विजेन्द्र





प्रख्यात आलोचक शिवकुमार मिश्र जी का २०-२१ जून २०१३ की आधी रात को निधन हो गया। 'स्मृति शेष' के अंतर्गत शिवकुमार जी पर वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी का संस्मरण हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।       
 

स्मृति शेष: डा0 शिवकुमार मिश्र


    प्रख्यात लोकधर्मी तथा मार्क्सवादी समीक्षक डा0 शिवकुमार मिश्र अब हमारे बीच सदेह नहीं हैं । पर उनका सृजन हमारे बीच उन्हें कभी विस्मृत न होने देगा। आज के अधिसंख्य पेशेवर आलोचकों के बीच वह एक साधक तथा तपस्वी आलोचक थे। मैंने उन्हें कईबार बहुत करीब से देखा था। उनसे संवाद भी हुआ था। पत्राचार से। फोन से भी। मुझे कभी यह अनुभव नहीं हुआ कि मैं एक बहुत बड़े आलोचक से संवाद कर रहा हूँ। वह स्वभाव से बहुत सरल, सहज तथा आत्मीय भी थे। कुछ लोगों से बात करने में एक दूरी बनी रहती है, पर डा0 मिश्र से जाहे जो संवाद करे उसे लगेगा कि वह अपने ही किसी आत्मीय से बात कर रहा है। न तो उन्हें अपने बड़प्पन का गुमान था। न विद्वान होने का वर्ग दंभ। न तुच्छ साहित्यिक राजनीति में लिप्त होने का काँइयाँपन। उनकी प्राथमिकतायें सुनिश्चित थी। सर्वप्रथम एक बेहतर इन्सान होना। बाद में ईमानदारी से सृजन कर्म में एक साधक की तरह जुटना। वह विचारधारा की दृष्टि से प्रतिबद्ध मार्क्सवादी थे। सोवियत संघ के पतन के बाद अनेक हिंदी के मार्क्सवादी लेखक अपना चेहरा या तो छिपाते से लगे। या उसे बदल दिया। पर डा0 मिश्र अंत तक ठेठ मार्क्सवादी ही रहे। उन्होंने विचारधारा को न तो कभी भुनाया। न उसकी गरिमा को गिरने दिया। मार्क्सवादी सिद्धांत से ही उन्होंने सीखा था कि हम अपनी परंपरा को गहराई से समझें। लोक से जुड़ें। अपनी जातीय जड़ों को पहचानें। उनके मार्क्सवादी चिंतन में लोक प्रमुख है। उन्होंने अपने महान संत कवियों को लोकदृष्टि से ही समझ-परख कर उनका सम्यक् मूल्यांकन किया है। उनके सृजन में भारतीय संदर्भ कभी ओझल नहीं होता। हमें मार्क्स को समझने के लिये अपनी साहित्यिक परम्परा समझना बहुत जरूरी है। वह मार्क्स के उस सिद्धांत के पक्षधर थे कि हमारे साहित्य में पतनशील प्रवृत्तियों की निर्मम आलोचना करना बहुत जरूरी है। यहाँ मुझे एक संस्मरण याद आता है। डा0 मिश्र ‘जलेस’ के कार्यक्रम में जयपुर आये हुये थे। कार्यक्रम की समाप्ति पर हम लोग काफी हाउस में बैठे थे। प्रसंग ‘कृतिओर’ का आ गया। हमने हिंदी के औपनिवेशिक आधुनिकतावादी कुछ कवियों यथा -विजयदेवनारायण साही, श्रीकांत वर्मा, रघुवीर सहाय, केदारनाथसिंह तथा कुँवरनारायण की कविता का पुनर्मूल्यांकन श्रृंखलाबद्ध कराया था। दिल्ली, पटना, मुम्बई, बनारस, इलाहाबाद तथा कोलकाता आदि महानगरों में इस पुनर्मूल्यांकन की तीखी प्रतिक्रिया तथा मौखिक धमकियाँ हम झेल ही रहे थे! हमें एक क्षण को लगा जैसे हमने कोई अपराध किया है। विरोध का केंद्रीय बिंदु था कि ‘कविता के नये प्रतिमान’ यहाँ खारिज किये गये हैं। दूसरे, जिन कवियों को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया गया था उनका औसतपन सामने आ रहा था। प्रसंगवश डा0 मिश्र ने ‘कृतिओर’ द्वारा सम्पन्न किये गये इस कार्य के लिये महत्वपूर्ण बताते हुये हमें बधाई दी। यह भी कहा कि मौखिक रूप से तो हम सभी इन बातों को आपसी बातचीत में कहते रहते हैं। पर लिखित में आप लोगों ने कर दिखाया इसके लिये पुनः बधाई। डा0 मिश्र ने यह भी कहा कि वैसे यह काम जनवादी समीक्षा को बहुत पहले करना चाहिये था। थोड़ा प्रसंगेतर होकर मैं यह भी बता दूँ कि दूसरे बड़े मार्क्सवादी आलोचक प्रो0 चंद्रबली सिंह ने भी हमारे इस प्रयत्न के लिये बनारस से बधाई संदेश प्रेषित किया था।

बातचीत में मुझे लगा कि डा0 मिश्र समकालीन आलाचेना की स्थिति से बहुत क्षुब्ध हैं। उनकी बातों की ध्वनि थी कि तथा कथित बड़े कहे जाने वाले मार्क्सवादी समीक्षकों का चारित्रिक पतन हुआ है। आलोचना उनके लिये सृजन साधना न होकर अपने हित साधने का एक पेशा बन चुका है। श्रेष्ठ सृजन जीवन में बड़े त्याग और संयम की माँग करता है। ये दोनों बातें आज के प्रमुख कहे जाने वाले समीक्षकों में गायब हैं। आलोचक अपने कैरियर के लिये सुअवसरों की तलाश में भटकते दिखते हैं। जिन बातों से उन्हें दरवार से लाभ मिलने की संभावना लगती है तदनुसार वे अपना रूप धर लेते हैं। यानि हिंदी आलोचना में ‘अवसरवाद का घुन’ उसकी जड़ों को खोखला कर चुका है। क्या यही वजह नहीं कि हम दिल्ली में रह कर दिन में तीन बार अपने विचारों को बदलते रहते हैं। जैसा अवसर वैसी आलोचना! दूरदर्शन हो या लोकार्पण समारोह या किसी बड़े प्रकाशक की पुस्तकें बिकवाने का विज्ञापन। शिखर आलोचक कहे जाने वाले सुजन अपने सृजन को कोई चीज़ त्याग नहीं सके! उन्हें जीवन में सुख विलास चाहिये? ये उपलब्ध कराने पर उनसे जो चाहे जब चाहे कहलवा सकते हैं। पेशेवर लेखक यही करके अपना गुजारा करते हैं। डा0 मिश्र इस भोग-विलासी परम्परा के आलोचक नहीं थे। वह आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डा0 रामविलास शर्मा तथा प्रो0 चंद्रबली सिंह की विरल साधक परम्परा के बड़े तथा साधक आलोचक थे।

डा0 मिश्र को हिंदी की समाकालीन आलोचना अपने समय की ‘सर्जना से सही मायनों और सही आधारों पर मुखातिब’ न हो पाने के कारण उसके साथ, ‘न्याय नहीं कर सकी।’  वह किसी समय की आलोचना को अपने समय के सृजन से संवाद बहुत जरूरी मानते हैं। उन्होंने बड़ी दृढ़ता से कहा है कि, ‘मेरे विचार से समकालीन तमाम पेशेवर आलोचना की सबसे बड़ी कमज़ोरी समकालीन सर्जना के साथ उसका जरूरी और सार्थक संवाद न कर पाना’ ही है। उसमें किसी प्रकार के, ‘रचनात्मक हस्तक्षेप या सिद्धान्तनिष्ठ मुठभेड़ का अभाव है’। किसी भी आलोचना का वैचारिक और सैद्धान्तिक आधार कितना ही तर्कपुष्ट कयों न हो- उसमें ऊर्जा, सप्राणता तथा नवोन्मेष अपने समय के सृजन से संवाद तथा उससे मुठभेड़ से ही पैदा होते है। वह इस क्रम में आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा नंददुलारे बाजपेयी की उपस्थिति को सार्थक मानते हैं। डा0 मिश्र व्यावहारिक आलोचना पर अधिक बल देते हैं। उनके अनुसार, ‘सिद्धान्त कथन करना,  सैद्धान्तिक आालोचना लिखना आसान होता है। उसे किताबे पढ़ कर भी लिखा जा सकता हे। किन्तु उन सिद्धान्तों को अपने समय की सर्जना के बरक्स खरा साबित कर पाना ....दुष्कर कार्य है। उन्होंने इसे बहुत भारी विडम्बना कहा है कि,  हिंदी आलोचना का कोई अपना निजी वजूद या अस्मिता कभी उभर ही नहीं सकी। वह या तो संस्कृत काव्यशास्त्र का अनुकरण करती रही .....या फिर पश्चिमी आलोचना का उल्था बनकर झूठा रोब गालिब करती रही।’ उन्होंने यह भी माना है कि अधिकांश आलोचना को कविता की परम्परागत लाठी से हाँका जाता रहा है। फिर पश्चिम से प्राप्त प्रतिमान उसकी अपनी जड़ों, परिवेश तथा स्वभाव की उपेक्षा करते हुये उस पर आरोपित किये जाते रहे। परिणामतः रचना और आलोचना के बीच का अंतराल तो बढ़ा ही, आलोचना की साख भी घटी। उनके अनुसार परम्परागत प्रतिमानों को भी समय के बदले रचना संदर्भों में जाँचने परखने, मूल्यांकन के नये औजार गढ़ने-विकसित –आविष्कृत करने की कोशिश भी बहुत कम हुई। अर्थात् ‘आलोचना संस्कारित’ नहीं की जा सकी। यही वजह है साहित्य की विविध विधाओं के विशेषज्ञ आलोचक, या विविध विधाओं की अपनी आलोचना सामने नहीं आ सकी। अपने असंतोष को व्यक्त करते हुये डा0 मिश्र के अनुसार, आलोचकों का एक ऐसा समुदाय जरूर तेजी से पनपा और विकसित हुआ जिसके झोले में कुछ ऐसे अजीब नुस्खे थे जो हर विधा की मूल्यवत्ता को उजागर कर सके ...। कविता के मूल्यांकन के औज़ार स्वच्छंदता से हर विधा के मूल्यांकन में इस्तेमाल हुये हैं। अतः सृजन का अपना वैशिष्ट्य तथा गुण वत्ता तो क्षतिगस्त हुई ही,  आलोचना भी कमजोर हो कर सामने आई। इन बातों से लगता है कि एक इतना बड़ा आलोचक अपनी विधा की सिथति से ही संतुष्ट न था। यदि ध्यान से देखें तो डा0 मिश्र की बातें अत्यंत सारगर्भित तथा प्रेरक हैं। यदि आज के सर्जक तथा साधक समीक्षक इन बातों को समझ कर आलोचना को पेशेवरी संकट से उबारें तो समकालीन आलोचना को एक नया तथा पुख्ता आधार प्राप्त हो सकेगा। हम डा0 मिश्र की बातों को आगे विकसित कर ही उन्हें सही अर्थों में श्रद्धांजलि दे सकते हैं।
                                                                       
(डा0 शिवकुमार मिश्र ने ये विचार प्रख्यात जनवादी समीक्षक डा0 चंद्रभूषण तिवारी की महत्वपूर्ण समीक्षा कृति, ‘आलोचना की धार’ की भूमिका में व्यक्त किये हैं।)


(विजेन्द्र जी वरिष्ठ कवि एवं कृतिओर पत्रिका के संस्थापक संपादक हैं।)

संपर्क-

Mob- 09928242515

टिप्पणियाँ

  1. यह पुनर्परीक्षण मैंने किया था । यहाँ ऐसा नहीं लगना चाहिए कि यह कोई सुनियोजित और जान-बूझकर किया जाने वाला आधुनिकतावादी कवियों का पुनर्पाठ था । मेरी यह मान्यता पहले से है और आज भी,कि हिंदी की काव्य-परम्परा में लोक को आदिकाल से पहले स्थान पर रखा गया है । पूरा भक्ति-काव्य इसी वजह से महत्त्वपूर्ण और आज तक प्रासंगिक है । इन कवियों में उससे विच्युति है और इनसे ज्यादा सार्थक कविता नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन ने की है । और उनको इसी विशेषता के कारण उस समय हाशिये पर धकेल दिया गया था । समझौता सर्वत्र होता है , जो कई बार सत्ताकेंद्रों के नज़दीक , भीतरी सूत्र की तरह जोड़े रहता है । यह मध्यवर्गीय बीमारी है , जो अब पहले से ज्यादा बढ़ गयी है । किसी बात को समझते हुए भी अनदेखी करना और चुप्पी खींचना कहीं न कहीं इसी कोटि में आता है । विजेन्द्र जी की बात से यह ध्वनित नहीं होना चाहिए कि आधुनिता वादी कवियों का पुनर्पाठ कोई जान-बूझकर या सीख देकर कराया गया कृत्य है । यह मेरी अपनी समझ है और आज भी है ।

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