रमाकान्त राय


आज पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली साहित्यिक प्रतिक्रियाओं को भले ही हल्के में लिया जाता हो लेकिन इसका एक आशय हुआ करता है. समीक्षा कैसे की जाती है और रचनाओं पर कैसे बेलाग प्रतिक्रिया व्यक्त की जानी चाहिए इसके बारे में हम मार्कंडेय की इसी तरह की उन टिप्पणियों को पढ़ कर जाना सकते हैं, जिसे उन्होंने कभी हैदराबाद से छपने वाली प्रतिष्ठित पत्रिका 'कल्पना' नामक पत्रिका के लिए लिखा था. ये टिप्पणियाँ अब एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो चुकी हैं. इसी पुस्तक पर एक सारगर्भित समीक्षा लिखी है युवा आलोचक रमाकान्त राय ने.  

चक्रधर की साहित्य धारा



पत्र पत्रिकाओं के लिए पाठक का कितना महत्त्व है- इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लगभग हर पत्र-पत्रिका में पाठकों के पत्र का एक स्तम्भ हुआ करता है। समाचार पत्र तो इसे बाकायदा सम्पादकीय पन्ने पर प्रकाशित करते हैं। सम्पादकीय पन्ने को पाठकों के पत्र के बिना अधूरा माना जाता है। पाठक के पत्र को पढ़ कर हम आसानी से अनुमान लगा सकते हैं कि पत्र कितना गंभीर है। वह किस तरह के मुद्दों को प्राथमिकता देता है। मेरा आशय यह है कि पाठकों की प्रतिक्रियाएं बहुत काम की चीज होती हैं। वह मुखापेक्षी तो नहीं ही होती हैं, क्योंकि पाठकों को अपनी बात कहने के अलावा और कोई प्रयोजन भी नहीं रहता। हम इन टिप्पणियों में सम्पादकीय विवेक भी देख सकते हैं। बहरहाल, बीते जमाने की चर्चित और जानी मानी साहित्यिक पत्रिका “कल्पना” ने एक जमाने में पाठकों के पत्र की इन्हीं विशिष्टताओं को ध्यान में रख कर “साहित्यधारा” नाम से एक स्तम्भ शुरू किया था। इसमें उस समय प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं में छपी रचनाओं पर टिप्पणियां होती थीं। इसे ‘चक्रधर’ के छद्म नाम से जाने-माने कथाकार मार्कण्डेय लिखा करते थे।

हिन्दी में छद्म नाम से लिखने की पुरानी परम्परा रही है। महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, अज्ञेय और हजारी प्रसाद द्विवेदी, राही मासूम रजा आदि ने कई महत्त्वपूर्ण रचनाएं छद्मनाम से कीं। मार्कण्डेय जी ने चक्रधर छद्म नाम से कल्पना में सन १९५४ के मार्च से ले कर १९५९ के मार्च तक कॉलम लिखा। उनका नाम किस तरह उजागर हुआ, इसकी कथा भी रोचक है। साहित्यधारा के इन टिप्पणियों को कवि बलभद्र और विचारक दुर्गा सिंह ने चक्रधर की साहित्यधारा नाम से सम्पादित किया है। बकौल संपादक द्वय “मार्कण्डेय की यह रचनात्मक देन ‘कल्पना’ के पीले पन्नों के बीच दबा पड़ा हुआ था।” एकाग्र हो जाने के बाद यह उन सुधीजनों के लिए बहुत सहूलियत भरा हो गया है जो १९५४ से ले कर १९५९ तक के साहित्य को इतिहास की दृष्टि से समझना चाहते हैं। इस किताब की भूमिका में वह प्रसंग भी दिया गया है, जिसने यह शिनाख्त की कि चक्रधर कौन हैं?

कल्पना की टिप्पणियों में उस समय का साहित्यिक इतिहास छिपा हुआ है। यह टिप्पणियां एक पाठक की टिप्पणियां हैं। पाठक की इन टिप्पणियों में उस समय की तमाम पत्रिकाओं के विशेष रचनाओं का उल्लेख मात्र नहीं है, इनमें उनका सूक्ष्म विवेचन भी देखने को मिलता है। यह सहज ही देखा जा सकता है कि नामवर सिंह की पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ में उद्धृत अधिकांश काव्यांश साहित्यधारा के स्तम्भ में आये हैं। इसी तरह ‘कहानी नई कहानी’ की कई मान्यताएं भी चक्रधर की टिप्पणी में खोजी जा सकती हैं। यह एक ऐतिहासिक महत्त्व का संकेत मात्र है। कहना न होगा कि चक्रधर नामी यह व्यक्ति जो मार्कण्डेय जी का पर्याय बन गया है, ने कई साहित्यिक मान्यताओं को बीज रूप में ही पहचान लिया था। साहित्यधारा की इन टिप्पणियों को मार्कण्डेय जी के नाम से जोड़कर देखने पर दो तीन बातें तो सहज ही उभर आती हैं। एक तो यह कि, मार्कण्डेय जी महज एक कहानीकार नहीं थे। उन्होंने एकांकी भी लिखी है। कहानी की बात कहानियों पर उनकी विशिष्ट आलोचनात्मक पुस्तक है। वे ‘कथा’ पत्रिका के संपादक भी हुए। लेकिन उन सबसे पहले १९५४ के समय में वे एक बेहतरीन पाठक थे। कल्पना के इस स्तम्भ को देख कर इसे बखूबी समझा जा सकता है। वे एक सजग पाठक थे। उन्हें अपने छद्मनाम की सार्थकता बनाए रखनी थी और निष्पक्ष मूल्यांकन भी करना था। वे उन्हीं दिनों कहानियां और एकांकी आदि भी लिख रहे थे। यह देखकर आश्चर्य होता है कि एक निष्पक्ष पाठक की तरह उन्होंने अपनी कहानियों की भी निर्मम आलोचना की है। एक बानगी देखिये- “कल्पना में प्रकाशित मार्कण्डेय की ‘अगली कहानी’ कहानी से ज्यादा निबंध के करीब पड़ती है। शुरू से लेकर अंत तक एक गहरी अनास्था और खीज व्याप्त है। कहीं कहीं तो लगता है, जैसे लेखक स्वयं पर विश्वास नहीं रखता।” इसी तरह वे जनवरी १९५६ के अंक में लिखते हैं- “राष्ट्रवाणी के पिछले अंक में प्रकाशित मार्कण्डेय की कहानी ‘बुचऊ सिंह’ एक सफल कहानी है, जिसमें गाँव की भाषा का प्रयोग आपत्तिजनक है। खड़ी बोली के व्याकरण को तोड़ने के कारण कहानी दुरूह हो गयी है।।” उन्होंने अपनी रचनाओं की निर्मम आलोचना की है। यह उनके निष्पक्ष होने का प्रमाण है। चक्रधर मार्कण्डेय की एक एकांकी ‘अजंता’ का उल्लेख मात्र इसलिए करना चाहता है कि उसने “उसके सात पृष्ठ घेरे हैं।” आशय यह भी है कि मार्कण्डेय जी की रचनाओं का मूल्यांकन करते हुए इन टिप्पणियों को ठीक से देखना बहुत जरूरी है। उस समय की प्रकाशित कहानियों पर उनकी सारगर्भित टिप्पणियाँ बहुत सटीक हैं और ‘कहानी की बात’ की भूमिका की तरह लगती हैं।

चक्रधर की साहित्यधारा में सबसे ज्यादा खिंचाई सम्पादकीय की हुई है। चक्रधर हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकीय अक्षमता और दिशाहीनता से बहुत क्षुब्ध हैं। वे अक्सर उन्हें लताड़ पिलाते रहते हैं। सम्पादकों के लिए की गयी ये टिप्पणियां वर्तमान पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों के लिए एक आकाशदीप की तरह हो सकता है। वे सम्पादकीय के औचित्य, उनकी प्रासंगिकता, स्वरूप आदि पर यत्र-तत्र टिप्पणी करते दिखते हैं। अक्टूबर १९५४ के एक स्तम्भ में वे लिखते हैं- “सम्पादकीय का रूप और गुण, दोनों प्रकृति के अनुकूल होने चाहिए। जहाँ तक गंभीर साहित्यिक पत्रों का प्रश्न है, उन्हें अपने सम्पादकीय स्तंभों में साहित्य और संस्कृति से सम्बंधित समसामयिक समस्याओं को लेना चाहिए। इन समस्याओं पर उनके विचार चाहे जैसे हों, इनसे हमें मतलब नहीं। हमारा आग्रह इस बात का है कि पत्र की व्यक्तिगत रूचि और दृष्टिकोण का एक साधा हुआ माप वहां रहे। उसकी अपनी मर्यादा का प्रभावशाली विचारोत्कर्ष हमें मिलना ही चाहिए, चाहे वह पाठक को मान्य हो अथवा न हो। बस इतना अपेक्षित है कि पाठक कह उठे कि “हाँ, इसी विषय पर तो मैं इस पत्र के विचार जानना चाहता था।” उन्हें इस बात की हमेशा फिकर है कि हिन्दी के सम्पादक सम्पादकीय लिखते समय विवेक से काम क्यों नहीं लेते। उनका मानना है कि “सम्पादकीय कोई साहित्यिक लेख नहीं (जैसा आप कल्पना में पढ़ते हैं) पर सम्पादकीय तो किसी पत्र की ओर से एक विचारोत्तेजक निर्णीत मत होना चाहिए। मुख्य सम्पादकीय के साथ दो-एक आवश्यक टिप्पणियां भी हीनी चाहिए, जो सामयिक छोटी समस्याओं की पूर्ति करती चलें।” कल्पना के लिए स्तम्भ लिखते हुए भी उनकी यह स्पष्टवादिता हमें कायल बना देती है। अनायास नहीं है कि चक्रधर की टिप्पणियों का/ उनके स्तम्भ का सबको इंतजार रहता था।

मार्कण्डेय जी की इन टिप्पणियों में हम महसूस कर सकते हैं कि उन्हें बेहतरीन साहित्य की अच्छी पहचान थी। उस दौर में प्रकाशित नागार्जुन की कविता ‘दुखरन मास्टर’ को उन्होंने विशिष्ट स्थान दिया है और कविता की चार पंक्तियाँ उद्धृत की हैं। इसी तरह उनकी इस साहित्यधारा में शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, दुष्यंत कुमार, धर्मवीर भारती आदि नए कवियों की सटीक पहचान की गयी है। वे नरेश मेहता के मिथकीय प्रयोगों से संतुष्ट नहीं हैं। इसी तरह उन्होंने त्रिलोचन के साथियों को एक जगह हिदायत दी है कि वे उन्हें गजल की दुनिया से हटा लें। वे कविता में ही ठीक हैं। चक्रधर की टिप्पणियों में पन्त और अज्ञेय जैसे बड़े कवियों की कविता में आ रहे गिरावट को सहज ही महसूस किया गया है और उनकी सधे शब्दों में आलोचना की गयी है। एक स्थान पर तो उन्होंने जैनेन्द्र के चुक जाने को बहुत तीखे अंदाज में उद्घाटित किया है। कविता की ऐसी पहचान अन्यत्र बहुत मुश्किल से मिलती है। आज जब कवि गण भी किसी कविता के विषय में टिप्पणी करते हुए अच्छी, बहुत अच्छी और सुन्दर जैसे विशेषण का प्रयोग कर फारिग हो जाते हैं, मार्कण्डेय जी, उसकी गहराई का ख़याल करते दीखते हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं- “सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का ‘सिपाहियों का गीत’ यद्यपि युद्ध विरोधी, शांति भावना पर ही आधारित है, पर उसमें एक प्रकार की अतिभावुकता है, जो उसे सस्ती बनाती है और उसे गहरी रचना नहीं बनने देती”। इसी तरह उन्हें अज्ञेय और नरेश मेहता और पन्त जी की ख़राब रचनाओं को खराब कहने का हुनर मालूम है। उसकी बेहतर पहचान है। उनकी उद्धृत की हुई अधिकांश कवितायेँ आज भी कवि की और हिन्दी की प्रतिनिधि कविताओं में परिगणित की जाती हैं। नई कविता पर उनकी समझ देखने लायक है। वे मानते हैं कि नयी कविता में गहरी व्यंजना शक्ति और चेतना के सूक्ष्मतम तंतुओं को झंकृत कर देने वाली शक्ति है। इस झंकार को वे सुन पाते हैं, तभी शमशेर बहादुर सिंह की कविता पर मुग्ध होते हैं और अज्ञेय की रूढ़िपरक कविता पर भी व्यंग्य करने से नहीं चूकते। चक्रधर के बहाने से मार्कण्डेय जी हिंदी के तमाम विमर्शों पर अपनी दो टूक राय रखते हैं। यह दो टूक राय आज उन विमर्शों और स्थापनाओं का आधारविन्दु प्रतीत होता है। उनका स्पष्ट मानना है कि “आधुनिकता कोई एक विशिष्ट सिद्धांत नहीं है, एक विशिष्ट सिद्धांत भी नहीं है।”

चक्रधर की इन टिप्पणियों में विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाले निबंधों, लेखों पर तीखी और प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ हैं। उन टिप्पणियों में भी मार्कण्डेय का पक्ष आसानी से देखा जा सकता है। कहानीकार और एकांकी लेखक तथा कथा-समीक्षक मार्कण्डेय किस कदर बहुश्रुत और बहुत पठित व्यक्तित्व के धनी थे यह एक उल्लेख से शायद ज्यादा अच्छे से स्पष्ट हो जाए। एक चित्र के प्रसंग में उन्होंने अपना पक्ष रखा है कि यह कृति मूलतः एक विदेशी शैली की नक़ल है।

चक्रधर की साहित्यधारा में हिन्दी के राजभाषा बनने और १५ वर्ष बाद उस पर सरकारी पक्ष से उत्पन्न निराशा भी झलकती है। एक टिप्पणी में वे लिखते हैं- “संविधान में, अंग्रेजी का स्थान हिंदी ले ले इसके लिए, अब दो तरह के विकल्प सुझाए जा रहे हैं : पहला यह कि यह अवधि तब तक के लिए बढ़ा दी जाय, जब तक हिंदी राजभाषा के उपयुक्त सामर्थ्य प्राप्त न कर ले; दूसरा यह कि अंग्रेजी को ही राजभाषा बना रहने दिया जाए। ....राजभाषा के प्रश्न को लेकर अभी जो अभिनय हो रहा है, उससे वह इसी निष्कर्ष पर पहुँचा है कि जिन व्यक्तियों अथवा व्यक्ति समूहों के किए कुछ हो सकता है, उनमें ईमानदारी और कर्मठता, दोनों का अभाव है।” उनका अपना पक्ष यह है कि “हर व्यक्ति, वह जहाँ भी हो, अंग्रेजी के प्रयोग को यथासंभव कम करता जाय और उसकी जगह प्रादेशिक भाषा और जहाँ आवश्यक हो हिंदी का प्रयोग करने की कोशिश करे। इस प्रकार जो एक वातावरण देश में तैयार होगा, उसी से इस समस्या का समाधान निकलेगा।”

चक्रधर के रूप में मार्कण्डेय जी की चिंता हिंदी में दोयम दर्जे के शोध कार्य को लेकर भी रही है। अपने दिसम्बर, १९५८ के टीप में वे इस बात पर अपनी सम्मति देते हैं- “हिंदी में आज जितनी उदारता से डॉक्टर की उपाधियाँ बंट रही हैं, और शोध के जो परिणाम सामने आ रहे हैं, उन्हें देख कर शोध की प्रामाणिकता के सम्बन्ध में शंकालु हो उठना अस्वाभाविक नहीं है। असल में यह कार्य अलग-अलग विश्वविद्यालयों पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। एक केन्द्रीय संस्था शोध कार्य का नियमन करे, और वह प्रति वर्ष ऐसे विषयों की सूची प्रकाशित कर दिया करे, जो अब तक अछूते हैं और जिन पर शोध अपेक्षित है।” क्या वर्तमान में यह आवश्यकता नहीं महसूस की जा रही? चक्रधर अपनी टिप्पणियों में न सिर्फ अपने वर्तमान से टकराते हैं अपितु वे बेहतर भविष्य के लिए एक सुगठित और सुचिंतित खाका भी खींचते हैं। चक्रधर की ‘साहित्यधारा’ इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है।

वे साहित्य की दुनिया में अक्सर चर्चा में रहने वाले मुद्दे- पाठक और लेखक के सम्बन्ध पर भी टिप्पणी करने से नहीं चूकते। उनका मानना है– “एक वर्ग (बहुसंख्यक) निरक्षर किन्तु प्राचीन संस्कार-सम्पदा से समृद्ध, दूसरा वर्ग साक्षर किन्तु नए ज्ञान से अछूता, तीसरा वर्ग शिक्षित किन्तु अपने संस्कारों से विस्थापित, और चौथा वर्ग आधुनिक ज्ञान, पश्चिमी सभ्यता और संस्कारों में दीक्षित। इन चरों वर्गों के बीच का अंतर ज्यों-ज्यों कम होगा, मैं समझता हूँ, खपत और चर्चा के बीच जो अंतर है, वह भी कम होता जायेगा।” उन्होंने उस प्रवृत्ति पर यह चर्चा शुरू की है कि जिसकी चर्चा होती है, उसकी खपत नहीं होती है और जिसकी खपत होती है उसकी चर्चा नहीं होती। रामायण इसका अपवाद है तो इसलिए कि ‘वह समान रूप से विद्वानों और साधारण जन की चर्चा और रूचि का पात्र’ रही है। यह और इस जैसे अनेक मुद्दे चक्रधर की साहित्यधारा में सर्वत्र हैं। आखिरी स्तम्भ में उनके उस स्तम्भ की चर्चा है, जिसने कालांतर में कहानी की बात नामक पुस्तक का रूप लिया. इस स्तम्भ में उन्होंने मार्कण्डेय की कहानी पर किंचित विस्तार से चर्चा की है। चक्रधर की साहित्यधारा एक बहुत जरूरी दस्तावेज है। बलभद्र और दुर्गा सिंह को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने इस श्रमसाध्य कार्य को मूर्तिमान किया। यह पुस्तक मार्कण्डेय जी के साहित्यिक अवदान को रेखांकित करने में मददगार होगी।

चक्रधर की साहित्य धारा (मार्कंडेय का साहित्य संवाद): सम्पादन: बलभद्र एवं दुर्गा प्रसाद; लोकभारती प्रकाशन, पहली मंजिल, दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद-1, इलाहाबाद , 2012, पृष्ठ-176, मूल्य- रू. 350.00 


सम्पर्क-
द्वारा- डॉ० रमाकान्त राय

365 ए/1, कंधईपुर, प्रीतमनगर,

धूमनगंज, इलाहाबाद 211011     



मोबाईल- 09838952426

टिप्पणियाँ

  1. sudhir singh

    मैंने प्रकाशन के दौरान ही किताब देखी और अब यह बेहतरीन और साफ समीक्षा | रमाकांत ने किताब को उसके ऐतिहासिक सन्दर्भ में बखूबी रेखांकित किया है | शुक्रिया और बधाई!!

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  2. मारकन्डेय जी मेरे पसन्दीदा कथाकार है.पर उन्हें इस रूप में देख्नना जानना उत्सुकता जगाता है. रमाकान्त जी की बढिया टिप्पणी .किताब पढने की उत्सुक्ता जगा दी है. बधाई !!

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  3. ज्ञानवर्धक , बेहतरीन लिखा है रमाकांत जी ने . आभार
    -नित्यानंद गायेन

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