विजेंद्र के संग्रह "आधी रात के रंग" पर शाहनाज़ इमरानी की समीक्षा



कवि  या कलाकार होने की पहली ही शर्त है  अपनी जमीन और अपने लोक से जुड़ाव। विजेन्द्र जी ऐसे कवि हैं जो आज भी अपने जमीन और लोक से पूरी तरह जुड़े हुए हैं। उनकी कविता हो या उनके चित्र इस बात की स्पष्ट रूप से ताकीद करते हैं'आधी रात के रंग' उनकी एक अलग तरह की किताब है जिसमें हर पेंटिंग के साथ उसे जुडी हुई एक कविता लिखी गयी है। इस अनूठे प्रयोग का व्यापक स्तर पर स्वागत किया गया। किताब का शीर्षक ही अपने आप में बहुत कुछ बयाँ कर देता है। हमें यहाँ कबीर की याद आ रही है जो कहते हैं - 'सुखिया सब संसार है खावै और सोवै। दुखिया दास कबीर है जागे और रोवै।' यहाँ भी आधी रात का वक्त है। एक ऐसा समय जिसमें प्रायः लोग गहरी नींद के आगोश में होते हैं। लेकिन कवि की आँखों में नींद कहाँ, चैन कहाँ। दुःख, उदासी, गरीबी के जीवंत चित्र उसे परेशान किये रहते हैं वह आधी रात के रंग निहारने लगता है जिसमें उसे वे तमाम चेहरे और चित्र दिखाई पड़ते हैं जिसे उसने देखा और महसूस किया होता है। उसका मन भर आता है और कवि तत्क्षण इस आधी रात के रंग को अपनी कविता और पेंटिंग में गहरे तौर पर रेखांकित करता है। यह कवि उस समय भी जागता दिखाई पड़ता है जिस समय अधिकाँश लोग सोये होते हैं। इसलिए तो यह कवि औरों से बिल्कुल अलग रूप-रंग और बनक वाला है, प्रतिबद्धता  ही इस कवि की अपनी थाती है। 

अपनी तरह के अनूठे इस 'आधी रात के रंग' संग्रह पर पहली बार के लिए एक आलेख लिख भेजा  है युवा कवियित्री शाहनाज इमरानी ने तो आइए पढ़ते हैं यह आलेख               

"आधी रात के रंग" 

शाहनाज़ इमरानी 

आज के वक़्त में एक अलग आवाज़ की रंगत है "आधी रात के रंग" चित्रों पर रची गई कविताएं और कवि के द्वारा इसका अंग्रेजी अनुवाद अपने आप में एक अनोखा संग्रह है। 
विजेंद्र कविताओं, नाटकों, डायरियों, चित्रों के साथ-साथ "कृति ओर" पत्रिका के प्रधान सम्पादक भी हैं। बहुआयामी लेखन के साथ वे नये कवियों और लेखकों को मार्गदर्शन देते रहते हैं। 

लोकधर्मी कविता के धनी विजेंद्र ने "मुक्त छंद" में कविता लिखी। छंद में लय क़ायम रखना आसान काम नहीं है लकिन विजेंद्र इस में कामियाब हैं। 

कविता बदलाव ला सकती है संवेदना, समझ और सहानुभूति में किसी हद तक। कविता उन जगहों पर ले जाती हैं, जहाँ हम पहले कभी नहीं गए होते। विजेंद की कविता का सम्बंध देश की मिट्टी से है उनकी कविताओं में गाँव की धड़कन है किसानों और श्रमिकों की ज़िन्दगी का संघर्ष उनकी कविताओं में नज़र आता है। उनका रहन-सहन, वेषभूषा, उत्सवों, खेती-बाड़ी आदि उनकी कविताओं से जुड़ी है। विजेंद्र का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के एक गाँव धरमपुर के एक सामंत परिवार  में हुआ। आम, जामुन, अमरुद, कटहल, नीबू, के बाग़-बगीचे बैलघोड़े और शिकार पिता अपने शौकों में ढालना चाहते थे। शिक्षा की  शुरूआत घर में हुई एक मौलवी सहाब ने उर्दू की तालीम दी। माँ ने पिता से लड़-झगड़ कर अंग्रेजी स्कूल में उझियानी भिजवा दिया। अब विजेंद्र का मन पढ़ने में लगने लगा। आगे कि पढ़ाई के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय पहुंचे। कविता की फ़िज़ा में कवि केदारनाथ सिंह जैसे सहपाठी थे और कवि नामवर सिंह ने पढ़ाया साथ ही कवि त्रिलोचन काव्य गुरू थे। कवि त्रिलोचन से उन्होंने बहुत कुछ जाना और सीखा एक ऐसा ज्ञान जो किताबों से नहीं मिल सकता था। 

चीज़ों और इंसानो की दुनियाँ में अकेलापन सब कुछ को नामहीन करते और बहुत कुछ छोड़ देने के बाद कवि विजेंद्र  आज भी कविता को अपने साथ जिन्दा रखे हुए हैं। आज भी उनके मन में एक बैचेनी है कि जितना करना चाहिए था उतना नहीं कर पाया हूँ। विजेंद्र को भव्यता पसंद नहीं है एक बेहतर इंसान जो अपने नैतिक मूल्यों के साथ कविता के रूप में साधना जारी रखे हुए हैं। उनके मिज़ाज के अनुरूप उनकी कविताओं में कोई उत्तेजित अभिवयक्ति नहीं मिलती। विजेंद्र की कविता गरिमापूर्ण है एक तरह कि छांदिकता उनके व्यक्तित्व की गरिमा के सरोकार के अनुकूल ही है। विजेंद्र को अपने कलाकार होने का एहसास है और वो एक ख़ास आवाज़ उनकी कविताओं में मिलती है। 
कवि विजेंद्र की कविताओं का संग्रह "आधी रात के रंग" पढ़ कर और खूबसूरत चित्रों  को देख कर कुछ ऐसा ही एहसास हुआ। अपनी रचनात्मकता दुनियां में कवि ने ज़िन्दगी के रंग, फ़ितरतज्ज़बात, चीज़ों, रिश्तों, लोगों आदि को मिला कर बनाई गई ज़मीन पर चित्र से कविता का चेहरा बनाया हैं। आपा-धापी के इस वक़्त में वक़्त ही कविता है जो इतिहास बोती है और इस समय में जब  इंसान को कई तरह से छला जा रहा है कविता आज भी उनके साथ है। कवि विजेंद ने अपने लम्बे काव्य जीवन में बहुत कुछ लिखा है और खुद को बहुत सी मुश्किलों के बाद भी लगातार कविता से जोड़े रखा है।

 "आधी रात के रंग" (The midnight colors) हिंदी और अंग्रेजी दोनों ज़ुबानों में ऐतिहासिक और अपने आप में एक बेमिसाल पेशकश है। 

विजेंद्र की कविताओं में आम आदमी का अक्स नज़र आता है। हमारे प्राचीन काव्य शास्त्रों मे कहा गया है कि प्रतिभाहीन कवि को सामने वाली चीज़ भी दिखाई नहीं देती और 
प्रतिभाशाली कवि को न दिखने वाली चीज़ भी दिखती है और इस को कवि की 'तीसरी आँख' कहते है। कवि विजेंद्र मामूली से मामूली चीज़ों मे सौंदर्य देखते हैं। विजेंद्र ने प्राकृतिक सौंदर्य और समाज में सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक विषमता के कारण सर्वहारा वर्ग की तकलीफों को ख़ास तौर पर अपनी कविताओं में जगह दी है। कविता में जब जीवन की अभिव्यक्ति होती है तो प्रकृति अपनी जगह बना लेती है प्रकृति और मैंशिखर की ओर, अँधेरे से उजाले में,  अंकुरण कवितायेँ प्रकृति से जोड़ती हैं। विजेंद्र की कविताओं की ख़ास बात इनकी विविधता है इन कवितों में विजेंद्र के जीवन के तजुर्बों को देखा जा सकता है।

विजेंद्र कवि के लिबास में एक चित्रकार हैं जो अपने विचारों, सरोकारों, और चिंताओं का दायरा बड़ा करते हुए कविताएँ लिखता है। चित्रात्मक कविताओं को देखा जाए तो यह बात साफ़ हो जाती है। कवि ने अपनी बात कहने के लिए एक दृश्य बुना है जो उनकी रचनात्मकता का एहम पहलू है। कविता और चित्र कला की खूबी है कि उसके बारे में कोई अंतिम बात कह देना मुश्किल होता है । अच्छी कविता और चित्र कला यदि एक बार में ही समझ ली जाती तो वे "use and throw" जैसी वस्तुएं हो जाती हैं। 

कविता लिखने या चित्र बनाने का कोई तयशुदा वक़्त नहीं होता। जैसे परिंदे और इंसान एक ढर्रे से काम करते हैं। परिंदे सुबह  जागते हैं। शाम को अपने घोंसलों में आ जाते हैं। इंसान भी अपना काम एक ढर्रे पर करता रहता है। इसीलिए उन्होंने कहा है, "मेरे लिए कविता रचने का / कोई खास क्षण नही।" कवि और चित्रकार दौनों ही काल और समाज निरपेक्ष नही होते। अत: कल के अनुसार दौनों को ही अपने उपकरण बदलने होते हैं। कवि अपने कथ्य और मुहावरा बदलता है। काव्य रूपों में परिवर्तन करता हे। छंद में परिवर्तन करता है। चित्रकार अपने चित्रांकन के ढंग और शैली में परिवर्तन करता है। रंग संयोजन, स्ट्रोक्स, बुनावट, अपनी टोन्स में तबदीली करता है। 



पहले चित्र पर "कवि" कविता में कवि और चित्रकार दौनों की रचना प्रक्रिया के संकेत हैं। 

पहली कविता "कवि में कहा है - "समय ही ऐसा है /कि मैं जीवन की लय बदलूँ / छंद और रूपक भी"। कवि हो या चित्रकार दोनों ही अपने समाज से संवाद करते हैं। जब कोई रचना लिखी जाती है रचनकर के सबसे खास और आत्मीय क्षण होते है। दोनों ही अपने मन को पूरी तरह व्यक्त करने के लिए आत्मा की परतें खोलते है। यानि समाज से कुछ छुपाते नही। कविता हो या चित्र दोनों ही एक मुक्त संवाद हैं। कहा है - "एक मुक्त   संवाद/ आत्मीय क्षणों में  कविता ही है/ जहां मैं तुमसे कुछ छिपाऊँ नही। इस कविता में कुछ बातें ऐसी है जिन के ऊपर ध्यान जाना जरूरी है। कवि की मंशा क्या है? वो कविता से क्या कहना चाहता है? कला साधना कैसे होइसी कविता में कहा है - सुंदर चीजों को अमरता प्राप्त हो /यही मेरी  कामना है /मनुष्य अपने उच्च लक्ष्य की और प्रेरित हो। कवि कर्म हर समय त्याग की मांग करता है। बिना उसके हम बड़े लक्ष्य को नही पा सकते। कवि जानता है कि कविता रचना तो आसान हो सकता है। पर उसे जीवित रखना बहुत कठिन है। उसके लिए कवि "जीवन तप" की मांग करता है। आखिर एक कवि को चित्र कला की ओर क्यों आना पड़ा? कवि ने कहा है कि जो कुछ कविता में व्यक्त नही कर पाया उसे रंग, बुनावट, रेखाओं, और दृश्य बिंबों में रचने की कोशिश की है। कवि का संकेत है कि कवि हो या चित्रकार धरती से जुड़ाव पहली शर्त है। वही उसके खनिज दल का स्रोत है। यह वरदान उसे प्रकृति से प्राप्त हुआ है । कवि अपने रचना कर्म से जीवन और प्रकृति का इस प्रकार रूपान्तरण करना चाहता है जिससे वो निराश और थके मांदे लोगो को नई उम्मीद दे सके। वे जीवन को सुंदर और जीने योग्य समझें। अंत में यह भी कहा है कि स्वत: स्फूर्त मन से उमड़े भाव हमारी आत्मा का वैभव व्यक्त करते है - हृदय से उमड़े शब्द/ आत्मा का उजास कहते हैं। "इस कविता और चित्र को बिना समझे हम कवि और चित्रकार के मन को नही समझ पाएंगे।


                                "आधी रात के रंग" में रंगों की खुद मुख्तारी (स्वतंत्रता) है हर चित्र में उनका यह प्राकृतिक गुण है। आज़ाद होकर भी वे एक दूसरे से जुड़े है। यानि एक रंग दूसरे से निरपेक्ष होकर अपना अर्थ और लय खोने लगते है। अत: किसी भी चित्र में रंगों की आज़ादी और उनका एक दूसरे से जुड़ाव ही उन्हें अर्थवान बनाता है। यहाँ रंगो की स्वतन्त्रता को भी कविता इसलिए कहा है क्यों कि रंग बिंबों की तरह ही अनेक भाव मन में जागते है। उनमे संगीत के स्वर तथा उनमे छूपी लय भी सुनाई पढ़ती है। 
"रंगों की स्वायत्वता" में भी/ कविता है /रंग उन रूपों कि तरह हैं /जो कैनवस को स्पंदित करते है।"  रंगो का महत्व समझने के लिए यह वैज्ञानिक तथ्य जानना जरूरी है कि आकाश में व्याप्त ईथर के कारण ही रंगों में एक तरह का की कंपकंपी होती है। इसी से उनमे प्रभाव पैदा होता है। यह इतनी बारीक है कि आँखों को दिखाई नही देती। रंगों कि विविधता हमारी आँखों को आज़ाद करती है। यानि हम कोई भी रंग चुन सकते है। कवि कि इच्छा है कि रंगों के माध्यम से वो अपने अन्दर के गान का आरोह-अवरोह सुन सके।-

कैनवास पर  बिखर कर ....  ओ रंगो 
दृश्य - क्षितिज रच कर 
मुझे कविता कि ऐसे संगति  दो 
जहां मै अपनी आत्मा का 
आरोह - अवरोह सुन सके ।    

 "रंगों की  स्वायत्तता "autonomy of colors" कविता से लगता है की कवि चित्रों के रंग जैसे रात में देख रहा हो। उनसे बातें  कर रहा हो। कवि-चित्रकार अकेला है। लगता है यह चित्र ही रात में बनाया गया है -

यह आधी रात है 
मै बिलकुल अकेला हूँ
आधीरात के रंग देखने को
वे मेरे साथ संवाद करते है
चुप चाप। 

"आधी रात के रंग" तीसरी कविता है। यह कवि के लिये जैसे खामोश कविता है। यही नही कवि रंगो को इतना आत्मपरक बना चुका है कि वे ज़िंदगी से उत्खनित उसकी आत्मा के बिम्ब दिखाई पड़ते है। इस कविता और चित्र की ख़ास बात है रंगों का मानवीकरण (personification) रंग जैसे उसके लिये किरदार हो गए हैँ। हर रंग की अलग -अलग पहचान है। जैसे सुर्ख रंग की वो चीख सुनता है। भूरे रंग की आहिस्तगी। काले रंग का क्रोध। गुलाबी रंग की खुशी। रंग तो चित्रों में हैं। पर कवि-चित्रकार आधी रात में उन्हें महसूस करता है। सारे रंग मिल कर चित्रकार की ख़ामोशी तोड़ा करते है। यही नही बल्कि वह जैसे रात को संवार रहे हों। पूरी कविता में रात के रंगों का रूपक ही कविता की लय बनता है। चित्र की टोन, उसकी लय, स्ट्रोकस, छाया-प्रकाश तथा रंग संयोजन, रेखाएँ, रंगों की गहराई सभी से आधी रात का अंदाजा  होने लगता है। चित्र में जैसे सन्नाटा भी बुन दिया गया हो। कवि ने कहा भी है -

नीरवता की क्षुब्ध लहरें 
खाली दीवारों से टकराती है 

कवि-चित्रकार को इस लम्हें में साये गहरे और खुरदुरे लगते हैं। लगता है रात के रंग और चित्रों के रंग ज़िन्दगी के आयाम है। यह जड़ नहीं हैं और न ही ठहरे हुए हैं। हमारी तरह ही उनका भी अपना अस्तित्व है । उनकी अपनी बनावट है। यानि यहाँ जीवनचित्र और कविता तीनों के जुड़ाव की आवाज़ है। 


"शिखर की ओर" कविता और चित्र आदमी के उस एहसास को बयां करते हैं। जिस से वो अपनी मुश्किल परिस्थितयों में संघर्ष करता है। उन्हें अपने समय के अनुरूप बनाने के लिये अपनी क्षमताओं को काम में लेता है। यह काम जोखिम भरा है। चित्र और कविता की आवाज़ है  कि हर जागे हुए आदमी को अपने लक्ष्य निर्धारित करने होते है। फिर उन्हें पाने को अमल में लाना होता है। यह काम ज़िंदगी में चट्टान पर चढ़ने जैसा ही है। जो सत्ता में एकाधिकारवादी है वो किसी आम आदमी को अपनी बराबरी करने से रोकते है। यहीं से वर्ग संघर्ष का जन्म होता है। आदमी की आदत है आगे बढ़ना। पर कोई भी उपलब्धि बिना संघर्ष के मुमकिन नही है। इस कविता के अर्थ का दूसरा स्तर भी है। जब आदमी अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आगे बढ़ता  है तो उसी के दिल में बनी इंसानी हदें उसका विरोध करने लगती है। 

जब भी मै ने देखा
शिखर की ओर
तुमने त्यौरियां बदली 
जब मै चढ़ा
तुम ने चट्टानों के खण्ड
मेरी तरफ धकेले। 

कविता और चित्र यह भी इशारा करते है कि इस संघर्ष में हार भी होती है। कई बार अपनी रणनीति बदलने के लिए पीछे भी हटना पड़ सकता है। पर मक़सद को हासिल करने के लिए संघर्ष जारी रहता है। ऐसे वक़्त में हर पल अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ सकता है। आदमी के पास पक्षियों की तरह डैने नही जो आसमान में उड़ सके। कुछ वक़्त के लिये वो अपनी सृजनशील कल्पना के सहारे इस दुनियाँ से निजात पा भी ले। पर वापसी उसकी इसी सख़्त ज़मीन पर ही होती है -

मेरे पंख कहाँ 
जो आकाश में उड़ूँ 
ऊबड़-खाबड़ 
पृथ्वी पर चल कर ही 
चढ़ूँगा पहाड़ और मंगरियां। 

जो इंसान की कामियाबी में रोड़े अटकाता है उसे कवि- चित्रकार ने दैत्य की संज्ञा दी है। उसका स्वभाव है इंसानी सफ़र के रास्ते में रूकावटें पैदा करना। 

ओ दैत्य
हर बार तू 
मुझे धकेलेगा नीचे। 

पर न तो इन रूकावटों से ज़िन्दगी का संघर्ष रुकता है। और न मक़सद हासिल करने कि कोशिश में कमी आती है। मक़सद हासिल करने की कोशिश। ज़िन्दगी इस संघर्ष का ही दूसरा नाम है -

जीवन ही है सतत चढ़ना
और मेरे जीवन में 
कभी नही हो सकती 
अंतिम चढ़ाई। 

इस तरह कविता और चित्र इंसान के उस बड़े एहसास को व्यक्त करते है जिस से वो अपने मक़्सद हासिल करने के लिए अटूट संघर्ष करता है। इशारा यह भी है कि मक़सद हासिल न हो मगर जिन्दगी में उस पाने के लिए संघर्ष बना रहना चाहिए। 


अगली कविता और चित्र है, "अंधेरे से उजाले में"। चित्र में पुरुष और स्त्री की धुँधली आकृतियाँ दिखती है। यह भी की दोनों अंधेरे में हैं। तैज़ हवा ने उनकी झौंपड़ी अस्त-व्यस्त कर दी है। चित्र से लगता है गरीब लोग है। दोनों सोचते है कि ऐसे अंधेरी तूफानी रात में आखिर कहाँ जा सकते है! उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नही जिस से अपने छप्पर और दरकी दीवारों को दुरुस्त कर सकें। आखिर अब उनके पास ऐसे मुश्किल में विकल्प क्या है। कविता इशारा देती है ऐसे वक्त में हिम्मत से कम लें। सब्र करें । कवि संकेत देता है -

भोर की रश्मियां
अंधेरे के मर्म को
भेद रही है 
घबराओ मत
दृढ़ होकर प्रकाश की तरफ 
बढ़ चलो। 

कवि को उम्मीद है कि वक़्त कभी एक जैसा नही रहता। रात के बाद सुबह तो होगा ही । 

हम भरी मन से 
प्रभात का स्वागत करें 
इस उम्मीद में
कि धूप खिलेगी।

कविता और चित्र तूफानी वातावरण को संकेत से बताते हैं कि कितनी भी कठिन परिस्थिति हो हम साहस न छोड़ें। वक़्त का इंतज़ार करें। अँधेरे से रोशनी की तरफ देखें । हताशा न हों बल्कि उम्मीद का सहारा लें। पूरी कविता चित्र की लय और उसमे व्याप्त अंतर्ध्वनि को व्यक्त करती है । 

मिथक का सच:-

मिथक भी एक सृजन क्रिया है। जो काम हम ज़िन्दगी में नहीं कर पाते उसे मिथक द्वारा पूरा करते है। यह एक प्रकार से अपनी कल्पना का वो रूप है जो कविता में असंभव को संभव बनाता है। इस से यथार्थ को अपने अनुसार बदल लेते हैं। मसलन, जब हनुमान को विशाल पर्वत पर संजीवनी बूटी का कोई अता पता नही लगा तो वो पूरा पहाड़ ही उठा कर ले आए। उन्हें सूर्य निकलने से पहले पहुँचना था। सूर्य जब उदय होने लगा तो सूर्य को मुँह में ही छिपा लिया। यह सब कवि की कल्पना का ही कमाल है। मिथक की रचना के पीछे मनुष्य की अदम्य शक्ति तथा चिरंतन सौंदर्य व्यक्त करने का मनोविज्ञान छुपा है। मिथकीय मनुष्य और स्त्रियाँ बड़े शक्तिशाली और असरदार होते है। पौराणिक गाथाओं में मिथक भरे पड़े है। "रामचरितमानस" का पूरा  काव्य ढांचा मिथक पर ही टिका है। यही वजह है मिथकों के रूप और अर्थ कई जटिल और दोहराये हुए हो जाते है। मिथक हमारे अचेतन में व्याप्त होते है। समाज के दिल में बसे हुए हैं। उन्हें आसानी से भूलाया नही किया जा सकता  -

तुम्हें मै ने ही रचा  है 
वह  सच  जो  आँखों  को 
दिखाई नही देता
जो मेरे ही नही 
मुझ जैसे असंख्य लोगों के मन  में
चित्र की तरह
अंकित  है। 
कवि और चित्रकार भी - मिथक सौंदर्य देखता है -
जब मै तुम्हारे पास आया 
मै ने देखी वहाँ 
चिरंतन सौंदर्य तथा महान क्रियाओं की 
सजीव और जटिल छवियाँ। 


मिथक का अर्थ रूपकीय होता है। यानि जितना ऊपर से दिखता है उस से कहीं अधिक उस के अर्थों में छुपा होता हैं। मिथक कवि चित्रकार को सृजन के लिये प्रेरित भी करते है -
उन्होंने मुझे कविता तथा चित्र के लिए प्रेरित किया
 
जो तुम दिखती हो ऊपर से 
जैसे पृथ्वी का धरातल 
उतना भर सच 
बहुत उथला है 
जब तक  मै 
यह न जानू
कि पृथ्वी के गर्भ में 
पिघली चट्टानें 
और जल प्रवाहित धाराएँ भी है।

यह चित्र मिथक की आंतरिक जटिलता तथा उसमे निहित अर्थ को व्यक्त करता है। हमें मिथक की रूकीय ध्वनि समझने के लिये अपनी कल्पना को भी काम में लेना पड़ता है। दूसरे मिथक बुद्धि के तर्क से नही समझे जा सकते। उसके लिये हमें काव्य तर्क का ही सहारा लेना होगा। मिथक सदियों से मन में छिपे है। ज्यों ज्यों विज्ञान का विकास होगा - मनुष्य के मन में वैज्ञानिक सच जड़ें पकड़ेंगी। मिथक अपना प्रभाव खोते जाएंगे। पर उनका ऐतिहासिक महत्व कभी काम नही होगा। उनसे हम आदमी और उसके वक़्त के बारीक रेशों को समझने में दिलचस्पी लेते रहेंगे।  

"यक्ष" भी एक मिथक है। इसे लोक देवता कहा गया है। कवि विजेंद्र ने भरतपुर के एक बहुत छोटे गाँव नोह में यक्ष की एक खंडित मूर्ति देखी। उसे गाँवके एक सिरे पर गंदगी में एक टूटी फूटी मठिया में रखा गया था। उसे सिंदूर से पोत दिया था। गाँव के लोग उस पर दूध चढ़ाते थे। अपनी अच्छी फसल के लिए उस से दुआ मांगते थे। उसे माथा टेकते है। पर उसकी देह पर जमी धूल की परतों की उन्हें चिंता नहीं है। जब नई फसल उठ के आती है तो नया अनाज भी अर्पित करते है। उन्हें विश्वास है की लोक देवता की कृपा से अच्छी फ़सल होगी -

, यक्ष 
ओ लोक देवता 
तुम्हें अलग थलग  गाँव के कींच - कांद  भरे 
उपेक्षित कोने में 
प्रतिष्ठित किया गया है 
भोर में 
वे  तुम्हारे ऊपर दूध चढ़ाते है। 
उन्हें इसकी चिंता नही 
की तुम्हारी हृष्ट पुष्ट देह पर 
धूल की मोटी परत जमी है 

कवि - चित्रकार जब यक्ष के चेहरे पर  क्षति चिन्ह देखता है तो दुखी होता है -

मै ने तुम्हारी देह 
सिंदूर से पुती देखी 
मै भोचक्का रहा
ओह मै दुखी हूँ 
तुम्हारे हँसते चेहरे पर 
क्षति चिन्ह देख कर। 

पूरी कविता यक्ष की खंडित प्रतिमा को बताते हुये चित्र की छबियाँ उकेरती है। गाँव वालों का लोक देवता में यकीन एक प्रकार से अंधविश्वास ही कहा जाएगा। दूसरे वे उस से दुआ तो मांगते है। पर उसकी प्रतिमा पर जमी धूल की चिंता नही करते। कविता और चित्र दोनों में एक व्यंग्य भी है। 

"अर्धनारीश्वर" को भारत में शिव और पार्वती की मिथ से जोड़कर देखा जाता है। चित्र में शिव और पार्वती को एकाकार दिखाया गया है। यह संकेत है कि पत्नी पुरुष का जिस तरह अर्ध भाग है ठीक उसी तरह पुरुष स्त्री का। दोनों को समान स्तर पर समझने का संकेत है। दूसरी बात एक के बिना दूसरे का जीवन अधूरा है। शिव को विश्व मूर्ति भी कहते है। शिव ही अकेले देवता है जिन्होंने अपने को स्त्री-पुरुष में विभक्त किया है। इस से स्त्री पुरुष के बीच सहज आकर्षण का संकेत भी है। इस से ही सृजन होता है। अर्धनारीश्वर स्त्री और पुरुष के बीच सनातन प्रेम का भी संकेत देता है। इस कविता में चित्र को भी एक रूपक की तरह ही व्यक्त किया गया है। 

"नागफनी" चित्र भी प्रतीक के रूप में है। नागफनी ज़िन्दगी की उस जिन्दा ताक़त का प्रतीक है जो सारी तकलीफ़ों और मुश्किलों को झेल कर अपने को बनाए रखता है। दूसरे, नागफनी कुलीन सौंदर्यबोध को तोड़ता है। नागफनी को गुलाब पसंद करने वाले कुलीन जन पसंद नही करते। यदि करते भी है तो अपनी आधुनिकता दिखाने को। नागफनी कहती है व्यंग्य से -

ओ मेरी करम रेख 
प्रकृति ने मुझे 
कैसा जड़ प्रतीक बना दिया है 
जबकि मै इस पथरीले उजाड़ में
एक जीवंत पौधा हूँ। 

"वसंत " चित्र और कविता हमें फिर एक अंतर्विरोधी दुनिया में ले जाता है। अक्सर वसंत को हम रूमानी और सौंदर्य भाव से जोड़ कर देखते है। पर वसंत अपने तारीफ़ करने वालों से कहता है -

तुम मुझे  
मेरी  आँखों से भी देखो 
- - -
जैसा तुम सोचते हो 
वैसा सब कुछ पुष्पमय नही है
न दीप्तिमान। 

वसंत कहता है कि उसके चेहरे पर स्याह और डरावने धब्बे है। तेज धूप में उसकी भौंहें जल गई है। त्वचा पर झुर्रियां हैं। वो कहता है कि इन्हें भी देखो। वसंत आगाह भी करता है -

तुम्हारे ड्राइंग रूम में 
फूलदान भरे है
पर मै हृदय से उदास हूँ 
मुझे अपने ही आगे 
काला क्षितिज दिखाई देता है। 

वसंत के पास गाने को कोई रूमानी गीत नही है। उपजाऊ ज़मीन पर गहरे लाल धब्बे दिखाई देते है -

मेरे पास गाने को कोई गीत नही है 
पर अशुभ समय को 
कहने के लिए त्रासदी का सच है। 

पूरी कविता चित्र की खुरदरी लय और आवाज़ को व्यक्त करती है। यहाँ कुलीन सौन्दर्यबोध पर गहरा व्यंग्य है।


"गायक" चित्र में सांकेतिक अमूर्तन है। वैसे ही जैसे इस किताब के अन्य चित्रों में। इन चित्रों का अमूर्तन हमे चमत्कृत न कर सोचने को मजबूर करता है। अमूर्तन का अर्थ चित्र काला में शायद है भी यही। आज फोटोग्राफी बहुत  विकसित हो गई है। उसने चित्रकला के सामने नई चुनौती खड़ी की है। अगर कैमरे के चित्रों से हम अपने चित्रों को आगे नही ले जा पाते तो यह चित्रकार की सीमा निर्धारित हो जाती है। चित्र से लगता है कि गायक बूढ़ा है। उसका सितार भी पुराना है। कवि रात में अपने दर्द को झेल रहा है। गायक पूरे जोश में गा रहा है। इस से कवि की नींद टूटती है। उसे गायन राहत नहीं देता। बल्कि उसके अकेलेपन को और बढ़ा देता है। वो गायक को संकेत से बताता है की गायन ऐसा हो की जिस में आम लोगों के दुख और तकलीफों का भी इज़हार हो सकें -

तुम वे गीत भी गाओ
जो मनुष्य की यंत्रणा भी बताते है। 

"शिल्पी" चित्र  में भी सांकेतिक अमूर्तन है। कवि-चित्रकार अपने शब्द और रंगों को छोड़ कर मूर्ति शिल्पकार का पास आया है। चित्रकार इंसान की जिन नसों, मांसपेशी, वक्रताओं को रंगों और शब्दों में नही दिखा पाया उन्हें मूर्ति शिल्पी ने छेनी और हथोड़ी से व्यक्त कर दिया है। लगता है कवि-चित्रकार विनम्रता वश अपनी कलाओं की हद स्वीकारता है। शिल्पी के कला माध्यम बड़े स्थूल है। कवि और चित्रकार के कला माध्यमों से। फिर भी वो मनवायी सौंदर्य को ऊबड़-खाबड़ पत्थरों में  कुशलता से तराश देता है। यही नही वो गंदी और सकरी गलियों में बैठ कर अपनी कला को अंजाम देता है। कवि-चित्रकार ने उसे कठिन स्थितियों में मूर्तियाँ तराशते देखा है-

वो गली  कितनी गंदी और संकरी है
जहां धूप और वर्षा में 
तुम्हें सुंदर मूर्तियाँ गढ़ते 
मै ने देखा है 
तुम्हारे हर तरफ अंधेरा है 
लेकिन तुम ऊबड़-खाबड़ पत्थरों  में
मानवीय  सौंदर्य तराशने
और उकेरने में लगे हो। 

कवि-चित्रकार शिल्पी को याद दिलाता है कि वो देवी देवताओं की मूर्तियो के साथ उन लोगों की भी मूर्तियाँ तराशे जिन्हें कोई नहीं जानता। जो अपनी पहचान बिना ही इस दुनिया से चले गए । 

"चट्टानों में लहरें" कैसा  विरोधाभास है ....चट्टानें और लहरें। यह फिर एक रूपकीय -प्रतीक चित्र है। इसे दो स्तरों पर समझ जा सकता है। एक तो वह चट्टानें जो हमें बाहर दिखती हैं। दूसरे हमारे अंदर की चट्टानें जो आँखों से नही दिखती। कविता में कहा भी है -

धरती की सतह पर फैल कर 
ठंडा होता है लावा 
ग्रेनाइट चट्टानें बनती है 
धरती की अतल गहराइयों में 
जैसे वे मेरे अन्दर भी है शांत 
जिस से मेरी धड़कने टकराती है 
उन्हे कोमल और हरा बनाने को। 

समुंदर की लहरों का चट्टानों से बार बार टकरा कर लौटना। यह प्रक्रिया लगातार और अटूट होती है जिस से अहसास होता है की चट्टानों से ही लहरें पैदा हुई है । चित्र और कविता दोनों को इन दोनों स्तरों पर समझना होगा। तभी रूपकीय प्रतीक खुल पाएगा। 

ओह  - चट्टानों 
तुम अपने मर्म तक पिघलो 
जिस से इस विषाक्त दुनिया को 
सहज बनाया जा सके 
ओ चट्टानों, सुनो
उन लहरों को भी सुनो। 

"चट्टान पुरुष" यह चित्र भी एक प्रतीक के रूप में है। चट्टान पुरुष उस जनशक्ति का प्रतीक है जो आज अर्द्ध सामंती तथा पूंजीवादी क्रूर व्यवस्था के उत्पीड़न तथा शोषण से दबी पड़ी है। सारी व्यवस्था जैसे एक विशाल चट्टान हो। कवि ने उसे दैत्य भी कहा है। जनता इस राक्षस से सदियों से लड़ती रही है। आज भी लड़ रही है। आज उसकी शक्ति में इज़ाफ़ा हुआ है। वो उसे पछाड़ना चाहती है। चित्र में चट्टान पुरुष को राक्षस के पिछले हिस्से को ऊपर खींचते दिखाया है। कवि कहता है कि इस राक्षस को मारने के बाद ही तुम मुक्त हो जाओगे -

इसे मारने के  बाद 
तुम  अपने समय के 
मुक्त नायक बनोगे। 

कवि तब उसी जनशक्ति से प्रेरित होकर कविता रचेगा। पूरी कविता में चट्टान पुरुष को एक रूपक की तरह चित्रित किया गया है।

इसे मारने के  बाद  
तुम अपने समय  के
मुक्त नायक बनोगे 
कवितायें रचने को
मै तुमसे प्रेरणा  लूँगा 
उठाओ , उठाओ -
इस भरी चट्टान को उठाओ। 

"अंकुरण" कविता पर एक चित्र है। अंकुर बीज में छुपी  उस शक्ति का प्रतीक है जो धरती को तोड़ कर गुरुत्वाकर्षण के नियम को भंग करता है। चित्र में बीज के अंकुरित होने से लेकर फल आने तक की प्रक्रिया को बारीकी से दिखाया गया है। बीज के वृक्ष बनने का रिश्ता पृथ्वी की निरंतर गति से भी है। वृक्ष के उगने में ऋतुओं का आना जाना बहुत जरूरी है -

जब तू अपनी धुरी पर घोंटी है
तब बसंत उदित होता है 
प्रतीक्षा करो। 

मै खिलूँगा तुम्हें भविष्य के फल देने के लिए। पूरा चित्र बीज के अंकुरित होने की प्रक्रिया भी बता रहा है। यह भी कि बीज किस तरह हवा और रोशनी पाकर उगता और बड़ा होता है। बीज में दरख़्त होने की ख़्वाहिश छिपी रहती है चित्र में इस तरफ भी इशारा है। किसी भी बड़ी कामियाबी के लिए कोशिश प्रतीक्षा और धीरज की ज़रूरत होती है। 

 
"प्रकृति और मै" इस चित्र और कविता में कवि मनुष्य और प्रकृति के रिश्तों का संकेत देता है। पूँजीवादी व्यवस्था में प्रकृति के साधनों का अधाधूंध इस्तेमाल की वजह से प्रकृति और मनुष्य के बीच एक जैविक खाई Metabolic Rift पैदा हो गई है। हमारी नदियां नालियों में तब्दील होने को है । जंगलों में दरख्तों को काटा जा रहा हैं। पहाड़ डाइनामाइट से उड़ाए जा रहे है । ओज़ोन परत क्षतिग्रस्त हो रही है। इस से बहुत अधिक प्रदूषण पैदा हो रहा है। कवि ने इसे कचरा संस्कृति dustbin culture  का नाम दिया है -

सदानीरा पवित्र नदियों को  
मै ने कीचड़ भरी नालियाँ 
बनाया है। 
- - -
समाज  में 
किस ने मेरे और प्रकृति के बीच
मेटाबोलिक दरार 
बनाई है।  

चित्र रंगों के सम्मिश्रण से प्रदूषण तथा उजड़ती प्रकृति का संकेत देता है। "काल्पनिक  भय" चित्र अपनी शैली, रंग संयोजन में सब से अलग है। काल्पनिक भय एक मानसिक स्थिति है। ऐसे अमूर्त विषय को रंग संयोजन, बारीक रेखांकन तथा हिंसक पशु आकृति से व्यक्त किया गया है। लोगों का कहना है कि काल्पनिक भय वास्तविक भय से अधिक खतरनाक होता है। कवि ने काल्पनिक भय का अनुभव करके ही अपनी कल्पना से उसका रूप निश्चित किया है -


लेकिन चित्र में 
तुम्हारा वही रूप दे पाया हूँ 
जिस से मै 
अपने विषम समय में
बहुत परेशान रहा हूँ। 

काल्पनिक भय का रूप किसी ने देखा नहीं। अत: कल्पना ही की जा सकती है। कल्पना से ऐसा चित्र बनाया है जिसे देख कर हिंसक पशु का ध्यान आने लगता है। काल्पनिक भय की खसलत हिंसक और डरावनी ही होती है। 

"तुम अंधेरे में" कविता और चित्र दोनों नारी संघर्ष की बात कहते है। स्त्रियों पर आज भी अत्याचार होते हैं। चित्र में स्त्री के कई बिम्ब हैं। यह उसकी विभिन्न जीवन दशाओं का संकेत देते हैं। चित्र में श्वेत -श्याम टोन्स स्त्री की मन: स्थितियाँ का संकेत है। चित्र उसकी नग्नता को भी बताता है। संकेत है कि उसके साथ क्रूरता का व्यवहार हुआ है। चित्र में यह भी संकेत है कि वो अमानवीय सामाजिक नियमों को तोड़ना चाहती है । दिशाहीन होने की वजह से तोड़ नही पाती। चित्र में संकेत है कि वो संघर्षशील हो कर भी विवश है। कविता इन्ही बातों को बिम्बों के माध्यम से कहती है -

अँधेरा सघन है 
और हवा तैज़ 
जबकि तुम -
धारा के विरुद्ध जाना चाहती हो। 

"प्रतीक्षा"  चित्र एक ऐसी स्त्री का चित्र है जो बोझ लिए किसी की प्रतीक्षा कर रही है। चित्रकार-कवि उसके सौंदर्य को देखता है। स्त्री उसकी तरफ न देख कर भी आकर्षित होती है

जैसे एक मूक संवाद चल रहा है। कवि-चित्रकार उसके सौंदर्य तथा मन की गहराई नापने की कोशिश करता सा लगता है। स्त्री अकेली है। उसके मन में रूमानियत का कोई भाव है ही नहीं। पर चित्रकार इक तरफा ऐसा सोचता रहता है। कई बार ऐसा होता है कि हम किसी से बहुत प्रभावित होते है। जिस से प्रभावित होते है वो भले ही उस बात को न जाने। उसका वजूद हमारे दिल में उतर  जाता है -

उसका बिना नाम जाने 
मै ने उसे 
अपने चित्त पर उकेर दिया। 

"क्रौंच मिथुन" एक मिथकीय चित्र है। कहा जाता है कि जब शिकारी ने क्रौंच के जोड़े में से नर को मार दिया। तो आदि कवि वाल्मीकि ने क्रुद्ध हो कर उसे शाप दिया। क्रौंच मिथुन उस समय रति क्रीडा में मग्न था। चित्र उसी अवस्था का संकेत देता है। यह एक सृजन क्षण भी है। चित्र में अंडे भी दिखाये है। जो नव जीवन का संकेत हैं। चित्र में जो बिखरापन दिखता हैअँग्रेजी में इसे  ecstasy कहते है।

औ क्रौंच-मिथुन 
तुम वाल्मीकि की कविता में 
अमर हो। 

"ध्वस्त घर" चित्र में जो बिखराव दिखाई देता है वो एक टूटे फूटे घर का नज़ारा है। अतिक्रमण हटाने के लिए नगर निगम के दस्ते आकर घरों को तोड़ते है । चित्र की रंग योजना तथा लय से लगता है कि घर का मलवा अपनी दर्दनाक कहानी कह रहा है।  जब उसे तोड़ा गया तो मनुष्य असहाय देखते रहे। क्रेन्स अपना काम करती रहीं। मलवे का ढेर एक अजब किस्म की तकलीफ पैदा करता है। यह भी कि टूटा फूटा घर अपनी त्रासदी कह रहा है। रंग संयोजन, लय, टोन्स तथा स्ट्रोक्स से एक रूपकीय ध्वनि पैदा होती है। यही चित्र का सौंदर्य है। कविता इस भाव को बड़ी जीवंतता से व्यक्त करती है। कवि घर का मानवीकरण कर चित्र को और असरदार बना देता है। 

दोबारा लौह हाथ रेंगता आया 
इस बार उसने  मेरी रीढ़ 
और कूल्हों को चटकाया
मै पूरी तरह ध्वस्त था। 

"खण्डहर" चित्र सिर्फ एक रंग से ही रचा गया है। काला रंग खण्डहर के बिम्ब रचता है और उसकी मूकता और त्रासद स्मृतियों का संकेत देता है। खण्डहर के जड़ पत्थर चाहते है कि उसे हवा कुछ स्पंदित कर सके। यह चित्र एक उदासी और अवसाद का वातावरण भी पैदा करता है। 

तुम आओ 
इन जड़ पत्थरों में 
स्पन्द देने को, आओ। 

"आशा" इस पुस्तक का अंतिम चित्र है। चित्र में अंधेरा है। पर अंधेरे में मानवीय सक्रियता भी प्रतिबिम्बित हैं। सफ़ेद रंग अंधेरे में उस आशा का प्रतीक है जो किसी भी इंसान को जिंदा रखने की बड़ी वजहा है।  पूरे चित्र में रंग संयोजन एक ऐसी लय पैदा करता है जिस से नई उम्मीद पैदा होती है। और उम्मीदें जीवन को नया रंग देती हैं। 

इसी अँधेरे में उगेंगे 
पंखधारी प्रकाश कण 
जो दिखाएंगे मुझे 
मेरा जीवन पथ। 

कोई भी कविता या चित्र को समझने के लिये उसमें उतरना ज़रूरी है। कविता के मर्म को समझना आसान नही होता। कविता लिखने से अधिक मुश्किल है उसके मर्म और निहितार्थ को समझना। अपने चारों तरफ़ के जीवन को समझना और अनुभव से कला भवाना को जगाना। कवि विजेंद्र अपनी कला चेतना को जगा कर जीवन की सच्चाई और सौन्दर्य को अपनी कला में सजीव रुप देते हैँ।

 


सम्पर्क-

ई-मेल :

shahnaz.imrani@gmail.com

टिप्पणियाँ

  1. सूर्य प्रकाश जीनगर फलौदी20 जुलाई 2014 को 7:23 pm

    लोकधर्मी कवि विजेन्द्र जी के चर्चित काव्य संग्रह आधी रात के रंग "की बेहतरीन समीक्षा युवा रचनाकार शाहनाज इमरानी की सधी हुई कलम से ।पठनीय। बधाई।

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