श्रीराम त्रिपाठी का श्रद्धांजलि लेख 'वह ज्योति अचानक सदा को खो गयी'




समय कितनी तेजी से बीत जाता है, इसका हम अंदाजा नहीं लगा सकते। पिछले इक्कीस जून को  मनहूश  खबर मिली थी कि प्रख्यात आलोचक शिव कुमार मिश्र नहीं रहे। हमारे लिए यह खबर बज्रपात की तरह थी। इस दुखद घटना को अब एक वर्ष होने जा रहे हैं इस अवसर पर शिव कुमार जी को नमन करते हुए हम प्रस्तुत कर रहे हैं  श्रीराम त्रिपाठी का श्रद्धांजलि लेख 'वह ज्योति अचानक सदा को खो गयी'   

वह ज्योति अचानक सदा को सो गई

श्रीराम त्रिपाठी


अहिन्दी भाषी प्रदेश गुजरात को अपना कर्मक्षेत्र बनाने वाले हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक शिवकुमार मिश्र जी अब हमारे बीच नहीं रहे। 21 जून 2013 की सुबह उन्होंने इस दुनिया को सदा के लिए अलविदा कह दिया। यह गुजरात के हिन्दी साहित्यिकों और साहित्य प्रेमियों को ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत के हिन्दी साहित्यिकों एवं साहित्य प्रेमियों के लिए अत्यंत दुखद है। उन्होंने उत्तर प्रदेश की माटी को गुजरात की माटी से गुण कर जो वृक्ष उगाया वह पूरे भारत तक विस्तृत हुआ। हिन्दी साहित्य का प्रगतिवाद और उसके तुरंत बाद का दौर अत्यंत उर्वर रहा है। उसने साहित्य की हर विधाओं में महत्तम रचनाकारों को विकसित किया। आज के साहित्य का नेतृत्व करने वाले आलोचक भी उसी दौर के हैं। उन्हीं में शिवकुमार मिश्र जी भी थे, जिनसे युवा सर्जक और आलोचक प्रेरित होते थे। यहाँ जिसे हैहोना चाहिए था, उसे थेलिखना पड़ रहा है। युवा और नई पीढ़ी, दोनों उनसे मार्गदर्शन ग्रहण करते थे। तभी तो उनके चाहक संपूर्ण भारत में मिल जाते हैं। हमारी आलोचना आज भी इन्हीं लोगों पर निर्भर है। युवा पीढ़ी ने अगर स्वावलंबी होने की कोशिश की होती तो एक तो इन बुजुर्गों का बोझ कम हुआ होता, दूसरे आलोचना का विकास अबाध गति से चलता। ऐसे में होता यह कि यह पीढ़ी नई पीढ़ी के काम पर नज़र रखती, उनकी ख़ामियों पर टोकती, और आलोचना के भविष्य के प्रति आश्वस्त होती चैन की नींद सोती। परंतु हमारी पीढ़ी ने ऐसा कुछ किया ही नहीं, जिससे कि उनको चैन मिले। हमारे जैसे सर्जक-आलोचक ख़ुद को किंकर्तव्य विमूढ़ पा रहे हैं। मिश्र जी का जाना होरी जैसा हुआ। अभी तो कह रहे थे कि तीन-चार किताबें लिखनी बाक़ी हैं, फिर जाना होगा। घुटने की तकलीफ़ के कारण नहीं कर पा रहा।तीस मई को बिटिया की शादी करके अहमदाबाद लौटा और पहली जून को फ़ोन मिलाया तो माताजी से पता चला कि वे तो दस-पंद्रह दिनों से अस्पताल में भरती हैं। कारण पूछने पर बताया कि साँस की तकलीफ़ थी। आई.सी.यू में हैं। बिटिया की शादी की ख़ुशी तत्क्षण काफ़ूर हो गई और गहरे अवषाद में गर्क हो गया। दूसरे दिन दस बजे उनके घर वल्लभ विद्यानगर पहुँच गया। पता चला कि रात को तबीअत और बिगड़ जाने के कारण अहमदाबाद के किसी अस्पताल में भरती किया गया है। दोनों बेटियाँ साथ में हैं। मगर अस्पताल का पता नहीं मिला, जो माताजी को ख़ुद भी मालूम नहीं था। मिश्र जी का मोबाइल फ़ोन उनकी बड़ी बेटी के पास था, जिनसे उनका हाल जान लिया करता था। अस्पताल का पता गुप्त ही रहा, जिससे वहाँ जाना न हो सका। वैसे भी देखना तो हो नहीं पाता। और नहीं तो तीमारदारी करने वालों की दिक़्क़तें बढ़तीं। कुछ दिनों बाद पता चला कि डॉ. ने उन्हें व्हील चेयर पर बिठा कर घुमाया है। दो दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी। अत्यंत प्रसन्नता हुई। मगर यह ख़ुशी ज़ियादा दिन न टिकी। बताया गया कि कुछ दिन और अस्पताल में ही रहना होगा। बीस जून शाम को फ़ोन किया तो पता चला कि तबीअत बहुत ख़राब हो गई है। कुछ भी कहा नहीं जा सकता। दवाओं का असर नहीं हो रहा। कि इक्कीस जून दस बजे के आस पास मोबाइल की रिंग बजी और स्क्रीन पर डॉ. शिवप्रसाद शुक्ल नाम दिखा तो जी खटक गया। वह जिसे सुनने को तैयार न था वही सुनना पड़ा।      



            यूँ तो मैं मिश्र जी का विधिवत विद्यार्थी नहीं रहा, परंतु उन्होंने हमेशा मुझे सबसे प्रिय विद्यार्थी का ही स्नेह दिया। तभी तो मैं साल में एक-दो बार उनसे मिलने वल्लभ विद्यानगर जरूर जाता था। मेरे जाने पर उनका वह पूरा दिन मेरे हवाले होता था। कुछ नया लिखे होता, तो उसकी चर्चा फ़ोन पर हो चुकने के बावजूद उन्हें पढ़कर सुनाता था। मुक्तिबोध की कविता ब्रह्मराक्षसकी व्याख्या, जो मुझे अत्यंत उत्साहित किये थी, को सुनाने उनके घर जा पहुँचा। आलेख सुनाने से पहले किसी बात पर मेरे मुँह से निकल गया कि आप मुझे ब्रह्मराक्षस लगते हैं। उनका चेहरा देखने ही लायक था। अन्य आलोचकों की तरह वे भी ब्रह्मराक्षस को मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी का प्रतीक ही मानते थे। इस तरह मैं उन्हीं के घर पर उनका अपमान कर रहा था। मैं ताड़ गया और तुरंत स्पष्टता की कि आप तो मूलत: शोधक हैं, परंतु मेरे जैसे लोगों ने आपको ब्रह्मराक्षस समझ लिया। इसमें दोष आपका है, या हमारे जैसे लोगों का? देखिए, उस कविता में कवि उस शोधक का सजल उर शिष्य बनना चाहता है, जिसे तत्कालीन समाज ने ब्रह्मराक्षस कहकर त्याग दिया था। उस शोधक को, जो समाज की ख़ुशहाली की शोध में ख़ुद को कितनी तकलीफ़ में डाले था। यह शोधक की कम और हमारे समाज की विडंबना ज़ियादा है। आख़िर सुकरात, ईसा मसीह, कॉपरनिकस के साथ किया गया तत्कालीन समाज का व्यवहार क्या दर्शाता है? मैंने कहा कि आप ही बतलाइए कि अब आपसे मिलने कितने साहित्यिक (प्रोफ़ेसर) जन आते हैं? अगर शोधक समझते तो ज़रूर आते। मेरे लिए तो आप शोधक हैं, तभी तो अहमदाबाद से मिलने आता हूँ। आपसे मुझे बहुत कुछ सीखना है। परंतु आस-पास के लोगों के लिए आप ब्रह्मराक्षस हैं, तभी तो वे आपसे कन्नी काटते हैं। पूँजीवाद से प्रभावित वे आपको ब्रह्मराक्षस ही समझते हैं,क्योंकि उनकी पूँजीवादिता पर आप न केवल सवाल उठाते रहे होंगे, बल्कि रोकते-टोकते भी रहे होंगे। जो उन्हें नागवार लगता था। सो आपको ही ब्रह्मराक्षस क़रार देकर न केवल त्याग दिया, बल्कि दूसरों को भी आपके निकट आने से रोका। इसके बाद वे तकिये के सहारे लेट गये और लेख पढ़ने को बोले। लेख लम्बा था। आँखें बन्द किये सुनते रहे। लेख की समाप्ति पर आँख खोले और बोले, “त्रिपाठी जी, इस कविता के बारे में मेरे अपने विचार हैं। वे आसानी से नहीं जाएँगे, परंतु इतना तो है कि आपके लेख ने मुझे फिर से सोचने को मजबूर कर दिया है। किसी भी लेखक की यही सफलता है।फिर वे मुक्तिबोध से जुड़े कुछ अपने तथा कुछ दूसरों के संस्मरण सुनाने लगे।



            मिश्र जी हद दरजे के ज़िद्दी थे। ज़िद के बिना कोई न श्रेष्ठ साहित्यकार बन सकता है, न श्रेष्ठ मनुष्य। ज़िद का दूसरा नाम टेक भी है। सिद्धांतवादी ऐसे ही लोग होते हैं। मिश्रजी ने बतलाया था कि उन्होंने कभी किसी सरकार या संस्था से पुरस्कार नहीं लिया। केवल आचार्य रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार लिया था। शाल, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिह्न को ही स्वीकार किया और पुरस्कार राशि उसी संस्था को दान कर दिया। मिश्र जी को पेंशन बहुत कम मिलती थी। गुजरात सरकार ने सागर विश्वविद्यालय की उनकी सर्विस को गिनने से इनकार कर दिया था। वे कम पेंशन पाने का ज़िक्र अकसर किया करते थे, जिसमें अर्थ के प्रति रोना न होकर अन्याय के प्रति टीस हुआ करती थी। एक बार उन्होंने बतलाया था कि गुजरात के राज्यपाल उदयप्रकाश के रिश्तेदार हैं। उनसे भी कहलवाया था। परंतु कुछ नहीं हुआ। दो-तीन साल पहले गुजरात हिन्दी अकादमी ने हिन्दी साहित्य में विशिष्ट योगदान के लिए स्वर्गीय प्रोफ़ेसर भोलाभाई पटेल, प्रोफ़ेसर रघुवीर चौधरी और मिश्र जी को एक-एक लाख रुपए से पुरस्कृत करने का निर्णय लिया था। मिश्र जी से जब संस्तुति माँगी गई तो उन्होंने यह कह कर पुरस्कार लेने से मना कर दिया कि मैंने आज तक कोई पुरस्कार स्वीकार नहीं किया, इसलिए इस पुरस्कार को स्वीकार करने में खुद को असमर्थ पा रहा हूँ।



            मिश्र जी का ज़ियादा समय तो गुजरात से बाहर ही बीतता था। घर में अकेली माता जी ही रहती थीं। हड्डी की ठठरी, परंतु ऊष्मा और स्नेह से भरपूर। मैं उन्हें माता जी ही कहता हूँ। मेरी कॉलेज में आयोजित सेमिनार के सिलसिले में मिश्रजी का संतरामपुर (मेरा कर्मस्थल) आना हुआ। सेमिनार पहली-दूसरी जनवरी को था। वे इकत्तीस दिसम्बर की शाम को ही आ गये और मेरे घर पर ही ठहरे। रात के बारह बजते ही बोले कि त्रिपाठी जी, ज़रा घर पर फ़ोन लगाइए। मैंने फ़ोन लगाया, तो वे माताजी को नये वर्ष की शुभकामनाएँ दे रहे थे। दोनों लोग तकरीबन पाँच मिनट बतियाये, फिर बोले कि लो त्रिपाठी जी को भी नये वर्ष की शुकामनाएँ दे दो। उस सेमिनार में कमलाप्रसाद जी भी आये थे। लम्बे समय बाद दोनों बुजुर्ग मिले थे। इस समय मुझे उनके कोई संवाद याद नहीं आ रहे। केवल वह ऊष्मिल स्नेहिल चित्र मुझे भावविभोर कर रहा है। दोनों आज हमारे बीच न होते हुए भी हमारे भीतर हैं। जैसा कि तेइस तारीख़ को मिलने पर माता जी ने कहा कि त्रिपाठीजी, सर कहीं नहीं गए। हमारे आपके भीतर ज़िन्दा हैं। आप आते रहना मैं यहीं मिलूँगी। कहीं नहीं जाऊँगी।...



            मिश्र जी दाय के रूप में जो छोड़ गये हैं, उसे हमें ही सँवारना और विकसित करना है। आलोचक का एक काम रचनाओं की संभावनाओं की तलाश करना भी होता है। हमें मिश्र जी की रचनाओं की संभावनाओं की तलाश करते हुए उन्हें सुधारना, विकसित करना भी है। शायद सार्थक श्रद्धांजलि यही होगी। वैसे मिश्र जी ऐसी ही श्रद्धांजलि के क़ायल थे। वे कहा करते थे कि किसी भी रचनाकार की ख़ामी-ख़ूबी, दोनों को उजागर किया जाना चाहिए, न कि पूजा की जानी चाहिए। रचनाकार भी तो आख़िर में मनुष्य ही होता है।

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(समयांतर में प्रकाशित)

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