सुनीता




इतने दिनों बाद भी प्रेमचंद क्यों प्रासंगिक बने हुए हैं कुछ इसी की तहकीकात में युवा कवियित्री सुनीता ने यह संस्मरण कभी ऐसे ही लिखा था। आज प्रेमचंद जयंती के अवसर पर प्रस्तुत है यह संस्मरण।  

विमाता,विमाता ही क्यों...?

जिस क्षण बचपन के अँगनाई में पहला कदम बढ़ाया था। उस दम माँ का सीना गर्व से प्रफुल्लित हो उठा था। कोमल हाथों ने जब पहली बार उनको महसूस करके एक मजबूत काम-धंधे से कठोर किन्तु इरादों से अटल अँगुलियों का स्पर्श किया था। उस पल दिल के देश-दुनिया में खुशी की नयी किरण फुट पड़ी थी। आँखों में उम्मीद के ढेरों बादल उमड़ पड़े थे.अपने पैईयां-पैईयां चलने की हड़बडाहट में बार-बार गिरते रहे। लेकिन माँ की खूबसूरत,हिरनी सी निगाहें मेरी हर एक हरकत पर लगी रहीं।

आज औचक ‘प्रेमचंद’ को याद करते हुए, मेरे यादों के बादल बरस रहे हैं। विमाता की दर्दनाक कडुवाहटें कनक की तरह आँखों के सामने चमक बिखेर रहीं हैं। सोचती हूँ ! वास्तव में दूसरी माँ-माँ नहीं बन पाती हैं तो खुद से उलझ जाती हूँ। भावनायें अपने गति से चलती हैं। दिल धौकनी से धड़कने लगते हैं.उत्तर का कोई सिरा हाथ नहीं लगता है।

‘निर्मला’ की निरीहता रह-रह के दिमाग में कौंध जाते हैं।चाह कर भी वह एक कुशल माँ के पदवी को न पा सकी। पति के ताने और पड़ोस के झूठे लांछनों ने उसे उबरने ही नहीं दिया। घुटन के मारे सांसे थम गयीं पर सोच की दुनिया कभी नहीं बदली। ‘निर्मला’ के निर्मल प्यार से सराबोर गंगाराम और मंसाराम का जीवन तजने की सम्मोहिनी अदा स्मृतियों के जंगल में दहाड़ रहे हैं।

सृजन का विशाल आकाश आगोश में समाये हुए। गाँव, घर-परिवार,कुनबा,पड़ोस,यार-दोस्त सब समय-समय पर बिछुड़ते चले गए। आज परछाइयों में एक-एक दृश्य उभर रहे हैं.झुर्रियों से बेहाल चेहरे पर आज चिंता की दूसरी लकीर खींचे चले जा रहे हैं। समय अपने रफ़्तार से एक-एक सरकता जा रहा है। जवानी निरंतर एक नए दहलीज पर तेजी से दस्तक देती रही है।






यौवन के आने से पहले ही लड़कपन में ही साहित्य ने छू लिया था। बुढ़ापे में लाठी टेकने तक बरक़रार रहे। यह बिरले सौभाग्य की बात है। बतकही के बेख़ौफ़ दिन ढलते-ढलते जीवन को ढुलका ही ले जायेंगे। इससे कोई नहीं बच पाया है.31 जुलाई 1880 के हिंडोले में झूलते ललना के पालना को मृत्यु रूपी हवा के तेज झोंके साहित्य मर्मज्ञ मुंशी जी को भी 8 अक्तूबर 1936 में अपने साथ उड़ा ले गए। सम्पूर्ण साहित्य और समाज को मणिकर्णिका घाट के घुटनों में घुलते हुए देखने को विवश किया।

जब-जब उनके कृतियों के साथ शब्दों ने अटखेलियाँ की एक नए इमारत की नींव पड़ी। मुझे आज भी याद आता है जब पहली बार मेरे हाथ 'ईदगाह' लगी थी। उसी दिन से मन में दद्दू के प्रति स्नेह के तारे चमक उठे थे। वह बैरा (चंदौली के पास छोटे से आदिवासियों का गाँव) के बीहड़ जंगलों में डील-डामर खेतों में बोये गए फसलों की रखवाली किया करते थे.लिट्टी-चोखा से जीवन गुजारते हुए दुनिया से गुजर गए।

‘ईदगाह’ की चिमटा जागेश्वरनाथ से खरीदने की प्रेणना जो मिली थी। कहानी के मर्मस्पर्शी बुनावट ने पहली सीख के साथ जीवन को एक नयी दुनिया से रु-ब-रु करवाया था। जिसकी कसक आज भी बरक़रार है। दिलचस्प यह है कि इतने उम्र बीतने के बाद भी उस सख्श के सृजन की ताप अब तपाये, सताए और दुरदुराये गए 'होरी' के ‘मरजादी’ हुमक के साथ मौजूद है।

'गोबर' के गठुआते माहौल से युवाओं के जोश,जूनून और झल्लाहट की झलक आस-पास रोज़-ब-रोज़ नजरों से टकरा जाते हैं। विद्रोह की ज्वाला ‘मरजाद’ के आँगन में आ कर ठिठक जाती हैं। इसी ठहराव से जन्म-मरण की कुलबुलाती यादें बेचैन कर देती हैं। भूख की पीड़ा नीरवता के घनघोर वादियों में व्याकुल हो विचरने लगतीं हैं।

 जहाँ से यातना का सागर हिलोरे लेने लगता है। अतीत के यथार्थ से टकराते ही सब कुछ गर्म तवे पर एक बूंद के मानिंद जीवन की सारी आकांक्षाएं, अपेक्षाएं, उम्मीदें और सपने छन्न हो जाते हैं। "मेहनत करके अनाज पैदा करो और रूपये मिलें,वह दूसरों को दे दो"...जिनके "घर में अनाज नहीं है, देह पर कपड़े नहीं हैं,गाँठ में पैसे नहीं है।"

मालती-मेहता के ज्ञान बघारते दर्शन आज हर किसी के जुबान पर चढ़ा हुआ है। अपने बदले हुए स्वरूप में भद्दगी के बियावान में भटक रहे हैं।

'सोजे वतन' के जलती प्रतियों के साथ मजबूत होते इरादे का परिणाम रहा की 'मंगलसूत्र' की पूरी गांठे नहीं लग पायीं थीं। निर्मम मृत्यु ने धर दबोचा था। लेकिन जीवटता की अनंत गाथाएं इतिहास में दर्ज हो चुकी थीं।

पहचान की पहली यात्रा की शुरुआत धनपत राय श्रीवास्तव नाम से हुई। वह धीरे-धीरे 'नबाबराय' के ठोस भूमि पर 'कहानियों के पिरामिड' के साथ ही 'उपन्यास सम्राट' बन बैठे। यथार्थवादी परम्परा की नींव डालने वाले अपने मित्र 'मुंशी दयानारायण निगम' के सुझाव पर अमल करते हुए झट 'मुंशी प्रेमचन्द' नाम से उर्दू पत्रिका 'ज़माना' में लिखने लगे जो जीवनपर्यंत चला।

साहित्य समाज के संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता, सुधी संपादक और तमाम भाषाओँ के जानकार मुंशी जी जागरूक इंसान थे। बनारस के पांडेयपुर चौराहे से सीधे की ओर 'लमही' आज भी लम्बी-लम्बी सांसें ले रहा है। बुद्ध के उपदेशों की सोंधी सुगंध सारनाथ से सीधे आ रही है।

अतीत के यादों के मौजूद साये में यथावत, सृजक की अनुगूँज ध्वनि, निगाहों से दिल तक जाती है। लेकिन आज वहाँ आवाजों के घेरे का कहीं अता-पता नहीं है। माँ आनंदी देवी के पुत,पिता अजायबराय के आँखों के पुतली के अमर पात्र चौराहे पर दस्तक देते मुसाफिरों को दिशा दिखाते मनमोहित कर जाते हैं। सम्मोहन के साहित्य एक नए सृजन को उकसाते हैं। यहीं से मधुर सुर बज उठते हैं। जहाँ से एक नए कहानी, उपन्यास, कविता,एकांकी और नाटक के पात्र कानों में हौले से कुछ सुनगुन कर जाते हैं।

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के पहले कहानी के छपने की जद्दोजहद 'सरस्वती'(1900,काशी,फिर इलाहाबाद, महावीर प्रसाद द्विवेदी(1903),मासिक) की ओर मुड़कर देखने को बार-बार विवश करते हैं। ‘सरस्वती’ के दिसम्बर अंक में सन 1915 में 'सौत' की आहट से पाठकीय परिवारों में खदबदाहट हुई थी.जिसकी उन्मुक्त यादें जेहन में जब्त हैं।

सर्जना के आखिरी दौर में सन 1936 में अंतिम कहानी 'कफ़न' की शैय्या पर लेटी हुई मिली। आज जाने-अनजाने में कई माएं,बहने,बेटियां और बुजुर्ग की लाशें सड़क, चौराहे, चौबारे या दूर कहीं, किसी मोड़ पर अपने शिनाख्त और सफ़ेद चादर के इन्तजार में ठंढे पड़े हुए हैं। मुर्दा घरों में जलती लाशों में खुद को खोजते फिर रहे हैं। अपने काँधे पर अपने ही जनाजे को ले कर चलने की रश्म चकाचौध में दिखाई देते ही रहते हैं।

भारतीय साहित्य में विमर्शों की वास्तविक शुरुआत प्रेमचंद की रचनाओं में मुखर हुई थीं। नारी के अंतर्मन की कुलबुलाहट, झल्लाहट और यातना से विरोध की पहली फुहार फड़के थे.जातीयता के दंश से दर्द की उठतीं लहरें इनके रचनाओं से जुबान तक चढ़े थे।

वीरेंद्र यादव जी अपने पुस्तक 'उपन्यास और वर्चश्व की सत्ता' में एक स्थान पर लिखते हैं कि "जब उत्तर आधुनिक कुतर्क के चलते कुछ लोगों को 'प्रेमचंद के गाँव अचानक झूठे लगने लगते' हो और जब आस्वादपरक आलोचकों को प्रेमचंद की परम्परा के समानान्तर साहित्य की कई परम्पराएँ दिखाई देने लगती हों। वर्तमान समाज व् साहित्य के दलित व् नारी-विमर्श सरीखे ज्वलंत मुददों की निशानदेही भी यदि 'गोदान' के माध्यम से की जा सकती हो तो यह पुनर्पाठ और भी प्रासंगिक हो जाता है.जानना यह भी दिलचस्प है कि इतिहास और राष्ट्रीय विमर्श से बेदखल अतीत के जिन निम्नवर्गीय प्रसंगों को इतिहास की  'सबाल्टर्न' धारा ने इस दौर में सहेजने व् रेखांकित करने का कार्य किया है।"

उपरोक्त विवेचनात्मक विश्लेषण से एक बात पुख्ता हो जाती है कि प्रेमचंद कितने बड़े दूरदर्शी इंसान थे। महलों से झोपड़ों तक के दर्द को बखूबी पहचान है। सिर्फ पहचाना ही नहीं बल्कि उस दिशा संकेत के तमाम राहे छोड़ गए। जिसे समझने-समझाने,चिंतन-मनन और मंथन की विशेष आवश्यकता है। प्रेमचंद जी  कहते हैं- “मैं उपन्यास को मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्व है....सब आदमियों के चरित्रों में भी बहुत कुछ समानता होते हुए भी कुछ भिन्नताएँ होतीं हैं। यही चरित्र सम्बन्धी समानता और भिन्नता-अभिनत्व के भिनत्व और विभिनत्व में अभिनत्व दिखना उपन्यास का मूल कर्तव्य है।” इसी के आस-पास समाज भी ठहरता है। मानवीय मंचन का केन्द्र व्यक्ति खुद है.उसकी अपनी सीमा और सामर्थ्य का ही देन सामाजिक,राजनीतिक,आर्थिक और भौगोलिक परिष्कार निर्भर करते हैं।  

प्रेमचंद के अपने विचार में "साहित्यकार देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं,बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।" कमोवेश यह बात बिल्कुल सत्य है.साहित्य समाज का आईना है। जिसके तेज निगाहों से कोई भी नहीं बच पाता है। पाप,पुण्य की लेखा-जोखा रखने वाले भी अपने काली करतूतों को गेरुवा वस्त्र में नहीं छिपा पाते हैं।
सन 1921 ई में महात्मा गाँधी जी के नक्से क़दमों पर चलते हुए सरकारी नौकरी छोड़ दी। कुछ महीने तक 'मर्यादा' (1909 प्रयाग,कृष्णकान्त मालवीय,मासिक) पत्रिका का संपादन किया। लगभग छः माह तक 'माधुरी' (1922 लखनऊ,दुलारेलाल भार्गव,मासिक) में अपनी सेवाएं दी। मन को तसल्ली नहीं मिली। मन के किसी कोने में बैठे साहित्य का बड़ा भण्डार उन्हें बार-बार कुछ और करने के लिए विचलित करता रहा। इसी आत्ममंथन का परिमाण 1930 में बनारस से 'हंस' (मासिक,सहयोगी संपादक शिवदान सिंह चौहान, अमृतराय) के उदय के साथ उदित सूरज की पीली किन्तु तेज प्रकाश से साहित्य संसार में एक नए युग की शुरुआत होते हुए देखा गया। जो आज भी अपने मूल रूप से भटकते हुए समय के साथ कदम मिला कर राजेंद्र यादव के संरक्षण में सुखद रहा है।

समाज और साहित्य के प्रति लगाव की गहन पीड़ा अभी भी शांत न हुई थी.1932 में 'जागरण' के रूप में एक साप्ताहिक पत्रिका निकाली। 1936 के 'अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ' की अध्यक्षता के साथ एक नए पड़ाव की ओर इशारा किया।
अपने जीवन के रंगमंचीय अनुभव को सन 1915 से कहानी के रूप में ढाल कर इस विधा संसार में कदम रखा। लगभग तीन सौ कहानियां लिखीं। नौ ग्रहों की भांति नौ संग्रहों में संकलित रचनाएँ ‘सप्त सरोज’, नवनिधी, प्रेमपूर्णिमा, प्रेम-पचीसी, प्रेम-प्रतिमा, प्रेम द्वादशी, समरयात्रा, मानसरोवर -8 भागों में विभक्त है। जिसमें मानव जीवन के सारे रंग मौजूद हैं। अपने कथा के बुनावट में झुग्गी-झोपड़ियों से लगायत ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं को केन्द्र में रखा। कहीं पर यथार्थ की कटु सच्चाई दिखते हैं,कहीं पर हकीकत के साथ भावना के सागर हिचकोले खाते, उमड़-घुमड़ आते हैं। कहीं-कहीं पर कटाक्ष के बादल मंडराते हैं,कहीं पर व्यंग की त्रिवेणी प्रवाहित होती दिख पड़तीं हैं।

मनः संवेदना पर गहरी छाप छोड़ती कहानियां स्मरण में छाई हुई हैं। बचपन की ‘गिल्ली-डंडा’ की बातें हाकी, क्रिकेट, फुटबाल और बैडमिंटन के जमाने में जीवंत हैं। एक घटना के साथ दर्द का रिश्ता जोड़ बैठी हैं।
खेती, किसानी और अन्न की कहानी प्रागैतिहासिक काल से ही पशुओं-पंक्षियों से जुड़े हुए हैं। ‘दो बैलों की कथा’ की दरकार आज भी सत्य रूप में कायम है।

युगों-युगों से सरपरस्ती की भावनाएं ‘बड़े भाई साहब’ के बरगदी छाँव के साथ अपनी मौजूदगी बनाये हुए है।

हलकू के हलक से बहार निकलते अनाज के दाने आज भी कईयों के हलक में अटके पड़े हैं। जाड़े से ठिठुरते हुए ‘पूस की रात’ गुजारते हुए आस्मां की ओर लगीं उम्मीद की निगाहें कुछ कह रहीं हैं।

जातीयता के भेदभावी ठसक से ‘ठाकुर का कुआ’ ठेठ अंदाज़ में अपनी ठसक बनाये हुए है। ‘सदगति’ की संगीत रह-रह कर सुनाई देती ही रहतीं हैं।‘बूढी काकी’ की अनुभवी और ठोस बातें कानों को कड़वी लगने लगीं हैं। तरुण ताल की ‘तावान’ अब तड़प उठीं हैं। तल्ख़ यादों के पट पछुआ बहा रहे हैं। मन के किसी कोने में कलकलहट मचाएं हुए हैं। ‘विध्वंश’ की विकट स्थितियां और संकट संसार सृजन पर भारी पड़ रही हैं। सम्पूर्ण दुनिया इसके खौफनाक साये में जिन्दा है।

‘दूध का दाम’ दिनों दिन आसमान को चूम रहा है। एक-एक बूंदें कीमती होती जा रही हैं.पानी की मिलावट बदस्तूर जारी है। विकास, अनुसंधान और समाधान के तमाम सुविधाओं के बावजूद सर्पदंश से अधिक अमानवीयता के क्रूर हाथों से जिंदगियां तबाह हो रही हैं। ‘मंत्र’ के तंत्रीय चक्र चल रहे हैं। आधुनिक भगवानों की जमात सड़कों पर पूँजी के लिए नारे लगाते फिर रहे हैं। जीवन की सांसें उखड़ती ही जा रही हैं। गोल्फ खेलने वाले अपने ही दुनिया में बदमस्त हैं। ‘पंच परमेश्वर’ की अचूक तीरें अब दूसरा रुख कर चुकी हैं। खाप पंचायतों के रूप में खुनी-खंजर में तब्दील हो गयीं हैं। 'शतरंज' की मनोरंजक विसातें धीरे-धीरे विशाल, विकराल, व्यवसाय और विकल्प का स्थान ग्रहण कर चुकी हैं।

प्रेमचंद जी शुद्ध रूप में उर्दू के व्यक्ति, लेखक और चिन्तक थे। इनकी अधिकांश रचनाएं पहले उर्दू में लिखी हुई हैं तत्पश्चात हिंदी में अनूदित कर प्रकाशित हुई। 'असरारे मआबिद उर्फ़ देवस्थान रह्श्य' नाम से उर्दू के एक साप्ताहिक "आवाज-ए- खल्क" में 8 अक्तूबर 1903 से लेकर 1 फरवरी 1905 तक लगातार धारावाहिक के रूप में छपता रहा। 'हमखुर्मा  व् हमसबाब' एक बेहतरीन उपन्यास है जो कि  1907 में 'प्रेमा' नाम से हिंदी में प्रकाशित किया गया।  'बजारे-हुस्न का हिंदी रुपान्तरण 'सेवासदन' के नाम से हुआ। कहा जाता है कि सन 1918 के साथ ही उपन्यास के दुनिया में इनकी पहली पदचाप सुनाई दी थी। यह एक महत्वपूर्ण कृति है। इसमें नारी जीवन के मर्म को बेहद गम्भीर तरीके से व्यक्त किया गया है।  एक सामान्य नारी के वेश्या बनाने के दर्द,पीड़ा, कसक, चुभन, यातना, शर्म, हया और हरकत की दास्ताँ मौजूद है।

रामविलास शर्मा लिखते हैं-"सेवासदन’ में व्यक्त मुख्य समस्या भारतीय नारी की पराधीनता है।" मुझे लगता है यह केवल किसी देश विशेष की परतंत्रता नहीं है, बल्कि आधी आबादी के साथ जो कुछ होता है या हो रहा है उसकी एक बारीक छुवन है जो युगों-युगों से नहीं बदला है।

आज भी एक बच्ची के पिता को उतनी ही गहरी चिंता रहती है, जो कभी निर्मला के पिता को थी। पढ़े-लिखे की जमता भले ही हो लेकिन दकियानुसी सोच की दुनिया आज भी आडम्बरी  उल्कापिंड के इर्दगिर्द ही मंडरा रही है।
पशुओं के जंगल में एक बार व्यक्ति सुरक्षित निकल सकता है लेकिन इंसानी भीड़ भरे जंगल से साबुत बचे रहना कठिन ही नहीं नामुमकिन हैं। इसके ताज़े उदाहरण धनबाद के साहिबा, कश्मीर के पहलगाम और गौहाटी के घटनाक्रम के तौर पर देखें तो कुछ गलत नहीं है…. .

प्रेमचन्द ! प्रेमचन्द ही रहेंगे भले दुनिया में कई दुनिया बस जाए तो क्या...

यादों को टटोलते हुए...सादर नमन !


सुनीता कवियित्री हैं। आजकल दिल्ली के हंसराज कॉलेज में हिन्दी का प्राध्यापन कर रही हैं।  



सम्पर्क-
मोबाईल- 09953535262





टिप्पणियाँ

  1. बहोत महत्वपूर्ण जानकारी दी है आपने धन्यवाद मेडम जी.

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