पेस्सोआ की कवितायेँ



 (चित्र : सरिता शर्मा)
संक्षिप्त जीवन- परिचय

जन्म तिथि: 12/08/1964
शिक्षा:     एम.ए. (अंग्रेजी और हिंदी),
          पत्रकारिता, फ्रेंच, क्रिएटिव राइटिंग और फिक्शन राइटिंग में डिप्लोमा.      
          कहानी लेखन और पटकथा लेखन में पत्राचार पाठयक्रम
          एन. आई. सी. से ऑफिस प्रोडक्टिविटी टूल्स में प्रशिक्षण कार्यक्रम
 

पुस्तकें
कविता संग्रह: सूनेपन से संघर्ष.
आत्मकथात्मक उपन्यास: जीने के लिये
अनूदित पुस्तकें : रस्किन बोंड की पुस्तक ‘स्ट्रेंज पीपल,स्ट्रेंज प्लेसिज’ और रस्किन बोंड द्वारा  संपादित ‘क्राइम स्टोरीज’ का हिंदी अनुवाद.


प्रकाशित रचनाएँ
कहानियां : पहली कहानी ‘वेक्यूम’, हंस में ‘मुबारक पहला कदम’ स्तंभ के अंतर्गत छपी जिसकी बहुत सराहना हुई. अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियां हैं- इंडिया टुडे (ससुराल),  साहित्य अमृत (स्पेस), इन्द्रप्रस्थ भारत (अदना सा सिकंदर), हरिगंधा (बेपरदा) और इंडिया न्यूज़ (सच-झूठ).

कवितायेँ:  कादम्बिनी, युवा संवाद, सरस्वती सुमन, कथा संसार, समय सुरभि अनंत और मसि कागद में.   
                                           
कार्यानुभव:
 नेशनल बुक ट्रस्ट में 2 अक्तूबर 1989 से  4 अगस्त  1994 तक संपादकीय सहायक.
 राज्य सभा सचिवालय में 5 अगस्त 1994 से  8 अक्टूबर  2006 तक अनुवादक, 9 अक्टूबर  2006 से    
   8 अक्टूबर 2009 तक संपादक और 9 अक्टूबर   2009 से सम्प्रति सहायक निदेशक के पद पर कार्यरत.  
 

 

(चित्र : फेर्नान्दो पेस्सोआ)

फेर्नान्दो पेस्सोआ 20 वीं सदी के आरम्भ के पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक व अनुवादक थे और दुनिया के महानतम कवियों में से एक है. अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने 72 झूठे नामों या हेट्रोनिम् की आड़ से सृजन किया, जिन में से तीन प्रमुख थे. और हैरानी की बात तो यह है की इन सभी हेट्रोनिम् या झूठे नामों की अपनी अलग  जीवनी, दर्शन, स्वभाव, रूप-रंग व लेखन शैली थी. पेस्सोआ  के जीते-जी उनकी एक ही किताब प्रकाशित हुई. मगर उनकी मृत्यु के बाद, एक पुराने ट्रंक से उनके द्वारा लिखे 25000 से भी अधिक पन्ने  मिले, जो उन्होंने अपने अलग-अलग नामों से लिखे थे. पुर्तगाल की नैशनल लाइब्रेरी में इनके सम्पादन का काम आज भी जारी है.

प्रस्तुत है फेर्नान्दो पेस्सोआ की कविताएँ। कविताओं का अनुवाद किया है सरिता शर्मा ने।  


        -1-
मैं गडरिया हूं
भेड़ें मेरे ख़याल हैं और
हर ख़याल संवेदना.
मैंने सोचता हूँ अपनी आंखों और कान से
हाथ और पांव से, नाक और मुंह से भी.
फूल के बारे में सोचना उसे देखना और सूंघना है.
और फल को खाना उसका अर्थ जान लेना है.
इसी वजह से एक गर्म दिन में
बहुत ख़ुशी के बीच मैं उदास हो जाता हूँ,
मैं वस्तुतः वही हूँ...
और घास पर लेटकर
मूंद लेता हूं अपनी आंखें.
तो लगता मेरा समूचा शरीर सच में लेटा हुआ है,
मैं सत्य जानता हूं, और मैं खुश हूँ.

              -2-
धीमे धीमे बहुत धीमे
हौले से हवा चलती है,
और गुजर जाती है यूं ही धीमे से,
नहीं जानता मैं क्या सोच रहा हूँ,
न ही जानना चाहता हूँ.

            -3-

सिर्फ प्रकृति दैवी है, और वह दैवी नहीं है
अगर मैं उसे कभी व्यक्ति कहता हूँ
तो सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं मनुष्यमात्र की भाषा बोल पाता हूँ
जो चीजों का नामकरण कर देती है
और उन्हें व्यक्तित्व से संपन्न बना देती है.
मगर चीजें नाम या व्यक्तित्वविहीन हैं ;
वे बस हैं, और आकाश विशाल है धरती विस्तृत
और हमारा दिल मुट्ठीभर ..
आभारी हूँ अपने अज्ञान का

आनंद लेता हूँ इन सबका वैसे ही
जैसे कोई जानता हो सूरज विद्यमान है.

अगर आप मुझमें  रहस्यवाद देखना चाहें तो ठीक है मेरे पास है
मैं रहस्यवादी हूँ, पर शरीर में ही
मेरी आत्मा सीधी सादी है सोचती नहीं
मेरा रहस्यवाद ज्ञान की कमी नहीं
वह जीना और उसके बारे में न सोचना है.
मुझे नहीं पता प्रकृति क्या है: मैं इसे गाता हूँ,
एक पहाड़ की छोटी पर रहता हूँ    
एकांत सफेदीपुते घर में,
और वह मेरी परिभाषा है



       -4-

आज पढ़े मैंने पढ़े दो पन्ने
किसी रहस्यवादी कवि की किताब के
और हंस पड़ा हालाँकि रोया  भी सकता था
रहस्यवादी कवि रुग्ण दार्शनिक हैं
और दार्शनिक पगले होते हैं
जो कहते हैं फूल महसूस करते हैं
और पत्थरों में आत्माएं हैं
और चांदनी में नदियाँ उन्मादी हो जाती हैं
मगर फूल नहीं रहेंगे फूल अगर वे सोचने लगे
वे बन जायेंगे इन्सान
और यदि पत्थर आत्मवान होते वे जीवित हो जाते, पत्थर कहाँ रहते;
और नदियाँ अगर हो जाती उन्मादी चांदनी में
वे बीमार इन्सान हो जाती.
जिन्हें समझ नहीं फूलों, पत्थरों और नदियों की
वही बात कर सकते हैं उनकी आत्माओं की .
जो बताते हैं पत्थरों, फूलों और नदियों की आत्माओं के बारे में
अपनी और अपनी मिथ्या धारणाओं की बात करते हैं.
शुक्र है पत्थर महज पत्थर हैं,
और नदियाँ सिर्फ नदियाँ
फूल केवल फूल हैं.
जहाँ तक मेरा सवाल है, अपनी कविताओं का गद्य लिखता हूँ
और संतुष्ट हूँ
कि जानता हूँ प्रकृति को बाहर से
इसके भीतर क्या है नहीं जानता
क्योंकि प्रकृति के भीतर कुछ भी नहीं
कुछ होता तो वह प्रकृति न रहती.


   -5-

सब प्रेम पत्र होते हैं 
बेतुके.
अगर बेतुके न होते तो प्रेम पत्र न होते.
अपने ज़माने में मैंने भी लिखे थे प्रेम पत्र
ऐसे ही एकदम बेतुके
प्रेम पत्र , अगर प्रेम है,
वह जरूर बेतुका होगा .
मगर सच यह है
जिन्होंने नहीं लिखे कभी प्रेम पत्र

वे हैं बेतुके .
काश मैं लौट पाता उस काल में
जब लिखे थे मैंने प्रेम पत्र
बिना यह सोचे
कितना बेतुका था सब कुछ.

संपर्क:
1975, सेक्टर 4, अर्बन एस्टेट,
गुड़गांव 122,001.
(हरियाणा)


ईमेल: sarita12aug@hotmail.com


मोबाइल: 9871948430


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं।)

टिप्पणियाँ

  1. अच्छी कवितायें और उतना ही अच्छा अनुवाद ...बधाई सरिता जी को

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  2. पेस्सोआ मेरे प्रिय कवियों में से हैं। सरिता जी द्वारा किये गए अनुवाद भी बेहद अच्छे हैं। शुभकामनाएं

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  3. फेर्नान्दो पेस्सोआ की कविताओं का लिंक प्रदान करने के लिए शैलेन्द्र सिंह राठोर का शुक्रिया. ये कवितायेँ इतनी सहज और हम सबके दिल से जुडी हुई महसूस हुई कि मैंने उनमें से कुछ का उसी वक्त अनुवाद कर दिया. उम्मीद है और साथियों को कविताओं का यह अनुवाद पसंद आयेगा.

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  4. बहुत खूबसूरत कविताएँ ... और बहुत सुन्दर अनुवाद ... :)

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  5. सबसे पहले वाया शैलेन्द्र , पेसोवा से मिलना हुआ था ......खूबसूरत कविताएँ ! आपको बधाई एवं शुभ कामनाएं सरिता जी !

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