कि उसे घबरा कर किताब बंद करनी पड़ती। उसका पूरा वजूद एक गिजगिजाते अनुभव से भर उठता। उसके चेहरे के सामने उसके चाचा का हांफता हुआ चेहरा आ जाता। वह इस आकृति से दुनिया में सबसे अधिक घृणा करती थी। रातों को उसे नींद में लगता कि किसी के हाथ उसके सीने पर मचल रहे हैं, वह चीख कर उठती तो कहीं कोई नहीं होता और थोड़ी दूरी पर कछुआ छाप मच्छर अगरबत्ती जल रही होती।

कविता के सामने तो कोई नहीं कहता लेकिन उसके पीठ पीछे मोहल्ले की औरतें, जो कविता के लिये चाचियां थीं और जिनकी बेटियां कविता के साथ बचपन से खेली बढ़ी थीं, उसे काली कविता के नाम से संबोधित करती थीं। काली के विशेषण से कविता परिचित थी लेकिन इस बात को कभी ज़ाहिर नहीं होने देती थी ताकि हमेशा उससे छिपा कर इसका प्रयोग किया जाये। उसकी सहेलियां भी यह जानती थीं कि कविता अपने नाम के पहले लगने वाले विशेषण से परिचित है लेकिन वे भी कोई ऐसा मौका नहीं देती थीं कि कविता को इसका शक भी हो। इस लिहाज़ से कविता की अपनी सहेलियों से अच्छी बनती थी और वे एक दूसरे का ख्याल रखती थीं। काली कविता कहने में अनुप्रास की मधुरता के कारण चाह कर भी उसकी सहेलियां और उनकी मांएं बरसों पुराना अभ्यास बदल कर सिर्फ़ कविता नहीं कह पाती थीं।

कविता जिस दौर में प्राइमरी की अध्यापिका हुयी वह दौर हरिशंकर परसाई के नंदलाल मास्टर वाले दौर से बहुत आगे निकल आया था। अध्यापकों की आमदनी, भले वे कितने भी अंदर के गांव में नियुक्त हों, खासी बढ़ गयी थी और डॉक्टर, इंजीनियर और आईएएस के साथ अध्यापकी भी एक सम्मानजनक भविष्य का विकल्प होने लगा था। अध्यापकों को दूर-दराज़ के गांवों में नियुक्त किया जाता था जहां उन्हें बच्चों को स्कूलों में रोक के रखने के उपाय खोजने होते थे। सरकार ने बच्चों को स्कूल जाने के लिये प्रेरित करने के कुछ इंतज़ामात किये थे जिन्हें लागू करके बच्चों को स्कूल आने का लालच देना था। इसके तहत एक स्लोगन बनाया गया था और विज्ञापनों में ढेर सारे गरीब बच्चों को नयी स्कूल यूनीफॉर्म पहने कंधे पर इतनी खुशी से स्कूल की ओर जाता दिखाया जाता था जैसे वे चुनाव जीतने के बाद शपथ ग्रहण करने जा रहे हों। अधिकतर बच्चे सांवले और काले हुआ करते थे गोया काला होना गरीब होने की निशानी हो या गरीब होने के लिये काले रंग की अनिवार्यता हो। सरकार ऐसे बहुत से कामों से प्रकारांतर से अपने मानसिक दिवालियेपन को प्रदर्शित करती रहती थी।

कविता को उसकी सहेलियों के साथ-साथ उसकी मां ने भी बताया कि गांवों के विद्यालयों में पढ़ाने की कोई अनिवार्यता नहीं होती इसलिये ये नौकरी राजा की नौकरी कही जाती है। इसके साथ उसकी मां ने यह भी कहा कि वह अपना काम दिल लगा करे। कविता ने कहा कि कोई नहीं पढ़ाता तो न पढ़ाये, वह अपना फर्ज पूरा करेगी। जब उसने मां को यह बात बतायी तो लगा कि फर्ज़ किसी स्वेटर बुनने जैसा है, वह एक बार सलाइयां उठायेगी और तब तक नहीं रखेगी जब तक फर्ज़ पूरा नहीं हो जाता।

कविता की बातों पर उसकी मां को पूरा विश्वास था क्योंकि कविता ने बचपन से पिता के अधिक करीब होने के बावजूद कुछ खास इरादे अपनी मां के सामने ही ज़ाहिर किये थे। मां को बचपन के उसके कारनामे याद थे। उसका बचपन आम लड़कियों से अलग था। वह जहां भी अपनी सहेलियों के साथ जाती, लोग पूछते कि वह किसकी बेटी है। वह सीधी खड़ी होकर अपने पिता का नाम बताती। इस दौरान उसे माता-पिता की हिदायत याद रहती कि पिता के नाम के आगे श्री लगा कर बताना है, वह कहती- ‘‘श्री रविशंकर कौशिक।’’ उसका जवाब सुन कर जो जवाब या फुसफुसाहटें आतीं उनका अर्थ यही हुआ करता था कि वे तो फेयर हैं, उनकी बिटिया काली कैसे हो गयी। फेयरवह पहला शब्द था जिसका अर्थ कविता ने बाहर से घर में आने के बाद अपनी मां से पूछा था। मां ने मामला समझ लिया था और उसे गोद में भरते हुए बोली थी- ‘‘फेयर का मतलब वे लड़कियां जो सिर्फ़ गोरी हैं और उन्हें कोई सहूर नहीं है।’’

कविता के बचपन का एक ही जुनून था कॉमिक्स और कहानियां। पिंकी, बिल्लू और चाचा चौधरी जैसे पात्र उसे कभी नहीं जमे। उसे बचपन से ही लगता था कि वह इतनी भी बच्ची नहीं है कि इन पात्रों की कहानियां उसे अच्छी लगें। उसका पसंदीदा पात्र था सुपर कमांडो ध्रुव और उसकी वास्तविक सी लगती कहानियां उसे बहुत प्रेरित करती थीं। नागराज की कहानियां पसंद होने के बावजूद उसे उसका अस्तित्व ही बनावटी लगता था। ध्रुव के बाद डोगा कविता को भाता था और वह डोगा के असली रूप सूरज को बहुत पसंद करती थी। उसे सारे हीरोज़ की कॉमिक्स पढ़ते हुए लगता था कि कोई लड़की क्यों नहीं ध्रुव या नागराज जैसी सुपर हीरोइन होती। यह सवाल उसे और उकसाता और वह खुद सुपरहीरोइन होने के बारे में कल्पनाएं करने लगती। उसकी मां ने उसका बचपन कहानियां सुनाते हुए बिताया था जिनमें झांसी की रानी और जीजाबाई जैसे ऐतिहासिक पात्रों से लेकर सीता और दुर्गा जैसे पौराणिक पात्र शामिल थे लेकिन कविता की पसंदीदा कहानी पारस पत्थर वाली थी। इस कहानी में समाज में उपेक्षित एक अपाहिज लड़के को एक पारस पत्थर मिल जाता है जिसे किसी भी लोहे से छुआ देने पर वह सोना बन जाता है। वह लड़का इस पत्थर की मदद से अपने पूरे गांव की मदद करता है और फिर पूरी दुनिया की मदद करता हुआ हर तरफ से गरीबी, भूख और लाचारी को मिटा कर इस दुनिया को खूब सुंदर बना देता है।

‘‘तो फिर दुनिया ऐसी कैसे हो गयी?’’  उस उम्र में भी कविता को ये समझ में आता था कि दुनिया सुन्दर नहीं है। लड़कियों को बहुत छोटी उम्र में ही, जिस उम्र में उनकी मुस्कान छोटी-छोटी कलियों की तरह होती है, इतना तो समझ में आ ही जाता है कि दुनिया सुंदर नहीं है। दुनिया उनके मन में अनेक कारणों से एक गुस्सा भरती है जो ज़्यादातर मामलों में हमेशा अंदर ही रह जाता है। लेकिन जब किसी का गुस्सा फूट कर बाहर आ जाता है तो कयामत आ जाती है।

‘‘क्योंकि जब वह लड़का मरा तो उसके साथ वह पत्थर भी कहीं गुम हो गया और दुनिया में फिर से बदहाली आ गयी।’’ मां अपने तरीके से कविता को सरल शब्दों में समझाती जिसका सारांश यही होता।
‘‘तो क्या वह पारस पत्थर फिर से मिल जाये तो दुनिया को फिर सुंदर बनाया जा सकता है ?’’ कविता जो अपने शब्दों में पूछती, उसका अनुवाद यह होता।

‘‘हां क्यों नहीं?’’ मां कह कर बात खत्म कर देती और कविता सोचती कि वह ज़रूर उस पत्थर को खोजेगी जिससे एक ही बार में दुनिया की समस्याएं खत्म हो जायें। ऐसा वह बड़ी होने के बाद भी सोचती रही भले कभी-कभी उसे अपनी सोच पर हंसी आती थी लेकिन वह मन में हमेशा मानती थी कि किसी भी चीज़ से हार नहीं मानना चाहिये।

कविता की उम्र बढ़ने के साथ उसे समझ में आ गया कि उसके रंग के कारण उसे समाज में हमेशा एक खास मानसिकता से देखा जायेगा। वह हमेशा इस बात के लिये सक्रिय रहने लगी कि कभी कोई ऐसा अनोखा काम करे दे जिससे उसे उसकी त्वचा का रंग भुला कर देखा जाये। इसी बीच एक ऐसी घटना हुई जिसने कविता को पूरे मुहल्ले में प्रसिद्ध कर दिया।

उसके मुहल्ले में एक फेरी लगा कर चादर बेचने वाला अक्सर आया करता था। वह सभी औरतों से बहुत घुला-मिला था और सभी औरतों को वह भाभी कह कर सेमी-अश्लील मज़ाक किया करता था और पतियों की अनुपस्थिति से ऊबी औरतें उन मज़ाकों में समय बिताने की रवायत देख लिया करती थीं। वह किसी के भी एक बड़े बरामदे में बैठ जाता और सारी चादरें खोल कर दिखाने लगता। आस-पास की औरतें भी वहीं आ जातीं और हर हफ्ते दस दिन पर उसकी एकाध चादर तो इस मुहल्ले से निकल ही जाती। एक दिन वह कविता के बरामदे में आकर बैठ गया और उसने कविता को मां को बुलाने को कहा। मां मुहल्ले में किसी के घर गयी थी तो कविता ने घर की लैण्डलाइन से मां को फोन करके बुला लिया। इस बीच उसने कविता से पानी मांगा और पानी देती हुयी कविता का हाथ पकड़ कर उसे गोद में बिठा लिया। कविता उस समय छठवीं कक्षा में गयी थी और उसकी छठवीं इंद्रिय हमेशा सक्रिय रहती थी। फेरी वाले की गोद में बैठे उसके पिछले हिस्से में कुछ चुभ रहा था और वह जितना आज़ाद होने के लिये हिल रही थी, फेरी वाला भी हिल रहा था। कुछ परेशानी होने पर फेरी वाले ने कविता को एक पल के लिये आज़ाद किया और अपनी लुंगी के भीतर हाथ डाल कर कुछ ठीक किया और फिर से कविता को अपनी गोद में खींच लिया। अब तक कविता के भीतर का सुपर कमांडो ध्रुव जाग चुका था। उसने अपने बालों में लगी क्लिप बाहर खींच ली थी जो एक तरफ से काफ़ी नुकीली थी। उसने पागलों की तरह हिल रहे फेरी वाले की तरफ अपना हाथ पीछे करके उसकी लुंगी की ओर बढ़ा दिया।

जब कविता की मां अपने साथ दो-तीन चादर खरीदने की इच्छुक औरतों को लेकर आयीं, फेरी वाला ज़मीन पर पड़ा तड़प रहा था और उसकी लुंगी के भीतर कहीं से खून बह रहा था। जो औरतें पांचवी फेल थीं उनकी भी छठी इंद्रिय तेज़ थी और ज़माना खराब था। उन्होंने कोने में सहमी खड़ी कविता को देखा जो हिम्मत दिखाने की काफी कोशिशों के बावजूद सहमे हुए कबूतर जैसी लग रही थी। फेरी वाले को उसकी हालत देखते हुये मारा नहीं गया और पुलिस बुला कर उसे दे दिया गया जिससे पुलिस को बैठे-बैठे काफी दिनों बाद कुछ कमाने का अतिरिक्त मौका मिला। कविता की मां की सहेलियों ने अब ये बातें बतायीं कि उन्हें पहले से शक था और उन्होंने फेरी वाले को कई बार अपनी नाबालिग बेटियों को छेड़ते देखा था।

खैर, इस घटना के बाद कविता मुहल्ले में एक आदर्शनुमा चीज़ बन गयी और वह जहां जाती उससे उसी घटना के बारे में पूछा जाता। कविता को शर्म तो आती लेकिन वह यथासंभव एडिटिंग करके घटना का वर्णन करती जिसमें वह अपनी तरफ से कई ऐसे तथ्य जोड़ देती कि पूरी घटना बताने के बाद वह एक नायिका की तरह उभरती। औरतों ने कविता के सामने अपनी लड़कियों से कहा कि वे कविता के कारनामे से सबक सीखें और कविता के जाने के बाद कहा कि काली कविता तो बहुत बहादुर है। एक स्थानीय अखबार, जिसका उप-सम्पादक कविता के पिता का मित्र था, ने इस खबर को अपने शहर के पृष्ठ पर कविता की तस्वीर के साथ छापा और ऐसा प्रचारित किया जैसे कविता को इस कारनामे के लिये कम से कम राष्ट्रपति पुरस्कार मिलना चाहिये। कविता को बहुत पछतावा हुआ कि उसके पिता ने उसकी तस्वीर प्रकाशित करने से पहले उसे बताया क्यों नहीं वरना वह यह तस्वीर न देकर दूसरी देती जिसमें वह कम सांवली दिखती थी।

इस घटना के बाद कविता को लगा कि वह मुहल्ले में लोकप्रिय हो गयी तो उसकी इज़्ज़त बढ़ जायेगी और लोग उसे काली कविता जैसे अपमानजनक संबोधन से नहीं पुकारेंगे। उसका सम्मान तो बढ़ा लेकिन विशेषण में कोई अंतर नहीं आया तो उसे दुख हुआ और पता चला कि नाम के आगे पीछे कोई चिप्पी लग जाने के बाद उसे हटाना कितना कठिन होता है। लेकिन इस घटनाक्रम से उसे यह फायदा हुआ था कि उसका आत्मविश्वास काफी बढ़ गया था, बल्कि कभी-कभी तो वह सोचती थी कि एकाध बार उसे ऐसा शौर्य दिखाने का मौका फिर से मिले तो मज़ा आ जाये। इस घटना के तीन साल बाद जब वह नौंवी क्लास में गयी और उसके गांव से उसके छोटे चाचा आये तो ऐसा मौका ईश्वर ने उसे फिर से दिया लेकिन चीज़ें कुछ बदल गयी थीं। एक तो उसका कॉमिक्स पढ़ना काफी कम हो गया था और दूसरे उसके शरीर में लड़कियों वाले कुछ परिवर्तन हो चुके थे और हो रहे थे जिसके कारण वह थोड़ी सहमी सी रहती थी। अकेलापन उसे भाने लगा था और सुबह उठने पर कहीं दूर बजता ओढ़ ली चुनरिया तेरे नाम की...उसकी अंगड़ाई में मुस्कराहट भर देता था। वह उठ जाने के बावजूद देर तक बिस्तर पर पड़ी कुछ सोचती रहती थी और अपनी डायरी में कुछ कविताएं लिखा करती थी जिनकी पंक्तियों के अंत में प्यार, इकरार, इनकार, तकरार, बेकरार या जिंदगी, बंदगी, या फिर दिल, महफिल, कातिल, मंज़िल, साहिल जैसे शब्द आते। वह बड़ी हो रही थी और कवियित्री हो रही थी, उसे एक ऐसे लड़के का ख्याल आता था जो उसकी तरह ही बड़ा हो रहा हो और कविताएं लिखता हो। वह चाहती थी कि लड़के शर्मीले हों, कविताएं लिखें और कभी गालियां न दें। गालियां देने वाले लड़कों से उसे बहुत डर लगता था।

छोटे चाचा गांव पर रह कर खेती करते थे और कभी-कभार शहर आते थे। उस बार वह अपनी कई हफ्तो से खत्म न हो रही खांसी का इलाज कराने आये थे। उनको पहले भी खांसी की शिकायत रहा करती थी लेकिन बुरा हो टीवी का जिस पर उन्होंने देखा कि तीन हफ्तों से ज़्यादा खांसी टीबी हो सकती है। वह भाग कर अपने बड़े भाई के पास चले आये। कविता ने उनके पांव छुये तो उनकी नज़र उसके फ्रॉक के ऊपरी हिस्से पर चली गयी जहां हल्के उभार मौजूद थे जो उन्होंने पिछली बार नहीं देखे थे। उन्होंने अपनी नज़रें वहां से हटाने की कोशिश की लेकिन बार-बार उनका ध्यान वहीं चला जा रहा था। उनकी पत्नी पिछले कई सालों से अलग सोती थी और जितनी बीमारियों से ग्रस्त थी उससे अधिक बीमारियों का वह बहाना बनाया करती थी। चाचा जब डॉक्टर के यहां से आये तो कविता के पिता ऑफिस जा चुके थे और उसकी मां मुहल्ले में किसी के घर बैठकर आजकल लड़कियों के लिये होते जा रहे असुरक्षित माहौल पर चर्चा कर रही थीं। चाचा को खाना खिलाने के बाद चाचा ने चाय पीने की इच्छा प्रकट की। चाय ले कर कविता चाचा के पास पलंग पर ही बैठ गयी और चाय पीने लगी। चाचा ने बहुत कोशिशें की कि वह कविता के फ्रॉक के उपरी हिस्से पर नज़र न डालें लेकिन चाय ख़त्म होते-होते उनका नियंत्रण भी खत्म हो गया। उन्होंने पीछे से कविता को पकड़ लिया और उसे अपनी गोद में खींचने लगे। उनकी हथेलियां फ्रॉक के ऊपर से कविता के उभारों को सहला और मसल रही थीं। कविता अचानक हुए इस हमले से संभल नहीं पायी और घबराहट में उसके मुंह से चीख भी नहीं निकली। चाचा ने एक झटके से उसे पलंग पर पटक दिया और अपने पाजामे और जांघिये को सरका के अपनी कमर के नीचे का हिस्सा उसकी कमर पर रगड़ने लगे। उन्होंने कविता की स्कर्ट ऊपर उठा दी थी और उसकी चड्ढी पर रगड़ कर रहे थे। कविता ने पूरी ताकत से छूटने की कोशिश की लेकिन चाचा की जकड़ मज़बूत थी। साथ ही वह कह भी रहे थे, ‘‘रुक जा बेटा बस थोड़ी देर।’’ कविता घिन के एक सागर में थी और इससे बाहर आने के लिये हाथ पांव मार रही थी। थोड़ी देर में चाचा का हांफना कम हो गया और वह उठ कर चुपचाप अपना पाजामा ठीक करते बाथरुम में चले गये। वह बाहर आये तो कविता बैठी हथेलियों में चेहरा छिपाये रो रही थी। चाचा ने उसके चेहरा उठाया और कहा, ‘‘ये कुछ नहीं था। मैंने कुछ गलत नहीं किया क्योंकि तुम तेरी बेटी की तरह हो। कुछ गलत तब होता जब मैंने तुम्हारी चड्ढी उतारी होती लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया ताकि तुम्हारी ज़िंदगी न खराब हो।’’ अपने महान काम का एहसान जताने और अपनी भलमनसाहत पर संतोष प्रकट करते हुये चाचा ड्राइंग रूम में सोने चले गये और फिर उसी रात की ट्रेन से वापस लौट गये। यह एकमात्र घटना थी जिसमें कविता कुछ नहीं कर पाई नहीं तो इसके बाद उसी साल उसने एक ऑटो वाले को खींच के थप्पड़ मारा था जिसने चेंज देते वक़्त उसकी छातियों को हाथ लगाया था। यूं तो छोटी रगड़ों और जानबूझ कर मारे गये घिनौने धक्कों से तो वह दिन भर दो चार होती थी लेकिन जब अति हो जाती थी तो वह हंगामा खड़ा करने में ही ठीक समझती थी।

पूरे मुहल्ले में एक दिन बीचोंबीच कविता ने मुहल्ले के एक अधेड़ रामनाथ शर्मा को जब अपनी सैंडिल से मारा तो उसकी चर्चा कई मुहल्लों तक हुई। सबने कहा कि काली कविता बहुत बहादुर है और उन सबकी बेटियों को ऐसे ही बहादुर होना चाहिए। कविता ने ऐसे कई छोटे-मोटे कारनामे किये जैसे-कॉलेज में एक टीचर को लड़कियों को प्रेक्टिकल में पास करने के लिये पैसे मांगने पर उसकी पोल खोलना या ब्लैंक कॉल्स कर रहे एक लड़के को पुलिस के हवाले करवाना। इन सबके बावजूद कविता का वह दर्द नहीं मिटा जो एक तरफ उसके चाचा के रास्ते आता था और दूसरा पूरी दुनिया द्वारा काली के विशेषण से आता था। चाचा उसके बाद भी आते रहे और उसके बाद तब तक वही चलता रहा जब तक कविता ने इंटर की परीक्षा नहीं दे दी। इंटर की परीक्षा पास करने वाले साल जब उसने उसकी चड्ढी उतारने की कोशिश कर रहे चाचा को ज़ोर से धक्का दे दिया था, वह जाकर ड्रेसिंग टेबल से टकराये थे और अगले दिन अस्पताल से ड्रेसिंग करा के चुपचाप गांव वापस लौट गये थे। कविता के पिता ने उन से अचानक जाने का कारण पूछा था तो उन्होंने कहा कि गांव में उनकी झोंपड़ी ढह गयी है और उन्हें जा कर उसे तुरंत उठाना है।

कविता जब इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षाओं के बाद छुट्टियों में अपने नानी के घर गयी तो उसने पाया कि उसकी ममेरी बहन विनीता टायफाइड से ठीक हो कर उठने के बाद बहुत दुबली, पीली और कमज़ोर हो गयी है। इस साल ग्यारहवीं कक्षा में गयी विनीता ही नानी के यहां आने का उसका हर साल का आकर्षण हुआ करती थी और इस बार वह उसके साथ खेलने कूदने की स्थिति में नहीं थी। उसे देख कर आश्चर्य हुआ कि बीमारी से उठने के बाद विनीता को दूध, दही और फल जैसी किसी चीज़ की कोई व्यवस्था नहीं थी और ये सारी चीज़ें घर के स्वस्थ मर्द यानि उसके दोनों मामा और विनीता के बड़े भाई विनीत के लिये सुरक्षित थीं। कविता ने मामी से पूछा कि विनीता को दूध और फल क्यों नहीं दिये जा रहे तो मामी ने पैसों की कमी का रोना रोया। रोना रोने के दौरान उन्होंने खाद की महंगाई के लिये सरकार और बारिश न कराने के लिये इंद्र भगवान को भी कसूरवार ठहराते हुए जम कर कोसा। कविता ने विनीता को समझाया कि वह अपनी मां से कहे कि कम से कम उसे रात में सोते हुए एक गिलास दूध दिया करे। विनीता ने ऐसा कुछ नहीं कहा और अपनी स्थिति में खुश रही। एक दिन कविता रात को विनीत को दूध देने गयी और उसने बातों-बातों में विनीत से पूछा,  ‘‘आगे क्या करने का इरादा है?’’

विनीत ने एक साल छोटी बहन को जवाब दिया, ‘‘देखो बाबू, चाहता हूं इंजीनियरिंग की तैयारी करुं लेकिन घर वाले शायद ही पैसा दें।’’
‘‘गणित अच्छा है तुम्हारा न भइया?’’ कविता ने पूछा।
‘‘हां, मेरा भी अच्छा है और छुटकी का भी। वह भी चाहती है लेकिन.....मैं कोई कोचिंग ज्वाइन कर लेता तो उसे तो मैं ही गाइड कर देता लेकिन....।’’ विनीत कुछ सोचता हुआ बोला।
‘‘लेकिन तैयारी के लिये मानसिक रूप के साथ-साथ शारीरिक रूप से भी स्वस्थ रहना जरूरी है, यह तो आप मानते हैं ना ?’’ कविता ने पासा फेंका।
‘‘हां हां और क्या ?’’ विनीत ने विनीत भाव से कहा।
‘‘तो..............आखिर क्यों.............फिर ऐसा..........।’’ कविता ने विनीत के सामने ऐसे-ऐसे सवाल रखे जिस पर सोचना उसने कभी ज़रूरी नहीं समझा था। कविता जब सोने के लिये अपने कमरे में जा रही थी तो एक बार उसने विनीता के कमरे में झांका और मुस्करा दी।

अगले दिन से विनीत ने कमर कसी और अपनी बहन के लिये दूध और फल का इंतज़ाम करवाया। मां और घर के पुरुषों के रोने को कि घर में पैसे की कमी हैको उसने यह कह कर काटा कि अगर कमी है तो हम सब अपने में से कटौती करके विनीता के लिये उन सारी चीज़ों का इंतज़ाम करेंगे जो घर के मर्दों के लिये है।

कविता जिस दिन जाने वाली थी और दरवाज़े पर मामा का बुलाया गया रिक्शा खड़ा था, विनीत ने एक बड़ी सी डायरी उसे गिफ्ट की जिस पर लिखा था -ज़िंदगी के बड़े सबक सिखाने वाली छुटकी सी बहन के लिये। कविता की आंखें नम हो गयीं। उसने विनीत से धीमी आवाज़ में कहा, ‘‘भइया, ये सब सिर्फ़ उतने ही दिन तक नहीं चलना चाहिए जब तक विनीता स्वस्थ न हो जाये। ये तो नियम हो जाना चाहिये ना?’’

’’हां पगली। और सिर्फ इसलिए यह नियम नहीं होगा कि मेरी बहन पढ़ने में तेज है। वह चाहे जैसी भी हो लेकिन व्यवस्था घर में एक बराबर होनी चाहिये सबके लिए। तू चिंता मत कर।’’
‘‘चलो कविता।’’ पापा ने रिक्शे पर बैठ कर कविता को पुकारा था और वह मामी-मामाओं के पांव छू कर रिक्शे में बैठ गयी थी।

इस घटना का ज़िक्र कविता की मां ने हर जगह किया। वह बहुत खुश थीं और कविता को दुआएं देते नहीं थक रही थीं। मुहल्ले में जिन लड़कियों ने इन घटनाओं के बारे में सुना, उन्होंने भी अपने घरों में भाइयों के बराबर हक पाने की आवाज़ उठायी और ज़्यादातर मामलों में कामयाब रहीं। कविता का बचपन घटनाओं से परिपूर्ण रहा था और उसे लगता था कि ऐसा इसलिए है कि वह कॉमिक्स पढ़ती है और हर चीज़ पर पैनी नज़र रखती है। उसकी इच्छा थी कि काश उसकी तरह कोई सुपरहीरोइन होती जिसके कारनामों को ले कर कॉमिक्स लिखे जाते और उसमें उसके ढेर सारे ऐसे कारनामों का वर्णन होता जिनमें उसे किसी सुपरहीरो की मदद नहीं लेनी पड़ती। उम्र थोड़ी बढ़ने के बाद उसे कुछ घटनाओं पर दुख होता था कि वह पूरी तरह से प्रतिक्रिया नहीं दे पायी जिसमें चाचा वाली घटना उसका सबसे बड़ा दर्द थी।

                कविता ने आइएएस के दो और विभिन्न राज्यों के पीसीएस के पांच-छह प्रयास किये। एकाध राज्यस्तरीय परीक्षाओं में उसने प्रारंभिक परीक्षा पास तो कर ली लेकिन उसे समझ में आ गया था कि इन परीक्षाओं के लिए जो एकाग्रता और ‘काकचेष्टा बकोध्यानम’ चाहिए वह कहीं खो चुकी है। उसने अध्यापकी के लिये प्रयास किये और एक बार राज्य सरकार ने ट्रक भर के नियुक्तियों की लॉटरी निकाली तो उसमें कविता ने भी टिकट खरीद लिया। आश्चर्यजनक रूप से पहली बार में ही उसका चयन हो गया और उससे एक भी रुपया घूस की मांग नहीं की गयी।
गांव उसके शहर से ढाई-तीन घण्टे की दूरी पर था इसलिए रोज़ अप-डाउन करना अच्छा विकल्प नहीं था। उसे उसी गांव में कमरा लेना पड़ा। उसके पिता और मां उसके साथ गये और उसे कमरा दिलवा, रसोई के, ओढ़ने बिछाने और अन्य ज़रूरी इंतज़ाम कर चले आये। अब कविता थी और उसके अंधेरे उजाले। ज़िंदगी में पहली बार वह इस तरह अकेली हुई थी। 

गांव का नाम हरियालीगंज था लेकिन वहां ज़रा भी हरियाली नहीं थी। उसके स्कूल के हेडमास्टर का नाम मनोहर प्रसाद था और उसमें कुछ भी मनोहर नहीं था। स्कूल में पढ़ाई छोड़ कर बाकी सब कुछ होता था और गांव की प्रधान हो कर भी मनकिया सिर्फ़ गाहे-बगाहे मार खाने वाली आम औरत थी। प्रधान का पद वहां मनकिया का पति मोंटेक सिंह ही संभालता था और महिलाओं के लिये कुछ सीटों  की मजबूरी कर दिये जाने के कारण वे खड़ी हो कर जीत तो जाती थीं लेकिन उनके लिये परेशानियां और बढ़ ही जाती थीं। वे चुनाव में खड़ी होती थीं और अपनी जाति, पति के रसूख के साथ पति के बताये हर पैंतरे का इस्तेमाल करती थीं और जीतने के बाद नेपथ्य में चली जाती थीं। जीतने के बाद मन में जो एकाध उम्मीदें उठती थीं वह पति के व्यंग्य भरे तानों, जिनका एक ही अर्थ हुआ करता था जीत के उड़ने लगी?’ के कारण पहले से भी मुश्किल मनःस्थिति में खाना पकाती थीं जिसके कारण कई बार दाल में अधिक नमक पड़ जाता था और उन्हें बिना मतलब के मार खानी पड़ती थी।

स्कूल में आने वाले लड़कों को सिर्फ़ दोपहर में मिलने वाले खाने का इंतज़ार रहता था और लगभग सभी इस फिराक में रहते थे कि खुद खाने के बाद थोड़ा खाना घर भी ले जाया जाय। बच्चों का मन पढ़ने में बिल्कुल नहीं लगता था और वे हमेशा अपनी उम्र से बड़ी और अश्लील बातें करते थे। खाने के वक्त कई बिना नाम लिखाये बच्चे भी आ कर बैठ जाते थे और अध्यापक कुछ न भी बोलें तो वे आपस में गंदी गालियां देते हुये लड़ाई करते रहते थे। उसका दिमाग भन्ना गया जब उसने देखा कि स्कूल के सड़े-गले बाथरुम में जाते वक्त एक पांचवी क्लास का बच्चा छिप कर उसे देख रहा था। उसे विश्वास नहीं हुआ। उसने बच्चे को बाहर निकल कर पकड़ लिया।
‘‘क्या देख रहे थे?’’ उसने कड़ाई से डांटते हुए पूछा। बच्चे ने कोई जवाब नहीं दिया।
‘‘बताओ क्या देख रहे थे नहीं तो मार खाओगे?’’ कविता ने छड़ी उठा ली।

‘‘पवनवा भोसड़िया वाला कहा था कि करिक्की मैडमवा आग मूतती है तो हम देखने गये थे।’’ बच्चे ने सहमी आवाज़ में कहा। कविता ने इसके पहले भी भद्दे कमेंट सुने थे लेकिन इतने छोटे बच्चे के मुंह से यह सुनना कलियुग के खत्म होने का संकेत था। कोई और ही युग शुरू होने वाला था। उसे बच्चे से ज़्यादा पवन पर गुस्सा आया लेकिन वह कुछ कह नहीं सकती थी। पवन उससे सीनियर टीचर था और पास के जिले से मोटरसायकिल पर आता था। साइन करके एकाध घंटा वहीं बैठ कर सिगरेट पीना और हल्ला मचा कर चले जाना उसका नियम था। बकौल पवन उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था कि वह अध्यापक संघ का चुनाव लड़े और नोट छापे। उसने पवन की एकाध बार बात करने की कोशिशों को नज़रअंदाज़ कर दिया था। उसने उस बच्चे पर गुस्सा आने के बावजूद उसे प्यार से समझाया कि कोई उसके बारे में कुछ बोले तो वह तुरंत आ कर उसे बताये। बच्चे कविता से अच्छा व्यवहार पा कर उसे पसंद करने लगे वरना इसके पहले स्कूल का माहौल कुछ ऐसा था कि सरस्वती पूजा या किसी कार्यक्रम वाले दिन बच्चों से खाना बनवाते वक्त कोई पिछड़ी जाति का बच्चा लोटे या आटे आलू को छू भी देता तो बवाल मच जाता। पवन एकाध बच्चों को पीट भी देता।

‘‘केतने बार कहे हैं कि तू लोग सफाई ओफाई के काम देख सब....चल भाग, भंडारे में मत आ।’’ ज्यादा से ज्यादा यादव या बढ़ईयों के बच्चे बच्चियों को रसोई के कामों में लगाया जाता। पिछड़ी जाति के बच्चे इस भेदभाव को नियति समझ ज़्यादा आश्चर्य न प्रदर्शित करते हुए इसे वाकई अपनी गलती मान लेते और अपने काम में लग जाते।

पवन एक दिन शिक्षामित्र वीरेंद्र से बातें कर रहा था कि कविता उधर से गुज़री। पवन ने उसे बुलाया तो वह इच्छा न होने के बावजूद वहां जा कर बैठ गयी क्योंकि सामने से आते मनोहर ने भी उसे वहां पड़ी एक खाली कुर्सी पर बैठने का इशारा किया था। वीरेंद्र अपनी हर हरकत से शिक्षा का शत्रु साबित होता था लेकिन उसका पद शिक्षामित्र का था। वह प्रधान मोंटू का साला था और उसकी हरकतें साबित करती थीं कि उसके और शिक्षा व्यवस्था के बीच भी जीजा-साले का ही रिश्ता है।

‘‘और सुनाइए कविता जी, कैसा लग रहा है यहां ?’’ मनोहर अक्सर यह सवाल कविता से पूछता था लेकिन कविता समझ जाती थी कि इसका कोई मतलब नहीं है और ये लोग समय काटने के लिये किसी भी मुद्दे पर बात कर सकते हैं। उसने कोई जवाब नहीं दिया, सिर्फ़ मुस्करा भर दी जिसका अर्थ था ठीक ही चल रहा है।
‘‘और सर, टीएलएम कब तक आ रहा है ? गाड़ी की सर्विस नहीं करवायी इस साल।’’ पवन ने थोड़ी दूरी पर खड़ी अपनी खस्ताहाल मोटरसायकिल की ओर देखते हुए पूछा।
‘‘अरे पांच सौ रुपिये के लिये इतना हल्ला मचाये रहते हो तुम लोग....आ ही जायेगा कुछ दिन में।’’ मनोहर ने कहा।
‘‘देखिये न जरा...गरीबों का ध्यान रखिये थोड़ा....।’’ पवन ने फिर से वही खिसियानी हंसी बिखेरी तो कविता को वितृष्णा सी हुयी और वह उठ गयी।

कविता ने पता किया तो सुमन मैडम ने बताया कि हर साल अध्यापकों को चाक, नक्शा और अन्य सामग्रियां (टीचिंग लर्निंग मटेरियल) खरीदने के लिये कुछ 500 रुपये मिलते हैं जो हेडमास्टर और प्रधान के खाते में आता है। उससे लोग अपने रुके हुए काम पूरा करते हैं जैसे सुमन मैडम उससे ढेर सारा ऊन खरीदेंगीं और पूरे घर के लिये स्वेटर बनाएंगीं और पवन अपनी मोटरसायकिल की सर्विसिंग करायेगा। सुमन मैडम ने कविता को बिना मांगे सलाह दी कि इस पैसे से वह अपने लिये कोई हल्के रंग का सूट बनवा ले।

उस दिन जब वह पढ़ा कर स्कूल से निकली तो स्कूल की इमारत पर उसे कुछ फड़फड़ाहट सुनायी दी। उसने पलट कर देखा तो भौंचक रह गयी। दो गिद्ध वहां बैठे नीचे की ओर देख रहे थे जहां बैठ कर बच्चे पढ़ाई कर रहे थे। वह डर गयी लेकिन मन कड़ा करके उसने हो हो हो की आवाज़ करते हुये कुछ पत्थर उठा कर उनकी ओर चलाये। गिद्धों को कोई फर्क़ नहीं पड़ा और वे आराम से इसे अपना अधिकार-क्षेत्र मान कर न जाने आंखों में किस चीज़ का इंतज़ार लिये बैठे रहे। कविता की नज़र उनकी आंखों पर पड़ गयी और उसके रोंगटे उनमें अजीब से बरबादी के भाव देख कर खड़े हो गये। वह तेज़ कदमों से वहां से निकलने लगी। उसके हो हो की आवाज़ सुन कर पवन मनोहर के ऑफिस से निकल कर बाहर आ गया। उसने देखा कि कविता तेज़ कदमों से बाहर जा रही है। वह उसके पीछे आया और गेट के पास आ कर उससे पूछा।

‘‘क्या हुआ मैडम जी ?’’
कविता ने संकोच करते हुए बताया कि उसने स्कूल की इमारत पर दो गिद्ध देखे हैं तो पवन हंसने लगा।
‘‘आप पढ़ी तो हैं सहर से लेकिन आपका जनरल नालेज एकदम्मे गायब है। अरे गिद्ध खतम प्रजाति है, जानती नहीं हैं का आप ?’’ वह हंसने लगा। कविता वहां से तुरंत निकल आयी कि फिर किसी और का सामना न करना पड़े।

उसे लगने लगा कि वह ज़्यादा दिन इस स्कूल में नहीं पढ़ा पायेगी। लेकिन किसी बच्चे में अचानक उसे कोई संभावना दिखायी दे जाती तो उसका डूबता हुआ उत्साह फिर से सतह पर आ कर हाथ-पांव मारने लगता। लेकिन फिर कोई ऐसी घटना हो जाती कि उसका उत्साह उस घटना और आसपास के माहौल की बर्फ़ से ठंडा होने लगता। पूरे स्कूल में एक भी कोई ऐसा नहीं था जिससे कविता अपने मन की बात कर पाती। हालांकि मनोहर ऐसी कोशिशें करता रहता कि कविता उसे अपना हितैषी समझे लेकिन मनोहर की कोशिशें कविता को और झल्ला देतीं। धीरे-धीरे कविता की आंखें एक लड़के पर टिक गयीं। पांचवी कक्षा का माधव नाम का लड़का बहुत जल्दी हर चीज़ याद कर लिया करता था। कविता की पूरी कक्षा जब नौ के पहाड़े से जूझ रही थी माधव ने कविता के सिर्फ़ एक बार रटाने पर उन्नीस का पहाड़ा याद कर लिया था। उसका मन गणित में भी खूब लगता था और वह अपने मन से भी कुछ न कुछ सवाल लगाता रहता। कविता को उस बच्चे की पढ़ाई देख कर राहत मिलने लगी। कविता पाठ्यक्रम की पढ़ाई के अतिरिक्त कुछ अलग चीज़ें भी बच्चों को सिखाती और बताती रहती ताकि उनमें अच्छे गुणों का विकास हो। वह यूं ही अचानक किसी भी विषय पर बच्चों को कुछ भी लिखने के लिये कह देती जिससे उससे बच्चों की सोच का पता चलता। कभी कुछ पहेलियां बूझने को दे देती जिससे बच्चों की कल्पनाशीलता से वह परिचित हो पाती। एक दिन मां द्वारा बचपन में सुनायी गयी एक कहानी को उसने पहेली में बदल कर बच्चों से पूछा। 

‘‘मान लो किसी श्राप की वजह से पूरे गांव के लोगों के हाथ मुड़ना बंद हो जायें और एकदम सीधे हो जायें तो वे खाना कैसे खाएंगे?’’ उसने इस पहेली को पूरी तरह आसान बना कर बच्चों के सामने रख दिया और कहा कि वे रात भर सोच कर कल कक्षा में इसका जवाब बताएं। कुछ अति उत्साही बच्चे उसी समय अपनी कल्पनाशीलता दिखाने लगे। ‘‘पूरा खाना नांद में डालकर गोरू के जइसे मुंह डाल कर खाएंगे सब लोग।’’ कविता ने सभी जवाबों को एक-एक कर वाजिब कारण बताते हुये खारिज़ कर दिया। ‘‘नहीं, ऐसे तो पूरे मुंह पर खाना लग जायेगा, सफाई से खाना है।’’ सब बच्चे आपस में इसी सवाल पर चर्चा करते हुये घर गये। कविता पढ़ाई के ऐसे तरीकों से धीरे-धीरे बच्चों के बीच लोकप्रिय होने लगी थी।

रात के नौ बजे थे और गांव के हिसाब से यह काफी रात थी। उसे बाहर वाला कमरा दिया गया था और घर के मालिक और उनका परिवार हद्दाहद्दी आठ बजे तक सो जाता था। शहर के अपने रूटीन के कारण कविता कितनी भी जल्दी सोये तो ग्यारह तो बज ही जाते थे। अचानक उसे दरवाज़े पर हल्की खटपट सुनायी दी। उसका असुरक्षा बोध फिर निकल कर सामने खड़ा हो गया। वह कहीं भी, किसी भी परिस्थिति में डरती थी तो एक पल के लिये चाचा का चेहरा ज़रूर आंखों के सामने घूम जाता था। उसने ऐसी स्थिति के लिये अपने सिरहाने रखा हथौड़ा उठाया और दरवाज़े के पास पहुंची।

‘‘के हौ...।’’ उसने ठेठ बोल कर जैसे खुद को हिम्मत दी कि वह इसी गांव की है और किसी के घर आना जाना किसी के लिये आम बात होनी चाहिये। बदले में उत्तर भी ठेठ में आया।
‘‘हम हई बहिन जी, माधो।’’ कविता की जान में जान आयी। उसने दरवाज़ा खोला। माधव ने लपक कर उसके पैर छू लिये। कविता को थोड़ा अटपटा लगा, स्कूल में पांव छुआने की आदत हो गयी थी लेकिन स्कूल के बाहर ये एक अंजानी सी प्रक्रिया थी।

‘‘इतनी रात को...?’’ कविता का आत्मविश्वास वापस लौट आया था और वह मैडम जी ऑन ड्यूटीहो गयी थी।
‘‘सब लोग दो-दो लोगों का झुंड बना लेंगे। हाथ में कौर ले के अपने-अपने जोड़ीदार को खिला देंगे तो किसी का मुंह भी नहीं गंदा होगा और सबका पेट भी भर जायेगा।’’ माधव शायद दौड़ कर आया था इसलिये हल्का हांफ भी रहा था लेकिन पहेली समझ जाने का उत्साह सभी चीज़ों पर हावी था।
‘‘सही है ?’’ उसने शंका से पूछा। कविता के मन में एक साथ विचारों के महाझुण्ड ने आक्रमण कर दिया था। ‘‘हां सही है माधव, एकदम सही, शाबास।’’ उसने अपने भीतर एक आनोखी सी खुशी अनुभव की। ‘‘अब तुम घर जाओ।’’ माधव ने फुर्ती से अपने मैडम के पांव छुए और हिरन की तरह भाग गया। कविता कुछ देर वहीं खड़ी रही। ठंडी हवा शरीर में लग रही थी तो झुरझुरी सी हो रही थी और मन करता था कि कहीं दूर कोई मधुर गीत बजने लगता। कविता दरवाज़े से थोड़ा आगे जा कर टहलने लगी, उसे लगा उसे कुछ ज़्यादा ही डर लगने लगा है और इससे बचने की कोशिश की जानी चाहिए। माधव के जवाब ने उसे एक साथ बहुत सारी चीज़ें बता दी थीं। वह अपने प्रयोग की पहली बड़ी सफलता देख कर प्रफुल्लित थी। वह टहलती हुई आगे गयी तो अचानक बंसवारी के पास कोई चमकती हुयी चीज़ दिखायी दी। उसे थोड़ा डर फिर से लगा लेकिन उसने डर को काबू किया और छोटे कदमों से वहां तक पहुंची। एक पत्थरनुमा चीज़ थी जो चांदनी रात में एक खास कोण पर चांद की रोशनी पड़ने के कारण चमक रही थी। उसने हिचकिचाते हुए पत्थर को हाथ में उठा लिया। पत्थर ख़ासा वज़नी था और उसे देख कर नहीं लगता था कि उसका वज़न इतना अधिक होगा। कविता उसे लिये अपने कमरे में आ गयी। उसकी दिल की धड़कन बहुत तेज़ चल रही थी। बचपन में मां की सुनाई हुयी कहानियां दिमाग में गूंज रही थीं। उसने कांपती उंगलियों से मां को फोन लगा दिया। मां घबरा गयी कि इतनी रात को क्या हो गया। कविता ने सिर्फ यही पूछा कि पारस पत्थर की निशानी क्या होती है। मां ने बताया कि देखने में आम पत्थर जैसा ही होता है लेकिन उसका वज़न थोड़ा अधिक होता है और वह चांदनी रात में बहुत चमकता है। लोहे को उस पत्थर से छुआते ही लोहा सोना नहीं बनता बल्कि उसे काफी देर तक लोहे पर घिसना होता है तब कहीं जाकर सोना मिलता है। मां ने यह पूछने का कारण पूछा तो कविता ने कहा कि वह इस शनिवार घर आयेगी तो बता देगी। 

उसने एक लोहे की अपनी क्लिप निकाली और उसे उस पत्थर से घिसने लगी। पहले घंटे तो कुछ नहीं हुआ लेकिन दूसरे घंटे में जब क्लिप का रंग बदलने लगा तो कविता की धड़कनें बढ़ने लगीं। क्लिप सोने में बदल रही थी। पूरे तीन घंटे घिसने के बाद लोहे की वह साधारण सी क्लिप सोने में बदल कर जगमगा रही थी। कविता ने घड़ी देखी। सुबह के चार बज रहे थे। उसे बड़ी मीठी नींद आ रही थी। क्लिप को उसने अपने हैंडबैग में रखा और सो गयी। उस दिन वृहस्पतिवार था।
अगले दो दिन कविता के लिये बहुत कठिन बीते। उसने मां के कई बार पूछने के बावजूद कुछ नहीं बताया और तीन कलमों और चश्मे के एक फ्रेम को सोने में बदल लिया था। बच्चों को पढ़ाने में उसे एक अलग तरह का उत्साह आने लगा था क्योंकि बच्चे उसकी बातों को समझने लगे थे। उसे लगने लगा था कि अगर छोटे बच्चों की नींव सुधार दी जाये तो आगे जाकर वे किसी भी कॉलेज से पढ़ाई करें या न भी करें तो उस फेरी वाले या उसके चाचा जैसी मानसिकता उनकी नहीं हो सकती। उन्हें मानसिक रूप से स्वस्थ बनाने का सिर्फ एक ही तरीका है कि उनका निर्माण अभी किया जाये जब उनकी मिट्टी कच्ची है। कविता को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास बहुत शिद्दत से हुआ। उसके साथ वालों और उस जैसे बहुत सारे अध्यापकों का यह मानना था कि नौकरी को नौकरी की तरह करना चाहिए लेकिन कविता ने देखा कि उसे देश के भविष्य में सबसे बड़ा योगदान करने के लिये चुना गया है। वह चाहे तो साल में दो ढाई सौ अच्छे और सभ्य नागरिक तैयार कर सकती है। उसके मन में बी.एड. के दौरान पढ़ी गयी शिक्षा शास्त्र की वह किताबें दौड़ने लगीं जिनमें बताया गया था कि बच्चों के मानस का जितना निर्माण होना होता है, वह किशोरावस्था तक पहुंचने के काफी पहले ही हो चुका होता है।

कविता ने घर पहुंचने पर शाम होने तक का समय बहुत बेसब्री से बिताया। शाम की चाय पर जब वह अपने मां पापा के साथ बैठी तो उसके पापा ने स्कूल में चल रही पढ़ाई के विषय में पूछा। कविता उत्साहित होकर बताने लगी।
‘‘पहले तो बहुत खराब लगता था पापा, मुझे लगता था कि इन बच्चों का कुछ नहीं किया जा सकता। माहौल इतना खराब है कि कोई टीचर वहां पढ़ाना तो दूर, पूरे टाइम तक रुकता भी नहीं स्कूल में। बच्चों में पढ़ने की एकदम रुचि नहीं है पापा....।’’
‘‘बच्चों को क्या पता बेटा, तुम्हारा ही कौन सा मन लगता था पढ़ने में सिर्फ़ कॉमिक्स और कहानियों के अलावा ? फिर टीचरों और हमारी पढ़ाई के सिस्टम ने सभी बच्चों को पढ़ाई से दूर करने का ठेका जो ले लिया है।’’ पापा मुस्कराये।

‘‘लेकिन अब मुझे समझ आ गया है पापा कि बच्चों को कैसे पढ़ाई के लिये प्रेरित करना है। उन्हें वो पुराने तरीके नहीं समझ में आते, मैं उन्हें अपने तरीके से पढ़ा रही हूं और गज़ब की प्रोग्रेस दिख रही है मुझे पापा।’’ कविता का उत्साह देख कर पापा खुश थे। उन्होंने कहा कि बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा से जोड़ने के लिये ज़रूरी है कि कुछ नये तरीकों से उस पढ़ाई में आकर्षण पैदा किया जाये जिससे दूर करना और फिर पास लाने के लिये करोड़ों रुपये योजनाओं में फूंकना सरकारी लक्ष्य है। कविता ने कुछ उदाहरण बताये जिसमें कुछ कहानियों से उसने बच्चों को प्रेरित किया था और बहुत जल्दी उसे सकारात्मक परिणाम दिखायी दिये थे। वह पापा का प्रोत्साहन पाकर बहुत खुश थी। वह पापा की शुक्रगुज़ार थी कि उन्होंने उसे ऐसी शिक्षा दी थी कि वह कुछ नया सोच पायी। उसे अपनी ज़िंदगी का मकसद दिखायी दे रहा था। रात होते ही उसने मां को चुपके से वह पत्थर दिखाया।
‘‘देखो तो, कभी देखा है पारस पत्थर ?’’ मां हाथ में ले कर गौर से उसे देखने लगी। उन्होंने सिर्फ किस्से कहानियों में इसका ज़िक्र सुना था वह भी अपनी दादी से। खुद उन्होंने कोई कहानी नहीं पढ़ी, उन्होंने पांच पास ही किया था कि उनका स्कूल छुड़वा लिया गया था और घर के कामों में झोंक दी गयी थीं। कविता ने सबूत के तौर पर उन्हें सोने की चीज़ें दिखायीं तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गयीं। दोनों मां बेटी बैठ कर देर तक बातें करती रहीं।

इस बार जब कविता स्कूल पहुंची तो वह नये जोश के साथ बच्चों को पढ़ाने में लग गयी लेकिन तब तक उसके बारे में कुछ बातें इधर-उधर फैल चुकी थीं। उसकी उपेक्षा से घायल मनोहर ने उसे अपने दड़बेनुमा केबिन में बुलाया।
‘‘पढ़ाई कायदे से करवाइये कविता जी, ये सब क्या होमवर्क देती रहती हैं कि नाव में एक बार में चार लोग कैसे पार होंगे, अरे नैतिक शिक्षा पढ़ाइए, महापुरुषों की जीवनी, जोड़ घटाना गुणा भाग पढ़ाइए, बच्चे साले ऐसे ही पढ़ाई से भागते रहते हैं, आप और मत दूर करिये उनको पढ़ाई से।’’ मनोहर ने उसे डांटने के लिये पूरी पटकथा तैयार कर रखी थी। उसने प्रतिवाद करने की कोशिश की।

‘‘नहीं सर, बच्चे ऐसे तरीकों से पढ़ाई के प्रति आकर्षित....।’’ मनोहर ने उसकी बात काट दी।
‘‘अरे छोड़िए....मैं आपसे पंद्रह साल पहले से पढ़ा रहा हूं आप चली हैं मुझे समझाने....। बुझउअल मत बुझाइए.....पढ़ाइए।’’ इसके बाद वह एक कड़वी सी व्यंग्य भरी मुस्कान मुस्कराया जिसे कविता बर्दाश्त नहीं कर पायी और पैर पटकती बाहर चली गयी। एक दिन उसने सुना कि पवन मनोहर से कुछ बातें कर रहा था। उसने अपना नाम सुना तो उधर से होकर गुज़री। उसे आता देख पवन ने मनोहर को एक शेर सुनाया जो इतनी धीमी आवाज़ में था कि कविता को सुनायी दे जाये।

‘‘मेरे महबूब को न कहो काला
मेरे महबूब को न कहो काला
खुदा तो तिल ही बना रहा था
पर लुढ़क गया रंग का प्याला’’

कविता को आश्चर्य हुआ कि उसे ज़रा भी गुस्सा नहीं आया। जबकि मुहल्ले में एक बार भी किसी की फुसफुसाहट में काला शब्द सुन लेती थी तो घर आकर घंटों तकिये में मुंह छिपाये पड़ी रहती थी और दो-तीन दिन गुमसुम सी रहती थी। इस समय उसे पवन पर गुस्सा नहीं आया बल्कि उसके ऊपर तरस आया। उसे लगा कि इसमें पवन की कोई गलती नहीं है। इस स्कूल के ढेरों मासूम बच्चों में से बड़े हो कर कुछ बच्चे पवन निकलते हैं, कुछ फेरी वाले और कुछ उसके चाचा जी तो इसमें सबसे पहला दोष तो उन्हें पढ़ाने वालों का है। उसे पवन से सुहानुभूति हुई। पवन दुनिया को वही लौटा रहा है जो उसके गुरुजनों ने उसे दिया है। उसे फिर एक बार अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास हुआ।

उसने बच्चों को अपने तरीके से पढ़ाना जारी रखा। बच्चे उससे घुल-मिल गये थे और कई जासूसी प्रवृत्ति के बच्चे तो उसे मनोहर और पवन की बातें भी बताते थे हालांकि ऐसा करने से उसने बच्चों को रोका और कहा कि किसी के पीठ पीछे उसकी शिकायत नहीं करनी चाहिए। स्कूल के बाकी अध्यापकों को कविता में और पढ़ाने किसी में रूचि नहीं थी और वे सारे काम कोरम की तरह पूरा करते थे। सुमन मैडम पूरा दिन स्कूल में हर मौसम में स्वेटर बुनती दिखायी देतीं तो मनमोहन मास्साब कक्षाओं में बैठ कर अखबारों की सारी खबरों को चाटने के बाद चुपचाप उनकी वर्ग पहेलियां हल करते। सिर्फ तनख्वाह मिलने वाले दिन वह एक दूसरे से बात करते थे। उसी दिन वे कविता से हालचाल भी पूछते, ‘‘क्या हाल है ? घर कब जा रही हैं? भई बड़ा मानते हैं बच्चे आपको, क्या राज है?’’ जैसे दो तीन सवालों का आदान-प्रदान कर के वे अपने घरों की ओर चले जाते। अगले दिन उनके चेहरे फिर मनहूस हो चुके होते और उन पर अगली तनख्वाह का इंतज़ार चिपका होता। उसने मनमोहन मास्साब से तो नहीं लेकिन सुमन मैडम से कहा कि उन्हें बच्चों को पढ़ाने में मेहनत करनी चाहिए तो वह फट पड़ीं।

‘‘अरे ये बच्चे हैं कि शैतान की आंत....इनकी हरामजदगियां बढ़ती ही जाती हैं हर दिन। मैं कैसे पढ़ाऊं जब कोई पढ़ना ही नहीं चाहे...।’’ कविता ने उनसे कहा कि बच्चों को फुसला कर पढ़ायें क्योंकि वे पढ़ाई का महत्व कहां जानते हैं।

‘‘अरे मैं क्या यहां बच्चे फुसलाने आयी हूं। देखो कविता जो पढ़ना चाहता है उसे मैं पढ़ाने से कभी पीछे नहीं हटती। मैंने पी-एच. डी. किया हुआ है, मैं कॉलेज या यूनिवर्सिटी में पढ़ाती तो सब मुझसे खुश रहते, ये गंवार बच्चे सिर्फ़ किताबों, ड्रेस और खाने के लालच में आते हैं विद्यालय, इन्हें क्या पढ़ाऊं ?’’ 

कविता समझ गयी कि बचने के बहुत अच्छे तर्क ईज़ाद कर लिये गये हैं। उसे समस्या के बढ़ते जाने का एक कारण तो यही लगा कि अधिकतर अध्यापक उन बच्चों को पढ़ाने की योग्यता से ज़्यादा पढ़े-लिखे हैं और उस पढ़ाई के आभामंडल से निकलना नहीं चाहते। उसने किसी से कुछ नहीं कहा और मन में यह तय कर लिया कि उसे इस पारस पत्थर के ज़रिये इन बच्चों की ज़िंदगी बदलनी है।

‘‘मां, हमें तो किसी चीज़ की कमी है नहीं, मैं उस पत्थर को बच्चों की भलाई के लिये प्रयोग करना चाहती हूं। जब तक वह घिसे उससे पहले मैं कम से कम अपने स्कूल के बच्चों के लिये कुछ-कुछ बना कर दे सकूं तो....।’’
‘‘पगली, तुझे लगता है कि वो घिस रहा है लेकिन वह जितना सोना बनाता जायेगा उसी अनुपात से बढ़ता रहेगा। तू चिंता मत कर वो घिसेगा नहीं बढ़ेगा।’’
मां की स्वीकृति पा कर वह निश्चिंत हो गयी। उसने कक्षा के सबसे संभावनाशील बच्चों पर तेज़ी से और बाकी बच्चों पर एक नियम बना कर काम शुरू कर दिया। उसने माधव के गले में लटका काला धागा ले लिया जिसमें एक लोहे का टुकड़ा गूंथा गया था। उसने उस टुकड़े को सोने में बदल कर माधव के गले में पहना दिया और फिर अन्य बच्चों पर भी ध्यान केन्द्रित किया।

पढ़ाई के उसने बहुत सारे नये तरीके खोजे जिनमें खेल-खेल में गणित के सवाल हल कराने के अलावा और भी बहुत सारे अभ्यास थे। उसने बच्चों को गानों और आरती की धुन पर पहाड़े याद कराये और कुछ ही दिनों में उसकी पूरी क्लास ने बीस तक पहाड़े याद कर लिये। सभी बच्चों को वह अपने गांव, अपने मुखिया, अपने स्कूल और अपने दोस्त जैसे विषयों पर अचानक निबंध लिखने को कहती जिससे उसे बहुत सारी बातें पता चलतीं जिससे उसे आगे की योजना में मदद मिलती। पहेलियां बुझाते हुए और खेल खेल में विज्ञान की बातें बताती चलती और लोककथाओं में पिरो कर भूगोल की गूढ़ताएं आसान कर देती। एक दिन एक पत्रकार वहां आया और उसने मनोहर से बच्चों को दिये जाने वाले दोपहर के भोजन के बारे में पूछा। उसी दौरान उसने कविता से भी कुछ सवाल पूछे और कविता से बातें करके तो वह मंत्रमुग्ध हो गया। उसने कविता के बच्चों को पढ़ाने के अलग तरीके देखे और अगले दिन कविता का साक्षात्कार छापने के साथ यह भी लिख दिया कि जिस दौर में अध्यापकों ने सरकारी स्कूलों को सिर्फ तनख्वाह बांटने वाला केंद्र समझ लिया है वहीं कविता जैसी उच्च शिक्षित और व्यवहारिक अध्यापिका के तरीके बच्चों को बहुत रास आ रहे हैं और वे स्कूलों में सिर्फ़ खाना खाने नहीं आते। 

एक दिन उसे अपने कमरे में बैठे पारस पत्थर से एक बच्चे के लोहे के कड़े को रगड़ते किसी ने देख लिया और पता नहीं कैसे ये बात रातोंरात स्कूल में फैल गयी कि कविता के पास एक ऐसा पत्थर है जिससे रगड़ने से लोहे की चीजें सोने की हो जाती हैं। देखते ही देखते सब कविता से मिलने और बातचीत करने के इच्छुक नज़र आने लगे। मनोहर ने उसे अपने केबिन में बुला कर चाय पिलायी और रुंआसे होकर बताया कि उसकी पत्नी पिछले दस सालों से बीमार है। उसकी सारी कमाई उसकी पत्नी के इलाज़ में चली जाती है और उसने कभी जाना ही नहीं कि दाम्पत्य सुख क्या है। इस भागादौड़ी में वह बहुत चिड़चिड़ा सा हो गया है, इसलिये उसने कविता को कभी कुछ भला-बुरा कह दिया हो तो उसे माफ़ कर दिया जाये। कविता ने उन्हें आश्वस्त किया कि उसके मन में मनोहर के प्रति को दुराग्रह नहीं है। मनोहर ने जाते वक्त उसे कहा कि कभी भी किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो वह उसे सिर्फ़ एक मिस्ड कॉल कर दिया करे। उसने थोड़ी मुस्कान के साथ यह भी कहा कि गांव में टॉवर हमेशा तो नहीं लगता लेकिन जब वह दिल से कॉल करेगी तो ज़रूर लगेगा। उसने यूं ही बातों-बातों में घुमा कर पूछा था कि क्या कविता को कोई चमत्कारी पत्थर मिला है तो कविता ने बात गोल कर दी थी।

पवन ने एक दिन कविता को अपनी लिखी एक कविता सुनायी और कहा कि यह कविता उसने उसी के लिए लिखी है। उसने बताया कि उसका बाप शराबी है और उसका बचपन गालियां सुनते मार खाते बीता है जिसके कारण उसके मुंह से भी गालियां निकल जाती हैं अन्यथा वह दिल से तो शायर है। कविता को उसने अपनी सबसे ताज़ा शायरी सुनायी।
‘‘आपके नेचर ने हम पर इतना इफेक्ट किया
सबको रिजेक्ट कर के हमने आपको सलेक्ट किया।’’

कविता ने बुझे मन और धीमी आवाज़ में वाहकहा तो पवन को लग गया कि उसकी शायरी ने कविता पर वो असर नहीं डाला जो उसने सोचा था। उसने झेंपने का अभिनय करते हुये कहा कि शेरो शायरी में उसे भी अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग पसंद नहीं लेकिन कभी-कभी ज़रूरी हो जाता है। वह झेंपने का अभिनय ही कर सकता था क्योंकि वह जिस पृष्ठभूमि से आता था वहां पुरुष किसी बात पर झेंपते नहीं थे, झेंपने का अवसर होने पर वे दांत निकाल कर बेशर्म हंसियां हंसते थे इसलिये पवन को झेंपने में बहुत मेहनत करनी पड़ी। कविता को समझ में आ गया कि उसकी वजह से पवन को झेंपने का अभिनय करना पड़ रहा है और वह इस दृश्य से ज़बरदस्ती जूझ रहा है। उसने बात को मोड़ दिया।

‘‘कोई बात नहीं, मैं भी मानती हूं कि एक भाषा में दूसरी भाषा के शब्द आने से भाषा समृद्ध होती है।’’ पवन का कठिन दृश्य तुरंत धूमिल हो गया। वह फिर से फॉर्म में आ गया और अपने पसंदीदा शॉट खेलने लगा।
‘‘प्यार आ जाता है आंखों में रोने से पहले
हर ख्वाब टूट जाता है सोने से पहले
इश्क है गुनाह यह समझ तो गये हैं हम
काश कोई रोक ले हमें यह गुनाह होने से पहले’’

कविता ने समझ लिया कि उसने मामला नहीं संभाला तो पवन उसे अपना ट्रक मान कर अपनी सारी शायरियां उसकी पीठ पर लिख देगा। उसने बात को पलटा और पवन से पूछा कि क्या उसे पता है कि बच्चों को सबसे अच्छा विषय कौन सा लगता है और क्यों? पवन ने कहा कि वह गणित और अंग्रेज़ी में बहुत कमज़ोर था और इतिहास की तिथियां उसे याद नहीं होती थीं। भूगोल उसे जटिलता के कारण कभी समझ में नहीं आया। उसे लगता है बच्चों को भी यही विषय डराते होंगे। कविता ने उससे पूछा कि उसे कौन सा विषय पसंद था। पवन ने कहा कि उसे नैतिक शिक्षा सबसे ज़्यादा अच्छी लगती थी और हमारे पूर्वजकिताब के सभी पाठ मुंहज़बानी याद थे। महापुरुषों की जीवनी उसे बहुत प्रेरणा देती थी और आज वह जो कुछ भी है अपने बचपन की उसी प्रेरणा के कारण है। ऐसा कहने के बाद पवन अपने चेहरे पर महापुरुषों के वही भाव ले आया जो उसने किताबों में देखा था। उसी उदास भाव में उसने कहा कि इस क्षेत्र में पिछले कुछ समय में कुछ चमत्कारी चीज़ें और घटनाएं उसे बहुत हैरान कर रही हैं। जैसे पिछले महीने एक गोमाता को दो सिर वाला बछड़ा पैदा हुआ था, शंकर भगवान की मूर्ति की आंख से आंसू निकला था और एक ऐसा पपीता मिला था जिसकी आकृति बिल्कुल गणेश भगवान की तरह थी। ऐसी कुछ और घटनाओं का ज़िक्र करने के बाद उसने गांव के मंदिर के महंत पौराणिक दूबे का नाम लिया और कहा कि जब तक वह हैं तब तक गांव हर मुसीबत से बचा हुआ है। गांव में किसी के साथ कोई अजीब घटना हो या कोई अजीब चीज़ मिले तो तुरंत उन्हें बताया जाना चाहिए। कविता ने भी उसे साथ हामी भरी तो उसने पूछा कि क्या उसे ऐसी कोई चीज़ मिली है। कविता ने ऐसा कुछ भी मिलने से साफ़ इंकार किया। उसने जाते हुए कहा कि अगर उसे गांव में या खास तौर पर वह जहां रह रही हैं वहां कोई भी संदिग्ध वस्तु दिखायी दे तो वह तुरंत उसे बताये वरना बाद में उसकी वजह से उस पर कोई मुसीबत टूट सकती है। संदिग्ध वस्तु के बारे में उसका कहना राज्यों की पुलिस के कहने जैसा था जिसे वह बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर लाउडस्पीकर में बजवाने के बाद इस बात पर चिंतित हुआ करते थे कि आखिर उनके मना करने के बाद ये बम विस्फोट कमबख्त हो कैसे जाते हैं।

पवन के अलावा बाकी दोनों अध्यापकों ने भी, जो स्कूल में सिर्फ़ ये देखने आते थे कि स्कूल की इमारत कल रात की आंधी में उड़ तो नहीं गयी, कविता को आगाह किया कि उसके पास अगर कोई चमत्कारी चीज़ हो तो उसे गांव के तालाब में फेंक दे। वह यहां पढ़ाने आयी है तो जैसे सब लोग पढ़ाते हैं, वह भी पढ़ाए और अपने घर जाये, ज़्यादा परेशानियां मोल न ले वरना लेने के जाने पड़ेंगे। कविता ने सबकी बातें सुनीं और अपने मन की करना जारी रखा। सुमन मैडम ने एक दिन कविता को अपने पास बैठा कर पत्थर के बारे में जानकारी लेनी चाही और कविता के इन्कार करने के बाद खुद को उससे अधिक पढ़ी और अनुभवी दिखाने के लिये उस पर कई बातों का रौब डाला जिनसे कविता अच्छी तरह वाकिफ़ नहीं थी।

‘‘बीएसए से मिली हो कभी ?’’
‘‘बीआरसी गयी हो कभी ?’’
‘‘पता है इस बार बीआरसी की प्रभारी मैं बनने वाली हूं ?’’
‘‘एनपीआरसी के बारे में क्या जानती हो ?’’
कविता जब लगभग सभी सवालों में फेल हो गयी तो सुमन मैडम ने गर्व से अपनी कुर्सी दूसरी ओर घुमा ली और सूरज से आंखें मिलाते हुये धूप सेंकने लगीं। सितंबर का महीना था और मौसम में धूप का स्वागत गान घुला हुआ था।

अध्यापक दिवस पर हर साल की तरह कुछ औपचारिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया था ताकि बच्चों में सद्भावना और एकता की भावना आये। बच्चों में तो अब तक इनके लक्षण नहीं दिखायी पड़े थे लेकिन अध्यापक और उनके वरिष्ठ अधिकारियों में ऐसे अवसरों पर खूब एकता देखी जा सकती थी। लेकिन इस बार बच्चे कुछ दूसरे मूड में थे। उनमें कुछ तो बदलाव हुए थे। आमतौर पर ऐसे दिनों पर सिर्फ़ लड्डू खाने की इच्छा ले कर स्कूल आने वाले बच्चों ने कविता के लिये एक कविता का सामूहिक गान किया और उसे एक उपहार भी दिया। माधव और उसके सहपाठी घीसू ने चौकी से बनाये गये मंच से सर्वपल्ली राधाकृष्णन की तस्वीर के आगे खड़े हो कर कविता को समर्पित कविता पढ़ी जिसमें कक्षा की लड़कियों ने कोरस किया तो बाकी अध्यापकों को सांप सूंघ कर बगल से निकल गया।

‘‘तुमने हमें अंधेरों से निकाला कविता मैडम
भरा हमारे जीवन में उजाला कविता मैडम
अज्ञानी थे मूरख थे हम सारे बच्चे बच्चियां
तुमने ईश्वर की तरह संभाला कविता मैडम’’

घीसू, माधव, सनीचर और सूरदास जैसे बच्चों की ये रचनात्मकता देख कर न सिर्फ़ बाकी अध्यापक बल्कि कविता भी दंग थी। इतने छोटे मासूम बच्चों ने जो कच्ची पक्की तुकबंदी की थी वह पवन की बकवास तुकबंदियों से बहुत अच्छी थी, उनमें भावना और परिश्रम कूट-कूट कर भरा था। कविता की आंखें भर आयीं और उसने जल्दी से पोंछा कि कोई देख कर उसका मज़ाक न बनाये। सभी बच्चों को सिर्फ़ गीत पेश करने की इजाज़त दी गयी थी लेकिन बच्चों ने गीत पेश करने के बाद अपनी पसंदीदा मैडम को स्टेज पर बुलाया और एक उपहार दिया जिसे उन्होंने किसी पुराने अखबार के टुकड़े से गिफ्ट पैक बनाने की कोशिश की थी। वह कक्षा की एक चुपचाप सी रहने वाली लड़की द्वारा बनायी गयी एक ऐसी पेंटिंग थी जिसमें कविता सभी बच्चों को एक पहाड़ पर बिठा कर पढ़ा रही थी और बाकी के अध्यापक नीचे से सिर ऊपर उठाये देख रहे थे। कविता उस चुप्पा लड़की की सोच और उसकी कला देख कर दंग रह गयी।

इस घटना के बाद से पता नहीं क्यों हर व्यक्ति कविता को अपना दुश्मन समझने लगा। एक दिन सूरदास की उंगली में एक सोने की अंगूठी देख कर उसे मनोहर ने अपने केबिन में बुला कर खूब डांटा। उसे डांटने के बाद उसने कविता को भी बुलाया।
‘‘आप यहां बच्चों को पढ़ाने आयीं हैं, जैसे पढ़ाया जाता है, पढ़ाइए चुपचाप। उन्हें गहने पहनाने की ज़रूरत नहीं। वे साले इसकी कद्र नहीं जानते।’’

कविता इसके बाद थोड़ी सजग हो गयी। उसने अपने कामों में थोड़ी गोपनीयता ला दी लेकिन फिर भी उसने गौर किया कि पूरे गांव का माहौल उसके खि़लाफ़ सा हो गया है। किसी दिन वह शाम को मंदिर जाती तो पुजारी न आशीर्वाद देता न प्रसाद, बस दूसरी ओर मुंह फिरा कर रास्ते से जा रही बकरियां गिनने लगता। अपने डेरे के आसपास के लोगों से बातचीत करने की कोशिश करती तो सब कोई न कोई बहाना बना कर उठ जाते। उसके मकान-मालिक और मकान-मालकिन ने भी उससे बात करना कम कर दिया था और कुछ पूछने पर हां हूं में ही जवाब देते। इन सारी बातों ने कविता में और जोश भरा और उसने शाम को गांव में टहलने जाने का नियम अनिवार्य कर दिया। वह अपनी कक्षा के बच्चों के घर जाती और बच्चों के अनपढ़ अभिभावकों को, जो हर समय बच्चे को काम में लगाये रखने के बारे में सोचते रहते थे, विद्या का महत्व समझाने की कोशिश करती। लेकिन अभिभावक थे कि कविता को ही समझाने लगते। उनका कहना था कि पढ़ाई को ज़्यादा दिल से लेकर क्या किया जायेगा क्योंकि आठ तक पढ़ने से कहीं कोई नौकरी मिल नहीं सकती और सरकार सिर्फ आठ तक की ही पढ़ाई मुफ्त करा रही है। ये तो उम्मीदें जगा कर ऐन वक्त पर उम्मीदें तोड़ने जैसी बात है। या तो पूरी पढ़ाई मुफ्त करो जिससे नौकरी मिलने की कुछ उम्मीद हो या फिर जो पढ़ना पढ़वाना चाहें उनको पढ़ाओ, सबको पकड़ कर साक्षर बनाना कौन सा ज़रूरी है। कविता कक्षा के मेधावी बच्चों के पिताओं और माताओं को उनके होनहार बच्चों के गुण के बारे में बताती तो मांए तुनक कर कहतीं, ‘‘अच्छा, मरकिरउनी ऐही खातिर घरवा एक्को कामे नाहीं करत। ए बहिन जी, देखा ढेर मत पढ़ावल करा।’’ बच्चों के अभिभावक कभी-कभी विद्यालय शिकायत करने ज़रूर आते लेकिन सिर्फ़ और सिर्फ़ खाने संबंधी किसी बात को ले कर या फिर ड्रेस या किताबें न मिलने की दुहाई देने। चेकिंग करने वालों का भी सारा ध्यान इस पर होता कि बुधवार को खीर बननी थी तो तहरी क्यों बनायी गयी। साल में एक बार मिलने वाले वज़ीफ़े का आकर्षण इतना था कि जो बच्चा कभी कक्षा में दिखायी नहीं देता, वज़ीफ़े मिलने की ख़बर सुन कर कक्षा में आ कर चुपचाप बैठ जाता। चालीस बच्चों की कक्षा के वजीफे़ के लिये कविता को पता चला कि सौ बच्चों के नाम भेजे जाते हैं और इतने के हिसाब से ही किताबें और सामग्रियां आती हैं। वज़ीफ़ा बांटे जाते समय कविता ने एक ऐसे बच्चे को देखा जो पहली बार कक्षा में आया था।

‘‘क्या नाम है तुम्हारा ?’’
‘‘बावनदास।’’
‘‘आज पहली बार आये हो कक्षा में ?’’
लड़का चुप रहा और अपनी कमीज़ के तीसरे बटन को घूरता रहा। ‘‘बताओ कहां थे अभी तक। पढ़ाई लिखाई करनी नहीं है और वजीफा मिलने का समय आया तो चले आये ? नहीं मिलेगा वजीफा। जाओ बाहर...।’’
लड़का फिर चुप रहा और उसकी आंखों में मोटे आंसू उभर आये। ‘‘किसलिये चाहिए वजीफा? ये पैसा इसलिए मिलता है कि किताबें और ड्रेस तो तुमको सरकार दे रही है, तुम लोग पेंसिल कॉपियां वगैरह खरीद सको। जब तुमको पढ़ना ही नहीं है तो लेकर क्या करोगे? चलो निकलो, नहीं मिलेगा वजीफा।’’

इस पर लड़का अचानक फूट फूट कर रोने लगा। कविता अचानक उसके रोने से घबरा गयी। और कक्षाओं में तो बच्चे मार खा कर रोते ही रहते थे लेकिन कविता की कक्षा में कोई बच्चा पहली बार रो रहा था। वह जल्दी से उसके पास गयी और उसे चुप कराने की कोशिश की। उसे एहसास हुआ कि उसने बच्चे को कुछ अधिक ही डांट दिया है।
‘‘चुप हो जाओ बेटा...। मैंने सिर्फ यही पूछा है कि क्या करोगे पैसे का ?’’ कविता ने आवाज़ में तरलता ला कर पूछा।

‘‘बाबूजी दारू पीहें....कहे हैं कि ले के आव पइसा नाहीं घरे में घुसे न देब।’’ लड़के ने रोते हुए कहा। वह हिल गयी। उसे लगा उसकी लड़ाई बहुत कठिन है। उसका मन भर आया। यह हालत तब है जब वह किसी के लिये कुछ अनोखा नहीं करना चाहती, सिर्फ़ ईमानदारी से अपना काम करना चाहती है। जो लोग दूसरों के लिये अपनी ज़िंदगियां दे देते हैं, उनका जीना कितना कठिन होता होगा जब सिर्फ़ अपने काम को काम मान कर करना इतना दुरूह है।
उसने टीएलएम के पैसे से चॉक और कुछ नक्शे खरीदे। नक्शों को अपनी कक्षा के अलावा और भी कक्षाओं और बरामदे में भी एक टंगवा दिया। नया चॉक फोड़ने के लिये उसे घीसू को बुलाया। घीसू ने ज़मीन पर चॉक पटक कर फोड़ा था कि वहां का फर्श धंस गया। घीसू ने ऊपर अपनी मैडम की ओर इस दृष्टि से देखा कि उसकी कोई गलती नहीं है। कविता ने उसे अपनी जगह बैठने को कहा और पूरी कक्षा लेने के दौरान उसकी नज़र उस टूटे हुये फर्श पर पड़ती रही जो मात्र खड़िया तोड़ने से दरक गया था।

वह अपने कमरे पर पहुंची तो पता चला कि उसके मकान-मालिक की बेटी शहर से आयी जो हॉस्टल में रह कर डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही थी। उसके आने से कविता को बहुत राहत मिली। वह कविता के कमरे में आती और घंटों बैठ कर उससे बातें करती।
‘‘जानती हैं दीदी, ये कमरा मेरा था आपके आने से पहले। मेरी सारी किताबें यहीं थीं।’’ कविता मुस्करा उठती।
‘‘अब भी तुम्हारा ही है सुजाता, जब चाहे आओ, जब चाहे जहां चाहे जो चाहे करो।’’ दोनों में एक बात कॉमन निकल आयी। दोनों कॉमिक्स की बहुत बड़ी दीवानी थीं बल्कि सुजाता में तो यह दीवानापन अब भी बरकरार था।

‘‘जानती हैं, अपने गांव में कॉमिक्स पढ़ने वाली मैं इकलौती थी और बाबा मुझे बहुत डांटते थे लेकिन मेरे नंबर अच्छे आने के कारण ज़्यादा कुछ कर नहीं पाते थे। मैंने उनसे कहा था कि मैं सब कुछ करने वाली यहां पहली ही होउंगी और देखिये आस पास के कई गांव मिला कर एमबीबीएस करने वाली मैं अकेली ही हूं।’’ कविता उसके हंसमुख स्वभाव के कारण बहुत जल्दी घुलमिल गयी। वह छिपाकर कुछ कॉमिक्स भी लायी और कविता को पढ़ने को दिया।
‘‘मां देख लेती है तो अब भी गुस्सा करती है। उसे लगता है मैं अब भी कॉमिक्स पढ़ के बिगड़ जाउंगी। लीजिए इतनी पढ़िए फिर और दूंगी। इत्तेफ़ाक कितना प्यारा है कि हमारी पसंद के सुपरहीरो भी वही-वही हैं।’’

कविता ने एक लंबे अंतराल के बाद अपने पसंदीदा पात्रों की कॉमिक्स पढ़ी थीं लेकिन उसे पहले जैसा मज़ा नहीं आया। एक तो बचपन का उसका गुस्सा अब परिपक्व हो चुका था कि कॉमिक्स में कोई सुपरहीरोइन क्यों नहीं होती और एकाध होती भी हैं तो उन्हें सुपरहीरोज़ की मदद क्यों लेनी पड़ती है? दूसरी बात यह कि उसका पसंदीदा किरदार सुपर कमांडो ध्रुव अब इतना हाइ-टेक हो चुका था कि असल ज़िंदगी, जिसके लिये वह उसे सबसे ज़्यादा पसंद करती थी, से बहुत दूर जा चुका था। वह सभी सुपरहीरोज़ से अलग हुआ करता था जिसकी ताकत उसका दिमाग थी और कविता ख़ुद के भीतर भी यही एकमात्र ताकत महसूस करती थी लेकिन अब वह नाइलॉन की रस्सियों पर झूलता रहता था और कभी भूत तो कभी भविष्य में घूमा करता था। कविता को लगा ज़िंदगी की तरह कॉमिक्सों में भी बहुत कुछ बनावटी होने लगा है।

शाम को उसने सुजाता को पूरी बात बतायी और कहा कि गांव में सभी उसे उपेक्षा की नज़र से देखते हैं।
‘‘वो तो देखेंगे ही दीदी, आज तक जो नहीं हुआ वो आप करने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने कभी ठीक से कपड़े तक नहीं पहने और आप उन्हें गहने पहनाने चली हैं। गहनों को ये लोग अपने शरीर की शोभा मानते रहे हैं और इन्हें डर है कि आपने इन बच्चों को भी गहने पहना दिये तो कल को इनमें और उनमें फ़र्क क्या रहेगा। इसी फ़र्क को कायम रखने में इनकी पीढ़ीयां निकली जा रही हैं।’’

कविता ने कहा कि उसे कभी-कभी डर लगता है कि उससे यह काम नहीं होगा तो सुजाता ने उसे सांत्वना दी। कविता ने कहा कि वह सिर्फ़ अपना काम ईमानदारी से करना चाहती है और इससे जुड़ी तकनीकी बातों की भी उसे बहुत अधिक जानकारी नहीं है। उसने सुमन मैडम की सुनायी गयी बातें सुजाता को बतायी तो वह देर तक हंसती रही। उसने कविता को संक्षेप में प्राथमिक स्कूलों के मोटे-मोटे स्ट्रक्चर के बारे में बताया।

‘‘अरे दीदी बीआरसी ‘ब्लॉक रिर्सोसेज सेण्टर’ होता है जहां साल में एक बार बिल्डिंग मेंटेनेंस, रंगाई पुताई, कुर्सी मेज का पैसा आता है। कमाने के लिये अच्छी जगह है वह इन लोगों के लिये। आमतौर पर नियुक्ति के लिये फॉर्म भी वहीं जमा होते हैं और किसी वरिष्ठ टीचर को बीआरसी प्रभारी बना दिया जाता है और ये खुशी से कूदते चलते हैं।’’
‘‘मुझे तो ये सब पता भी नहीं है ठीक से.....।’’ कविता ने धीमी आवाज़ में कहा।
अरे जिनको पता है वे कौन सा तीर मार रहे हैं। मुझे भी बहुत डीटेलिंग नहीं पता लेकिन खाने पीने के जो अड्डे हैं इनके, उसकी थोड़ी बहुत ख़बर है मुझे। देखिए बीआरसी के अलावा उससे छोटा होता है एनपीआरसी यानि न्याय पंचायत रिर्सोसेज सेंटर। इसके अंडर में मेरे खयाल से 10-12 स्कूल होते हैं और जहां तक मेरी जानकारी है ये बीआरसी और स्कूल के बीच का समन्वयक होता है और बीआरसी से स्कूलों तक किताबें पहुंचाता है।’’
’’बाप रे ! इतनी व्यवस्थाएं हैं.....फिर क्यों इतनी खराब है प्राथमिक शिक्षा की स्थिति ?’’ कविता आश्चर्य में थी। सुजाता ज़ोर से हंसी।

‘‘दीदी आपको एक कहानी सुनाती हूं, सुनेंगीं ?’’ कविता ने हामी भर दी। सुजाता ने गला खंखार कर कहानी सुनानी शुरू की।

‘‘तो सुनिये, एक राजा था जिसे रात को सोते वक्त मलाईदार दूध पीने की आदत थी। उसका नौकर उसे मलाई डाल कर दूध देता था और राजा पी कर आराम से सो जाता था। एक दिन नौकर ने सोचा कि अगर वह आधी मलाई खा ले तो राजा को क्या पता चलेगा। उसने आधी मलाई खुद खा ली और राजा को दूध दे आया। पहले तो राजा ने इसे संयोग समझा लेकिन जब हर रात ऐसा होने लगा तो उसने नौकर के ऊपर एक अधिकारी नियुक्त कर दिया जो राजा को पूरी मलाई मिलना सुनिश्चित करे। राजा को दो-चार दिनों तक पूरी मलाई मिली और वह खुश हुआ लेकिन इधर पुराने नौकर ने आधी मलाई में से आधा उस अधिकारी को देने की बात पर उसे अपने साथ मिला लिया। राजा को फिर से आधी मलाई मिलने लगी और पूछने पर अधिकारी जवाब देता कि सब कुछ सही चल रहा है, गाय दूध ही पतला दे रही है और नौकर का कोई दोष नहीं है। राजा को कुछ गड़बड़ लगी और उसने इन दोनों पर नज़र रखने के लिये एक और बड़ा अधिकारी तैनात कर दिया। इस बार नौकर और पिछले अधिकारी ने मलाई का लालच दे कर उस अधिकारी को भी अपनी ओर मिला लिया और राजा को पहले से भी कम मलाई मिलने लगी। पूछने पर वह उच्चशिक्षा प्राप्त अधिकारी कहता कि नौकर और उसके ऊपर का अधिकारी अपना काम पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं और आजकल गायों के चारे में इतनी मिलावट होने लगी है कि मलाई बहुत कम जम रही है। अब राजा ने एक अलग विभाग बना दिया मलाई विभागऔर तीन लोगों की कमेटी के हाथों में इसे सौंप दिया, उसकी मासूम मांग यही थी कि उसे पूरी मलाई जैसे पहले मिलती थी, मिले। जानती हैं दीदी इसके बाद क्या हुआ?’’ कविता के होंठों पर मुस्कान थी और सुजाता कहानी सुनाते हुए हंस रही थी।

‘‘क्या हुआ?’’ कविता की मुस्कराहट बढ़ गयी थी।
‘‘इसके बाद जो दूध आया उसमें ज़रा भी मलाई नहीं थी। पूछने पर सबकुछ एकदम ठीक बताया गया और गड़बड़ियों के वाजिब कारण गिनाते हुये बारह सौ पृष्ठों की रिपोर्ट भी प्रस्तुत कर दी गयी।’’ सुजाता की मां चाय ले कर आयीं और दोनों को एक-एक कप देकर खुद भी वहीं बैठ गयीं और पीने लगीं।

‘‘प्राथमिक शिक्षा की हालत भी ऐसी ही हो गयी है दीदी।’’ सुजाता की सारी हंसी कहीं गायब हो गयी थी और उसके चेहरे पर अपूर्व गंभीरता थी जिसकी परछाईं कविता के चेहरे को पूरा ढक ले रही थी।
मम्मी के टोकने पर दोनों ने बातचीत का टॉपिक बदला और मां बेटी दोनों ने मिल कर कविता को जोश में लाने के लिये कुछ अच्छी-अच्छी बातें कीं। कविता सामान्य हो गयी थी। सुजाता ने उससे कहा कि चिंता की कोई बात नहीं बस वह कुछ समय और पढ़ा ले फिर वह गांव में आकर प्रेक्टिस करेगी और दोनों का अकेलापन खत्म हो जायेगा। 

हम दोनों जम के अपना-अपना सपना पूरा करेंगे और खाली वक्त में खूब कॉमिक्स पढ़ेंगे।’’ सुजाता ने कहा।
‘‘मैं सोचती हूं हम कॉमिक्स लिखना भी शुरू करें, मेरी स्केचिंग काफी अच्छी रही है।’’ कविता ने मुस्कराते हुए कहा।
‘‘अर्रे वाह क्या बात है दीदी, वी विल रॉक। बस आप डेढ़ साल और पढ़ाइए फिर मैं आ रही हूं आपको ज्वाइन करने। टु मेक आवर विलेज अ बेटर प्लेस टु लिव।’’ सुजाता की मां कुछ कहना चाहती थीं लेकिन सिर्फ़ मुस्कराती रहीं।

लेकिन डेढ़ साल एक लंबा अंतराल होता है। ज़िंदगी जब करवट लेती है तो डेढ़ मिनट भी भूकंप आने के लिये बहुत होते हैं वरना बरसों तक कई चेहरे एक जैसे बने रहते हैं।
कविता को जिस सुबह अपने घर शहर जाना होता था वह स्टेशन जाकर शाम को ही टिकट ले आती थी क्योंकि सुबह काफी भीड़ हो जाया करती थी। उस दिन जब वह स्टेशन से अगले दिन का टिकट लेकर आ रही थी तो अंधेरे में उसे नहर के पास तीन लोगों ने रोक लिया। उनके हाथ में रॉड थी और उन्होंने चेहरे तक कम्बल ओढ़ रखा था।
‘‘बता सोना बनाने वाला पत्थर कहां है ?’’ एक अपरिचित आवाज़ ने रॉड उसके सिर पर तान कर पूछा। 

‘‘मेरे पास नहीं है ऐसा कुछ भी....।’’ कविता ने फंसी हुई आवाज़ में कहा। अगर लोहे की रॉड की जगह कोई हॉकी स्टिक या ऐसी कोई चीज़ होती तो पंगा लेने का उसका मन था लेकिन रॉड देख कर वह ख़ामोश थी। एक भी लग गया सिर पे तो कहानी खत्म। उनमें से एक की आवाज़ पवन की तरह लगी लेकिन उसने सिर्फ़ एक ही बार बोला ही था, ‘‘पर्स छीन उसका।’’ इसके बाद कविता सोचती रह गयी कि वह दुबारा बोले तो वह उसकी आवाज़ पहचान ले लेकिन वह फिर नहीं बोला। कविता का पर्स छीन कर उनमें से एक ने सारी चीज़ें ज़मीन पर गिरा दीं लेकिन पत्थर उसमें था ही नही तो मिलता कैसे।

‘‘बताओ कहां है सोना बनाने वाला पत्थर...?’’ एक ने उसके चेहरे पर एक ज़ोर का तमाचा मारा। कविता को चक्कर आ गया, उसे याद आया आखिरी बार तमाचा उसने स्कूल में तब खाया था जब वह नौवीं कक्षा में थी। इस तमाचे ने उसके भीतर डर नहीं भरा बल्कि गुस्से से उसका शरीर कांप उठा।

‘‘जाहिलों अगर तुम ज़रा भी पढे लिखे होते तो समझ जाते कि ऐसा कोई पत्थर नहीं होता। ये सब कथाओं की बातें हैं।’’ कविता की बात खत्म होने से पहले ही एक ने उसने सिर पर रॉड का प्रहार किया। वह गिर पड़ी। चेतना लुप्त होने से पहले उसने सिर्फ़ कुछ पंक्तियां सुनी।
‘‘चूतिये कहे थे न राड मत चलाना।’’
‘‘साली गरिया रही थी हमारी जर गयी।’’
‘‘चलो अच्छा है न, यहीं पड़ी रहे तब तक इसके घर पर खोज लेते हैं पत्थरवा...।’’
‘‘चल साले चल, देखना आवाज मत होए। चुप्पे से कूद चलेंगे।’’

कविता को होश आया तो उसने देखा कि वह एक टूटे तखत पर लेटी थी और उसके आसपास कुछ बच्चे बैठे हुये एकटक उसे देख रहे थे। उसका हाथ माथे पर गया तो उसे पता चला कि वहां पट्टी बंधी हुई है। उसने उठने की कोशिश की तो निर्मला की मां ने उसे लेटे रहने को कहा।
‘‘आप सुत्तल रहें बहिन जी, कपारे प जोर से लगल हौ आपके, हम साड़ी फार के बांध देले हईं बाकि हरदी चूना गरमावत हई। अब्बे लगा देब त ठीक हो जाई।’’ उसने देखा वह अपनी एक छात्रा निर्मला के घर में थी। घीसू, माधव, सूरदास, सनीचर और कक्षा के अन्य कई बच्चे उसे घेरे बैठे थे। निर्मला की मां ने बताया कि वह नहर के किनारे बेहोश पड़ी थी तो बच्चे उसे रामगोला के ठेले पर लाद के लाये हैं। उसने हल्दी चूना लगवाया, काढ़ा पीया और खाना खाने के इसरार को बहुत मुश्किल से टाल कर अपने डेरे की ओर चली तो निर्मला के बापू और निर्मला उसके साथ उसे छोड़ने आये।
उसके कमरे का ताला टूटा था और सारा सामान अस्त व्यस्त था। उसके कपड़े और किताबें बिखरा दी गयी थीं। वह समझ गयी कि उन तीनों ने कमरे में दाखिल होकर पारस पत्थर ढूंढने की कोशिश की थी और न मिलने पर तोड़फोड़ की थी। कविता की नज़र आलमारी पर गयी, वहां से भगवान की तस्वीरें गिरा दी गयी थीं। इन्हीं तस्वीरों के पीछे ही तो रखा था उसने। वह फुर्ती से आलमारी के पास पहुंची तो जिस चीज़ की तलाश में पूरे कमरे को तहस नहस कर दिया गया था वह उसी तरह शांति से यथास्थान रखा हुआ था। उसे आश्चर्य हुआ। उन्हें यह दिखायी नहीं दिया या फिर उन्होंने इसे पहचाना नहीं ? इतनी बड़ी चीज़ दिखायी न दे, यह तो नामुमकिन है फिर उन्होंने इसे कैसे छोड़ दिया। वह विचारों के भंवर से निकलने की कोशिश करती बिखरी चीज़ों को समेटने लगी।
तंत्र ऐसा था कि जो जैसा चल रहा था वैसा ही चलता था क्योंकि वैसा ही चलता आया था। बरसों से जो चलता आया था वह रिवाज़ बन गया था और अब उसे थोड़ा भी बदलने पर लोग असहज महसूस करते थे। कविता ने देखा कि विद्यालय में इमारतों में प्रयोग होने वाले मटेरियल और ‘मिड डे मील’ की तो खूब जांच होती थी लेकिन बच्चों का विकास कैसा है और वे कुछ सीख भी रहे हैं या नहीं, इसे जांचने का कोई विकसित तंत्र नहीं था। दो-तीन महीने में समन्वयक आकर देख जाता था कि सब कुछ ठीक चल रहा है, बच्चों को मेन्यू के हिसाब से खाना दिया जा रहा है और विद्यालय की इमारत को बनाने का काम मंथर गति से ही सही, चल रहा है। लखनऊ रिपोर्ट भेजना चूंकि उनकी मजबूरी होती थी, वे आ कर कोरम पूरा कर जाते थे। बच्चे कक्षाओं में कितने आ रहे हैं या कक्षाओं में क्या पढ़ाई हो रही है, वे मान कर चलते थे कि उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर की चीज़ है। नियम भी कुछ ऐसे थे कि बच्चों की उपस्थिति ही सबसे बड़ी सफ़लता मानी जाती थी। एक दिन बीडीओ लेवल का खण्ड शिक्षा अधिकारी जांच करने आया। जो भी पैसा निर्माण के नाम पर आता था उसमें बीएसए से लेकर हेडमास्टर और प्रधान तक के खाने के लिये अलिखित नियम बनाये गये थे। पैसे हेडमास्टर और प्रधान के संयुक्त खाते में आते थे इसलिए कई आलसी बीएसए और सुस्त खण्ड शिक्षा अधिकारियों तक इसका त्वरित लाभ नहीं पहुंच पाता था। बीएसएस या उसके नीचे के अधिकारी इसके लिये अपने सामान्य ज्ञान के हिसाब से योजनओं के लिये पैसा आते ही छापे मारने की क्रिया करते रहते थे। इसके लिये कागज़ बाहर बाकायदा सूचना प्रदाता के रूप में एक पद बनाया गया था जो सभी अधिकारियों को ख़बर करता था कि किस खण्ड के किस गांव के किस विद्यालय में कितनी राशि किस मद के लिये आयी है। खण्ड शिक्षा अधिकारी एक बार छापा मार कर सारी बातें तय कर चुके थे लेकिन उनको खबर मिली कि सबको हिस्सा मिल जाने के बावजूद हेडमास्टर साहब पवन नाम के अध्यापक के साथ मिल कर बाकी बचे पैसे में से भी खाने के चक्कर में हैं और कक्षा के लिये बन रहे कमरों के निर्माण में निहायत निम्न कोटि का मटेरियल प्रयोग कर रहे हैं। प्रधान को उन्होंने अपने साथ मिला लिया है और दो से भले तीन हो कर चैन की बीन बजा रहे हैं।

खण्ड शिक्षा अधिकारी श्री रघुराज प्रताप सिंह ज़मींदार के परिवार से थे और चाहते तो ज़मींदारी से भी अपनी ज़िंदगी आराम से चला सकते थे लेकिन उनका कहना था कि वे अपने देश के लिये कुछ करना चाहते थे इसलिये नौकरी में आए। ऐसा माना जाता था कि प्रशासनिक सेवा में न जा पाने पर शिक्षा ही देश के लिये कुछ रचनात्मक किये जाने का माध्यम थी तो उनके जैसे बहुत सारे कर्मठ लोग थे जो उस रास्ते देश की सेवा करने की योग्यता न प्राप्त कर पाने पर इस रास्ते आ गये थे। वे अपने उसूलों के बहुत पक्के माने जाते थे और हर काम के लिये जब एक बार अपना हिस्सा ले लेते थे तो दुबारा उधर आंख उठा कर भी नहीं देखते थे। हर बात के पैमाने बदल गये थे और रिश्वत लेकर एक बार में काम कर देना ईमानदारी कही जाती थी। कई बेइमान थे जो एक ही काम के लिए नाना प्रकार के बहाने बना कर दो-तीन बार पैसे खाना चाहते थे। श्री सिंह इनमें से नहीं थे। वह ठाकुर थे और उनका मानना था कि राजपूत को ज़बान का पक्का होना चाहिये। दो कमरों के निर्माण के लिये आये दो लाख दो हज़ार के चेक को भुना कर आधे से अधिक हिस्सा बांटने में खर्च किया जा चुका था और निर्माण के लिये चार एक के तय मसाले (चार बोरी बालू में एक बोरी सीमेंट) की जगह छह एक का मसाला प्रयोग किया जाना था। जब श्री सिंह वहां औचक पहुंचे तो उनकी पैनी नज़र सबसे पहले मसाले के अनुपात पर ही गयी। छह एक की जगह आठ एक का मसाला लगाया जा रहा था और नींव लगभग पूरी हो चुकी थी। नींव के बाद अब दीवार जोड़ने का काम शुरू हो रहा था। वह तमतमाये हुए हेडमास्टर मनोहर के कमरे में घुस गये।
कविता को जब पता चला कि कोई अधिकारी जांच पर आये हैं तो उसे लगा कि बच्चों की पढ़ाई की भी जांच की जायेगी। जो भी अधिकारी आता था सारी चीज़ों की जांच करके चला जाता था और कविता चाहती थी कि बच्चों की पढ़ाई की भी जांच हो ताकि वह अधिकारी से कह सके कि बाकी कक्षाओं में अध्यापकों को पढ़ाने के लिये कुछ मानक बनाये जायें और उन्हें बच्चों के अध्ययन संबंधी कुछ मासिक या त्रैमासिक लक्ष्य दिये जायें। 

श्री सिंह जब हेडमास्टर के केबिन से निकले तो उनका गुस्सा काफी हद तक शांत हो चुका था और वे खासे आध्यात्मिक नज़र आ रहे थे। कविता ने उनका अभिवादन किया तो उन्होंने उसे पहचान लिया।
‘‘आप कविता हैं न ?’’
‘‘जी सर।’’
‘‘सुना है आपके पास कोई जादुई चीज़ है। कोई पत्थर वत्थर जिससे आप लोहे को सोना बना सकती हैं।’’ ऐसा कह कर वह हंसने लगे। ‘‘फुलिश....ऐसी भी कोई चीज़ होती है क्या ? ये मनोहर भी न...।’’ कविता ने उनकी बातों पर ध्यान दिये बिना उनसे धीरे से कहा कि वह उनसे किसी ज़रूरी मामले में बात करना चाहती है तो वह तुरंत तैयार हो गये। कविता उन्हें ले कर स्टाफ रूम की तरफ बढ़ गयी जहां कक्षाएं चलने के कारण फिलहाल सन्नाटा था।
‘‘सर, यहां बहुत गड़बड़ चल रही है। हालांकि यहां क्या प्रदेश के ज़्यादातर विद्यालयों में यही हाल है लेकिन यहां की तो बात ही निराली है। यहां कोई नियम नहीं है सर, अराजकता चल रही है....।’’ कविता ने अपने दिल की भड़ास निकाली।

‘‘अच्छा तो आपको भी पता है...मैंने देखा सब गड़बड़ है यहां।’’ श्री सिंह ने चिंता व्यक्त की। कविता उत्साहित हो गयी। ‘‘देखा न सर आपने ? बताइए हम अगर नींव ही खराब डालेंगे तो उस पर कभी कोई मज़बूत इमारत खड़ी हो सकती है ?’’ कविता ने चिंतित स्वर में कहा। उसे लगने लगा कि श्री सिंह नज़र के बड़े तेज़ आदमी हैं तभी तो कक्षाओं में एक बार भी गये बिना बच्चों की पढ़ाई के लिए उपलब्ध निराशाजनक माहौल से परिचित हैं।

‘‘कतई नहीं.....नींव तो मज़बूत होनी ही चाहिए। ऊपर कोई कमीबेसी हुयी तो चल सकता है लेकिन नींव में की गयी बेईमानी पूरी इमारत को बेकार कर देती है।’’ कविता को उत्साह मिला। ‘‘सर कुछ कीजिए, आप चाहेंगे तो माहौल सुधर सकता है।’’ श्री सिंह दबाव में आ गये। उन्हें लगा कविता कमरों के लिये आयी राशि में उनके हिस्से के बारे में जानती है। उन्हें मनोहर और प्रधान पर बहुत गुस्सा आया और वह हड़बड़ाने लगे। ‘‘हां-हां कविता मैं करता हूं कुछ। नींव से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जायेगी।’’

कविता उस दिन जब वहां से निकली तो स्कूल की इमारत के बुर्ज पर एक बड़ा सा गिद्ध बैठा दिखायी दिया। उसने गिद्ध की ओर देखा, गिद्ध उसकी ओर आंखों में आंखे डाल कर देख रहा था। उसने एक बार गिद्ध को भगाने के लिये हाथ हिलाया। गिद्ध थोड़ा डरा और उड़ने के लिये पंख फड़फड़ाये लेकिन उड़ा नहीं। कविता को भी थोड़ा डर लगा। उसने फिर दूर से हुश्श्श किया, गिद्ध ने इस बार हल्के से अपने पर फड़फड़ाये लेकिन उड़ने का कोई उपक्रम नहीं किया। कविता घबरा उठी। एक अनजाना भय फिर से उसके भीतर उतरा और वह तेज़ कदमों से अपने डेरे की ओर जाने लगी।

नींव वाली बातपहले हेडमास्टर मनोहर तक पहुंची, फिर प्रधान के पास और जल्दी ही कई ऐसी जगहों पर पहुंच गयी जहां उसे नहीं पहुंचना चाहिए था। अगर ये स्टेट हाइवे का मामला होता तो इस जानकारी भर से कविता की जान को खतरा हो सकता था और अगर नेशनल हाइवे होता तो बहुत संभव था अब तक कविता की किसी सड़क दुर्घटना में मौत हो चुकी होती लेकिन यह एक विद्यालय में कमरे बनाये जाने का मामला था और जिस अधिकारी ने सुना उसने थोड़ी देर बड़बड़ाने के बाद इसे अपनी वरीयता सूची से बाहर निकाल दिया। खाने के बड़े मौके उपलब्ध थे और विद्यालय वगैरह के फण्ड अधिकारियों की संख्या के अनुपात में बहुत छोटी रकम थे। बड़े अधिकारी उस पर उतना ध्यान उसी तरह नहीं देते थे जिस तरह सरकार विद्यालयों पर नहीं देती थी।


प्रधान जी का नाम मंटू सिंह था और नाम से उनकी जो छवि बनती थी वे उससे बिल्कुल अलग थे। वे वैसे तो कागज़ों पर गांव की प्रधान मनकिया के पति थे लेकिन औरत के प्रधान बनने का मतलब उसके पति की ही लॉटरी निकलना होता था। मंटू जी ने इस अगंभीर नाम को बदलने की कालांतर में कोशिश की थी और पता नहीं किसकी बदमाशी से उनका नाम मंटू सिंह से मोंटेक सिंह रख दिया गया था। नाम रखे जाने के शुरू में वह ज़रूर इस नाम से पुकारे जाने पर बुरा मानते होंगे लेकिन अब वह पूरे दिल से इस नाम को अपना चुके थे और मोंटेक जी पुकारे जाने पर तुरंत पलट कर जवाब देते थे। मोंटेक जी का कहना था कि कविता को कुछ पैसे दे दिये जायें ताकि वह अपना मुंह बंद रखे। यह कहने के बाद वह साथ में ये भी जोड़ते थे कि जाने दो साली नहीं ही रखेगी मुंह बंद तो क्या उखाड़ लेगी। यह कहने के बाद वह बहुत ज़ोर से हंसते थे और सामने वाले व्यक्ति के सामने हथेली फैला देते थे जिस पर अपनी हथेली पटक कर उन्हें ताली देता था। माना जाता था कि उन्हें ताली देने वाला व्यक्ति उनके करीब है और कोई फ़र्ज़ी बीपीएल कार्ड और निवास प्रमाण पत्र वगैरह बनवाने के लिये उसी ताली देने वाले व्यक्ति से संपर्क किया जाता था। इस तरह की ताली क्षेत्र के विधायक लालजी शुक्ला, जिन्हें उनके क्षेत्र के लोग प्रेम से लालची शुक्ला कहते थे, भी लेना पसंद करते थे और कुछ लोगों का कहना था कि सांसद राममूरत भी ऐसा तालियां लिया करते हैं। तालियां देना एक उद्योग के तौर पर विकसित हो रहा था और इसके लिये चुस्त और फुर्तीले नौजवानों की ज़रूरत हुआ करती थी। शिक्षा की हालत बुरी होने से इस उद्योग को और फायदा मिला था और ताली देने के लिये नौजवान आपस में लड़ते मरते रहते थे। यह एक तकनीकी क्रिया थी और इसके लिये सूक्ष्म नज़र के साथ अच्छी टाइमिंग की ज़रूरत पड़ती थी। यह ज़रूरी होता था कि ताली देते वक्त हथेली सामने वाली की हथेली के बराबर पड़े और एक ज़ोर की आवाज़ हो। आवाज़ के साथ यह भी ध्यान रखना होता था कि ज़ोर की आवाज़ के चक्कर में सामने वाले की हथेली पर चोट न लगे नही तो वह किसी दूसरे ताली देने वाले को आज़माया जा सकता था। कई ताली देने वाले नौजवानों ने, जिन्होंने तालियां देते-देते अपने लिये मोबाइल, गाड़ी और प्रेमिका का जुगाड़ कर लिया था, चाहते थे कि भविष्य में उनकी औलादें डॉक्टर इंजीनियर न बन कर ताली देने वाली बनें। वह मन ही मन इसके लिये किसी प्रशिक्षण संस्थान की ज़रूरत भी महसूस करते थे। ताली देना धीरे-धीरे पूरे ज़िले से पूरे राज्य से होते हुए पूरे देश में एक सम्मानजनक रोज़गार के रूप में मान्यता पा रहा था और पहले जो माता-पिता इस क्षेत्र में जाने वाले अपने बच्चों को डांटते रहते थे, अब इस रास्ते पर अपने लख्त-ए-जिगर को बढ़ते देख चैन की सांस लेते। इसके लिये कई चरणों की प्रतियोगिता होती थी जिसमें सबसे पहले कनिष्ठ ताली प्रदाता के बाद वरिष्ठ ताली प्रदाता से होते हुये मुख्य व्यक्ति तक पहुंचा जाता था। ताली देने वाले अक्सर कम पढ़े-लिखे होते थे और कविता ने यह निष्कर्ष निकाला कि खराब शिक्षा ही इस उद्योग के पनपने का कारण है। उसे लगता था कि अधिकांशतः ताली देने वाले उस फेरी वाले या फिर उसके चाचा वाली मानसिकता जैसे हो जाते हैं। वह न तो कोई महान विचारक थी और न ही बचपन से उसके भीतर देशभक्ति का जज़्बा फूटता रहता था। वह एक साधारण शिक्षिका थी जिसकी आंखों ने देख लिया था प्राइमरी अध्यापक का यह बेचारा बन चुका पद बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी वाला है। उसके हाथों से देश का वह भविष्य होकर गुज़र रहा है जिसे अभी जिस दिशा में चाहे मोड़ा जा सकता है।
कविता का पढ़ाना देख कर सुमन मैडम के भीतर भी परिवर्तन हो रहे थे। कविता के रूप में उन्हें अपनी युवावस्था के वे दिन याद आ रहे थे जब वे देश के लिये कुछ करना चाहती थीं। वह चाहती थीं कि कुछ ऐसा काम करें जिससे उन्हें याद रखा जाये। कविता की बढ़ती लोकप्रियता देख कर उन्हें लगने लगा था कि अगर वह चाहें तो थोड़ा ही सही, छोटे सर्किल में ही सही, नाम कमा सकती हैं। कविता की अख़बार में छपी फोटो ने उन्हें विचलित कर दिया था। फिर एक दिन कविता ने उन्हें इशारों-इशारों में यह एहसास दिलाया कि यदि वह अपने ज़िले के किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही होतीं तो मात्र पांच हज़ार रुपयों के लिये उन्हें दिन भर कड़ी मेहनत करनी पड़ती। उस समय तो उन्हें बुरा लगा था लेकिन बाद में उन्हें कविता की बात में कड़वी सच्चाई का स्वाद आया था। उन्होंने कविता के पढ़ाने वाले तरीकों को कॉपी कर थोड़ा बदल कर अपनाना शुरू कर दिया था। कविता ने ऊपर से तो कुछ नहीं कहा लेकिन भीतर ही भीतर अपनी इस सफलता से बहुत खुश हुई।

इसी बीच बगल के किसी गांव में किसी भवन का उद्घाटन करने के लिये मुख्यमंत्री के आगमन की घोषणा हुई। भवन राज्य सरकार की किसी योजना द्वारा बनाया जा रहा था और मुख्यमंत्री को श्रेय लेने की इतनी जल्दी थी कि वह बिना निर्माण कार्य पूरा हुए ही भवन का उद्घाटन करने आ रही थीं। यह महिला मुख्यमंत्री अपने कैरियर की शुरूआत में एक अध्यापिका रह चुकी थीं इसलिए इस बात की पूरी संभावना थी कि वह गांवों के प्राथमिक विद्यालयों में औचक निरीक्षण करें और बच्चों से कुछ सवाल करें। अधिकारियों को यह नहीं पता था कि मुख्यमंत्री क्या-क्या सवाल पूछ सकती हैं इसलिये ज़िले के सबसे खुर्राट आइएएस अफ़सरों को उन सवालों का अंदाज़ा लगाने की ज़िम्मेदारी दी गयी जो बहुत अच्छा अंदाज़ा लगाते थे और आइएएस की परीक्षा पास करने में उनके अंदाज़ा लगाने की योग्यता का बहुत बड़ा हाथ था। इन प्रतिभाशाली अफ़सरान ने अपनी पूरी प्रतिभा का उपयोग किया और एक प्रश्नावली तैयार की गयी। जहां एक ओर पूरा तंत्र मुख्यमंत्री के दौरे के लिये प्रशासनिक तैयारियों में जुटा था वहीं एक त्रिसदस्यीय टीम गांवों के विद्यालयों में जा कर उस प्रश्नावली को रटवा रही थी। लेकिन उन बच्चों को आनन फानन में यह सब रटाना मुश्किल था जिन पर यह कह कर न पढ़ाये जाने का रिवाज़ था कि साले पढ़ना ही नहीं चाहते।

‘‘भारत के प्रधानमंत्री कौन हैं ?’’ काफी रटाये जाने के बाद यह प्रश्न किया जाता।
‘‘साहरूखान।’’
‘‘क्रिकेट टीम का कप्तान कौन है ?’’
‘‘सोनिया गांधी।’’
‘‘रामचरितमानस किसने लिखा था?’’
‘‘बहन मायावती।’’
‘‘ताजमहल किसने बनवाया था?’’
‘‘महेंदर धोनी।’’
‘‘भारत की राजधानी क्या है?’’
‘‘बनारस।’’
‘‘विश्वनाथ मंदिर कहां स्थित है?’’
‘‘नई दिल्ली।’’
‘‘संसार की रचना किसने की?’’
‘‘शाहजहां।’’
‘‘महाभारत किसने लिखा?’’
‘‘ब्रह्मा जी।’’
‘‘कै नवां छत्तीस?’’
‘‘नौ त्रिक्के’’

सभी अधिकारियों के हाथ पांव फूल गये। उन्होंने ईश्वर का स्मरण करके यह प्रश्नावली तैयार की थी और ईश्वर को रिश्वतस्वरूप यह उत्तर भी शामिल किया था कि संसार की रचना ब्रह्मा जी ने की थी। लेकिन बच्चों से मिली प्रतिक्रियाओं से उनके तोते न जाने उड़ कर कहां चले गये थे। यह प्रश्नावली आसपास के सभी विद्यालयों में भेज दी गयी थी और तीन से चार दिनों में सभी अध्यापकों को इसे बच्चों को याद कराने के निर्देश दिये गये थे। पहली बार कविता ने पवन को भी बच्चों को ज़ोर दे कर पढ़ाते हुए देखा। उसे न जाने क्यों हंसी आयी। कविता की कक्षा के बच्चे अब कुछ समय पहले वाले चुपघुन्ने नहीं रह गये थे। उनकी जिज्ञासाओं के द्वार कविता ने खोल दिये थे और वह लड़के लड़कियों के उन सवालों का भी खूब जवाब दिया करती थी जो पाठ्यक्रम से बाहर के थे। कई लड़कियों ने मासिक धर्म संबंधी तो कई लड़कों ने ईश्वर संबंधी जिज्ञासाएं भी अपनी मैडम जी के ज़रिये खूब शांत की थीं। कुल मिला कर उसकी कक्षा एक स्मार्ट कक्षा बन चुकी थी और वह जिस भी कक्षा में जाती थी उन सारी कक्षाओं के बच्चे पहले से अधिक आत्मविश्वास से भरे होते। कविता बहुत बेसब्री से उस दिन का इंतज़ार कर रही थी जब उसके विद्यालय में चेकिंग करने कोई आये। उसने माधव को एक लोहे की कलम को सोने का बना कर दिया था जिससे माधव उन दिनों इतिहास का गृहकार्य लिख रहा था। 

ऐसे में माननीया मुख्यमंत्री के दौरे के ठीक सात दिन पहले एक दिन उसके विद्यालय का भी नंबर आ गया। कविता और सभी अध्यापक सुबह अपनी कक्षाओं से आधा घंटा पहले ही बुलाये गये थे। कविता जब पहुंची तो वहां अभी कोई नहीं आया था और इमारत की मुंडेर पर एक बड़ा गिद्ध पूरे इत्मीनान से बैठा था। कविता इस बार डरी नहीं बल्कि मुंडेर की ओर बढ़ी। धीरे-धीरे दोनों के बीच की दूरी कम होती गयी और जब कविता मुंडेर के काफी पास पहुंच गयी तो गिद्ध थोड़ा घबरा कर अपने पंख हिलाने डुलाने लगा। कविता ने उसकी आंखों में आंखें निर्भीक होकर डाल दीं और खड़ी हो गयी। गिद्ध थोड़ी देर तक हिलता डुलता रहा फिर अचानक पंख फड़फड़ाता हुआ उड़ गया। कविता इत्मीनान से भीतर सजावट का जायजा लेने चली गयी।

पूरे विद्यालय को साफ सफाई करा कर झंडियों से सजा दिया गया था। जिलाधिकारी साहब की उत्तर प्रदेश सरकार  लिखी सफेद अंबेसडर आ कर रुकी और वह मंडलायुक्त के साथ सीधे कक्षाओं में घुस गये। पीछे से गांव के प्रधान मोंटेक जी और हेडमास्टर मनोहरलाल हाथ जोड़े उनके पीछे-पीछे भाग रहे थे। मंडलायुक्त वरिष्ठ थे और उन्होंने नये जिलाधिकारी महोदय को सतर्क प्रशासन के कुछ मूलभूत सिद्धांत बताये थे जैसे दौरे पर चलते हुए जब कोई कुछ कहे तो उसकी बात आधी अधूरी सुनी जाये और उसके चेहरे की ओर भूल से भी न देखा जाय। दौरा करते हुए गाड़ी से उतरते ही मूड चाहे जितना अच्छा हो, भंगिमा ऐसी होनी चाहिये जैसे बहुत क्रोध में हैं। किसी भी चीज़ पर, चाहे वह जितनी भी अच्छी हो, संतुष्टि ज़ाहिर नहीं करनी है। बुरी चीज़ों पर अंग्रेज़ी में चीखते हुये मौके पर एकाध लोगों को सस्पेंड कर देना है इत्यादि इत्यादि।

जब दोनों अधिकारी कविता की कक्षा में पहुंचे तो कविता ने उनका अभिवादन किया और एक ओर खड़ी हो गयी। जो अध्याय उसे लिखना था वह लिख चुकी थी और अब उसका पाठ होना शेष था। उसकी भूमिका खत्म हो गयी थी और अब विद्यार्थियों को अपनी भूमिका अदा करनी थी। जिलाधिकारी महोदय ने सगर्व घोषणा की कि जो बच्चे उनके पूछे गये सवालों का सही जवाब देंगे उन्हें साथ आये चाचा जी यानि मंडलायुक्त टॉफियां देंगे। दूसरे अध्यापक भी आ कर दरवाजे़ के पास खड़े हो गये थे और मनोहर पवन के साथ कमरे के एक कोने में खड़ा मन ही मन ईश्वर को याद कर रहा था। वीरेंद्र भी अनमने मन से एक ओर खड़ा था। जिलाधिकारी ने कुछ देर बच्चों से इधर उधर की बातें कीं जैसे किसके-किसके घर में गाय हैं, हल हैं और ट्रैक्टर वगैरह हैं। उन्होंने पूरी पढ़ाई कान्वेंट से की थी और गांव को वह हल, बैल और ट्रैक्टर जैसी चीज़ों से ही पहचानते थे। जब सभी बच्चों ने नकारात्मक उत्तर दिये तो वह थोड़े उदास हुए, फिर उन्होंने अपना पहला सवाल पूछा।

‘‘बिटिया तुम बताओ भारत के प्रधानमंत्री कौन हैं?’’ उन्होंने एक लड़की को खड़ा किया।
‘‘डाक्टर मनमोहन सिंघ।’’ लड़की ने आत्मविश्वास से उत्तर दिया। जिलाधिकारी महोदय को भरी गरमी में जैसे ठंडा पानी मिल गया। ‘‘वेरी गुड बेटी, बैठ जाओ।’’ वह दूसरे बच्चे से मुखातिब हुए।
‘‘भारत की राजधानी कहां है?’’
‘‘नई दिल्ली।’’ लड़के ने कहा और जिलाधिकारी महोदय के कहने से पहले ही आराम से बैठ गया जिसे उन्होंने नज़रअंदाज़ कर दिया।
‘‘उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री कौन है बेटा?’’ वह सारे सही उत्तर पा कर प्रसन्न थे और मंडलायुक्त महोदय के साथ आया अर्दली सभी बच्चों के पास जाकर टॉफियां बांट रहा था।
‘‘सुश्री मायावती।’’
‘‘वाह, शाब्बास बेटा।’’ जिलाधिकारी महोदय किलकारी मार उठे। मनोहर और पवन पहली बार कविता के लिये अपने मन में आदर महसूस कर रहे थे और उनके माथे की चिंता की लकीरें काफी हद तक मिट चुकी थीं। उन्हें पता था कि एक बार में अधिकारी लोग एक ही कक्षा चेक करते हैं।
जिलाधिकारी महोदय ने इस बार माधव को खड़ा किया।
‘‘बेटा, भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान कौन है ?’’ वह मुस्करा रहे थे। माधव ने एक पल को सोचा फिर उनकी आंखों में देखता हुआ बोला।
‘‘पता नहीं सर कोई होगा, इसका हमारे पाठ्यक्रम से क्या मतलब है?’’ 

सबके मुस्कराते चेहरे एक पल में भक्क हो गये। मनोहर के चेहरे का रंग उतर गया। कविता चुपचाप एक ओर खड़ी थी शांत, बिल्कुल शांत। आज उसे कोई चिंता नहीं थी। उसने सब कुछ सिखाने के साथ बच्चों को एक और चीज़ सिखाने की कोशिश की थी, सवाल उठाना। वह आज अपनी शिक्षा को सफ़ल होता देख रही थी और बहुत संतुष्ट थी। जिलाधिकारी महोदय को अपने मातहत अधिकारियों तक से प्रश्न सुनने की आदत नहीं थी और एक पांचवी कक्षा के बच्चे ने उनसे ऐसा सवाल पूछा था जिसका जवाब उनके पास नहीं था। वह हंसने लगे, निहायत अश्लील हंसी और हंसते हुए वे मंडलायुक्त महोदय की ओर पलटे ताकि उनकी हंसी को वह अपनी हंसी से सहारा दे दें। उन्होंने मंडलायुक्त की कई नाजु़क मौकों पर मदद की थी और मंडलायुक्त महोदय उन्हें धोखा नहीं दे सकते थे। वे भी हंसे। उनके हंसने से जिलाधिकारी महोदय का हंसना बढ़ गया। मंडलायुक्त और ज़ोर से हंसे। जिलाधिकारी भी और ज़ोर से हंसे और बहुत मज़ाकिया बात की तरह उन्होंने माधव के गाल पर हाथ फेरते हुये प्यार से कहा, ‘‘अरे बेटा ये सामान्य ज्ञान है, सबको जानना चाहिए।’’ माधव वैसे ही खड़ा रहा और बोला, ‘‘सर आप पहले तो नहीं आये जानने कि हमारा सामान्य ज्ञान कैसा है। हमारे पाठ्यक्रम में जो है वह हमें पूरा पढ़ाया ही नहीं जाता तो इस सामान्य ज्ञान से क्या होगा?’ जिलाधिकारी महोदय और ज़ोर से हंसने लगे और उन्होंने फिर से मंडलायुक्त की ओर देखा। मंडलायुक्त महोदय का चेहरा इस बार पत्थर की तरह सख्त था। जिलाधिकारी महोदय सकपका गये और उन्होंने ज़बरदस्ती हंसते हुए अर्दली से माधव को टॉफियां देने का इशारा किया। इसके बाद वह ऐसे आराम से निकले जैसे कुछ हुआ ही न हो।

आप जानना चाहते होंगे कि इसके बाद क्या हुआ। क्या कविता के शिष्यों ने मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान उनसे भी कुछ सवाल उठाये? क्या कविता का पारस पत्थर छीनने के लिये उस पर दुबारा हमला हुआ ? क्या सुमन जी भी हमेशा उसी भाव से बच्चों को पढ़ाती रहेंगी जिस भाव से उन्होंने आजकल पढ़ाना शुरू कर दिया है ? मैं क्षमा चाहता हूं कि इनमें से किसी भी सवाल का जवाब नहीं दे सकता। आपने ज़रूर इस कहानी का कोई रोमांचक और दिलदहलाऊ अंत सोच रखा होगा जिसमें कोई बच्चा खड़ा होकर सीधे मुख्यमंत्री से सवाल कर दे कि रक्षा में 18 प्रतिशन और शिक्षा में मात्र 4 प्रतिशत खर्च करने वाले इस देश में उनका क्या भविष्य है ? आठवीं तक की शिक्षा मुफ्त में प्राप्त कर लेने के बाद वह कौन सी तोप चलाने में सक्षम हो जायेंगे जो उन्हें स्कूलों तक लाने में इतनी मेहनत की जा रही है। इतने समय तक वह कहीं जाकर मजदूरी करें तो भी उस उम्र तक एक रिक्शा खरीदने के काबिल हो जाएंगे लेकिन इस शिक्षा का वह क्या करें जो उन्हें न तो साक्षर रहने देती है न निरक्षर? मैं जानता हूं आप कोई ऐसा अंत चाहते थे जिसमें कविता के ऊपर फिर से हमला होता या फिर उसकी हत्या कर दी जाती। कोई सनसनीखेज और रोमांचक अंत....जैसा आजकल की कहानियों में होता रहता है।

देखिये, यह मात्र एक विद्यालय में ईमानदारी से पढ़ाने का मामला है और ये घटना इतनी मामूली है कि इससे कुछ लोगों को खतरा तो महसूस हो तो रहा है मगर इतना नहीं कि वे कोई बड़ा कदम उठायें। मैंने पहले भी आपसे बताया था कि अगर यह स्टेट हाइवे या आयकर विभाग में ईमानदारी करने का मामला होता तो कविता को अब तक इतनी धमकियां मिली होतीं कि कहानी ज़रूर किसी रोमांचक मोड़ तक पहुंच जाती। अगर यह नेशनल हाइवे या लोक निर्माण विभाग का मामला होता तो कविता की अब तक किसी अज्ञात दुर्घटना में मौत हो चुकी होती और पुलिस इसे छानबीन करने के बाद असावधानी से गाड़ी चलाने का मामला बता एकाध लोगों को गिरफ्तार कर केस बंद कर चुकी होती। प्राइमरी अध्यापक संघ के कुछ अध्यापकों ने जस्टिस फॉर कवितानाम से एक संस्था बनायी होती और काम ज़्यादा हो जाने पर वे किसी दिन मन बहलाव के लिये हाथों में मोमबत्तियां ले कर किसी चौक चौराहे पर प्रशासन होश में आओया कविता कौशिक के हत्यारों को गिरफ्तार करोजैसे नारे लगाती हुयी. थोड़ी देर तक सड़क जाम करती फिर घर आकर आराम से आईपीएल के मैच देखती। मगर मैं फिर से आपने क्षमाप्रार्थी हूं कि मैं इस अतिसाधारण पात्रों वाली अतिसाधारण कहानी को ऐसा कोई रोमांचक मोड़ दे सकने में असमर्थ हूं। बस इतना ही कह सकता हूं कि कविता अब भी अपने तरीकों पर डटी हुई है। आप कभी हरियालीगंज जायें तो आप देखेंगे कि इधर गांव में हरियाली भी दिखने लगी है और मनोहर अब काफी मनोहर लगने लगा है। पवन भी आजकल काफी कक्षाएं लेने लगा है और बच्चों के सवालों के जवाब भी देता है, हां अभी जवाब देने में वह जातियों के हिसाब से वरीयता ज़रूर तय किया करता है। कविता अगर मिले तो आप उससे कहिएगा कि उसका यह प्रयास टिटहरी की तरह बालू लाकर समंदर को भरने जैसा है। मैं शर्त लगाकर कह सकता हूं वह ऐसा जवाब देगी कि आप लाजवाब होकर मुस्कराते हुए लौटेंगे।

(कहानी में प्रयुक्त समस्त पेंटिंग्स गूगल से साभार ली गयी हैं।) 
 
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