भाविनी त्रिपाठी की लघु कहानी विडम्बना




बालपन से ही लड़कियों को यह एहसास हो जाता है कि वे इस दुनिया में बिल्कुल अलग हैं। समाज जैसे नचाये उन्हें नाचना है। उन्हें कोई सवाल नहीं करना है बल्कि सवालों के जवाब देना है। भाविनी अभी बी टेक की छात्रा हैं लेकिन इनकी रचनात्मक निगाह ने बड़ी सूक्ष्मता से स्त्री जीवन की विडम्बना की तहकीकात की है। इन्होने अपनी लघु कहानी 'विडम्बना' के जरिये इस दृश्य को बखूबी उभारा है। तो आईये पढ़ते हैं भाविनी की यह कहानी।
       
विडम्बना

भाविनी त्रिपाठी

सिर का घूँघट सम्हाले, रूपा घर की बड़ी बहू होने का उत्तरदायित्व निभाने का अथक प्रयास कर रही थी। ननद का ब्याह हो तो एकमात्र  भाभी के कार्यभार का अनुमान लगाना कठिन नहीं। कभी रसोई में आगन्तुकों के जलपान का प्रबन्ध करती, तो कभी दौड़ कर हलवाई की माँगें पूरी करती। कभी नाईन पूजन-सामग्री माँगती तो कभी मोहल्ले की औरतें बन्ना-बन्नी गाने में सहयोग चाहतीं। बेचारी बडी देर से चाहती कि एक बार ननद उर्मिला के पास जा कर उसका भी हाल पूछ आये, पर अवकाश ही न मिलता था।



कुछ ही देर में उर्मिला की सहेलियाँ आ पहुँचीं। रूपा अगले कुछ देर सत्कार में व्यस्त रही। फिर कन्या के दही-चावल की रस्म का समय आया। सात कुमारियों को उर्मिला के साथ भोजन करना था। उसकी छः सहेलियाँ तो झट पाँत में बैठ गयीं। पर सातवीं कुमारी नहीं मिल रही थी। तभी रूपा की सास की नज़र उर्मिला की सहेली प्रतिभा पर पड़ी। वह मण्डप से दूर, अकेली खड़ी थी। उनके बहुत कहने पर भी प्रतिभा पाँत में नहीं बैठी। रूपा ने किसी अन्य लड़की को ला कर पाँत में  बिठा दिया। असल प्रतिभा की मनोदशा सबसे छिपी थी। उस इक्कीस वर्ष की अवस्था ने उसे अपनी उम्र से बहुत अनुभवी बना दिया था। प्रतिभा बस उस दिन को याद भर ही कर पाती थी। नौ वर्ष की प्रतिभा का जीवन जब बाल्यावस्था की मासूम उम्मीदों से परिचालित होता था। आज बरबस ही उसे वह दिन अपने समग्र रूप में याद आने लगा। कैसे वह अपनी नन्हीं कलाइयों के कड़े बजाती उस पतली पायल के दो अदद घुँघुरु छनकाती, हाथ में अपने गुड्डे को लिए, दौड़ती हुई सीधे माँ की गोद में समा गयी। माँ ने स्नेह से अपनी बेटी की चञ्चल, बेफिक्र हँसी को बढ़ावा दिया। फिर पूछा- ’’कहाँ थी रे, अब तक।‘‘ इस प्रश्न ने प्रतिभा के गौरव में वृद्धि की। इठलाते हुए उसने उत्तर दिया-  ’’आज मेरे गुड्डे का उर्मिला की गुडि़या के साथ ब्याह हो गया। उसी की बारात ले कर गयी थी।‘‘ माँ ने वास्तविक चिन्तन का अभिनय करते हुए बोला- ‘‘पर बहू कहाँ है ?’’ प्रतिभा ने उत्तरदिया- ’’अभी विदाई थोड़े ही कराई है। मेरा गुड्डा कुछ दिनों बाद अपनी दुल्हन की विदाई करा उसे घर ले आयेगा।’’ वाक्य पूरा करते ही वह फिर आँगन की ओर भागी।


शाम को प्रतिभा माँ को दिखाने के लिए, सिर्फ माँ को दिखाने के लिए, अपनी किताब पढ़ रही थी। तभी माँ एक नयी जोड़ी लहँगा लेकर उसके कमरे में आयी। माँ ने अपनी गुडि़या को लहँगा पहनाया। लाल चुनर ओढ़ाई, लाल चूडि़याँ और पाज़ेब भी पहनाई। प्रतिभा की खुशी का ठिकाना न था। दर्पण देखकर चहकते हुए बोली-  ‘‘माँ! मैं तो बिल्कुल दुल्हन सी लग रही हूँ।’’ माँ ने बड़ी गम्भीरता से उत्तर दिया-  ‘‘तूँ दुल्हन ही है।’’ इसका आशय प्रतिभा को तो तनिक भी पल्ले न पड़ा परन्तु घण्टे-दो घण्टे में अवश्य समझ गयी।

माँ और पिता जी उसे शिव जी के मन्दिर ले गये। वहाँ एक गुड्डे से सजे लड़के के साथ प्रतिभा ने फेरे लिये। इस गुड्डे ने प्रतिभा की माँग भरी और फिर कुछ देर बाद प्रतिभा वापस  घर आ गयी। रात हुई तो न जाने क्यों प्रतिभा की आँखें सजल हो उठीं। आँखें मुलकाते हुए  उसनें माँ से पूछा- ’’माँ गुड्डा मुझे अपने घर क्यो नहीं ले गया?‘‘ माँ ने कहा- ’’कुछ दिनों बाद वह अपनी दुलहन की विदाई करा, उसे घर ले जाएगा।‘‘

उस दिन के बाद से प्रतिभा ने गुड्डे-गुडि़यों का खेल छोड़ दिया। वह अब गम्भीर, एकान्तप्रिय और लज्जाशील हो गयी। समय बीता, प्रतिभा के बचपन का अल्हड़पन, तरुणायी के आलस्य में परिवर्तित हो गया। वह ’गुडि़या‘ अपने ’गुड्डे‘ के सपने देखती पर उसका कहीं पता न था।




    माँ ने उसे समझाया था कि सिन्दूर बाल के नीचे छिपा लिया करे और किसी से कभी ये न बताये कि उसका विवाह हो गया है। अतः जब से होश सम्भाला था, प्रतिभा ये राज़ भी छुपाये हुए थी।

    अचानक प्रतिभा को लगा कि उसे कोई झकझोर रहा है। उसकी सहेली ने उसेपुनः वर्तमान में ला दिया था। बरात आयी, उर्मिला का विवाह हुआ।


    सवेरा हुआ, सूर्य की पहली किरणें धरती का स्पर्श कर रहीं थीं। उस बेला पर उर्मिला की माँग में एक मोटी, गाढ़ी रेखा थी। ऐसा लग रहा था मानो उसके माथे पर सुन्दर सूर्य उदित हुआ हो। रस्म के अनुसार कुछ सुहागिनों ने उर्मिला के गाढ़े सिन्दूर को और गाढ़ा किया। अब उर्मिला के साथ सात सुहागिनों को खाना था। अनायास ही प्रतिभा पाँत में बैठने को उद्यत हुई। रूपा की सास ने कहा- ’’वहाँ नहीं प्रतिभा, वह जगह सुहागिनों की है।‘‘ प्रतिभा चल पड़ी। उसे अपनी इस विडम्बना का ज्ञान हो गया था कि न तो वह कुमारी है और न ही ब्याहता . . . . ।


(सम्प्रति इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बी॰टेक॰(प्रथम वर्ष) की छात्रा। हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषाओं समान रूप से लेखन। विश्वविद्यालय स्तर पर निबन्ध-लेखन हेतु पुरस्कृत।)

टिप्पणियाँ

  1. Bahut achi kahani he. Bilkul yatharth jeevan jise. Badhi Bhavini ko.Manisha jain

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    1. Manisha ji...thanks a lot...
      Bhawini Tripathi

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    2. Ytharthvadi soch jhalkti hai bhawini apki kahani me .gambhir chintan ke liye aapko badhai.
      aisi hi samajik chintanparak kahaniyo ki aapse aasha karta hu.

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  2. aapki kahani ek sach ko bayan karti hai. aapko bhut badhai

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  3. Yatharthvadi kahani hai. aasha hai jald hi nari vimarsh par aap aur bhi kuchh likhengi.

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  4. Raveendra Nath Mishra 'Balidani'26 मार्च 2014 को 9:55 pm

    'VIDAMBANA' ek vicharottejak laghu katha hai, jiski vishayvastu kvari hai.lekhika ko mera hardik sadhuvad.

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  5. Raveendra Nath Mishra 'Balidani'26 मार्च 2014 को 10:09 pm

    'VIDAMBANA' ek vicharottejak laghu katha hai, jiski vishayvastu kvari hai. lekhika ko mera hardik sadhuvad.

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  6. Raveendra Nath Mishra 'Balidani'26 मार्च 2014 को 10:13 pm

    'VIDAMBANA' ek vicharottejak laghu katha hai, jiski vishayvastu kvari hai. lekhika ko mera hardik sadhuvad.

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  7. Yatharthvadi laghukatha hai. aasha hai nari vimarsh par aage bhi likhti rahegi.

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. After reading this poignant story, I feels very bad for "Pratibha" and her paralells. This story raised a scarcely touched issue, which is somehow supressed by us at an extent.
    Keep raising these thinly issues.
    My best wishes are with you always.
    God bless you.

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  10. अच्छी और संवेदनशील कहानी | कथाकार में काफी संभावना दिखती है | इसकी भाषा और शिल्प तो अच्छी है ही, कथ्य के स्तर पर भी यह उम्दा बन पड़ी है | आपको बधाई |

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  11. अच्छी कहानी है . बधाई .
    नित्यानंद गायेन

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  12. "Vidambana" ek vicharottejak laghu katha hai, jiski vishay vastu sarvatha kvari hai. Lekihka ko mera hardik sadhuvaad.
    Raveendra Nath Mishra 'Balidani'

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  13. kahani ka kathya, shilpa evam bhasha kafi achchhi hai,.... keep it up.... we need some more kahaniyan...

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  14. good job for story....ye kaisi vidambna hai ... barish me .... chutha kandha ke bare me likha dala ..waiting for next best story................................. DIVYA MISHRA

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  15. u r amazing bhawini...not only is the storyline touching...the way it is written is also truly praiseworthy. keep writing and keep shining.... :)

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