अशोक आजमी की नयी कविता 'लाल बहादुर वर्मा'



प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा इन दिनों हृदय की गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं. चिकित्सकों के मुताबिक़ उनके ह्रदय की ओपन हार्ट सर्जरी होनी है. इसके लिए उन्हें लखनऊ ले जाया गया है. हम सब उन्हें उनके जुझारूपन के लिए जानते रहे हैं. वे केवल एक शिक्षक ही नहीं बल्कि हम सब के लिए प्रेरणास्रोत, हम सब के लिए अभिभावक भी हैं. एक विशाल समुदाय है उन्हें चाहने वालों का. जिसमें केवल उनके छात्र ही नहीं अपितु साहित्य और संस्कृति के प्रति अनुराग रखने वाले, मार्क्सवाद को अपनी सांस मानने वाले शामिल रहे हैं. उनके विरोधी भी उनकी तर्क क्षमता के कायल रहे हैं. भारतीय इतिहास में मौखिक स्रोतों के अध्ययन की  नींव डालने वालों में लाल बहादुर जी का नाम अग्रणी रहा है. उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हुए हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं अशोक आजमी की यह कविता
  

अशोक आजमी    
 

लाल बहादुर वर्मा


ठीक इस वक़्त जब तुम्हारी साँसे 
किसी मशीन के रहम-ओ-करम पर हैं 
मैं इतिहास के पेड़ से गिर पड़े पत्तों पर 
बैठा हूँ लाचार 

वे इतिहास को एक मनोरंजक धारावाहिक में तब्दील कर रहे हैं साथी 
और तुम्हारी आवाज़ जूझ रही है 

तुम्हारा उत्तर पूर्व अब तक घायल है 
तुम्हारे इलाहाबाद में भी हो सकते हैं दंगे 
तुम्हारा गोरखपुर अब हिटलरी प्रयोगशाला है 
फ्रांस की ख़बर नहीं मुझे 
फलस्तीन के जख्म फिर से हरे हैं साथी

और तुम्हारे हाथों में अनगिनत तार लगे हैं 
पहाड़ जैसा सीना तुम्हारा 
नहीं काबू कर पा रहा है अपने भीतर बहते रक्त को 
समंदर की उठती लहरों जैसी तुम्हारी आवाज़ 
किसी मृतप्राय नदी सी ख़ामोश 
बुझी हुई है ध्रुव तारे सी तुम्हारी आँखें 
अनगिनत मरूथलों की यात्रा में नहीं 
थके जो पाँव गतिहीन हैं वे 

हम अभिशप्त दिनों की पैदाइश थे 
तुम सपनीले दिनों की 
तुम्हारे पास किस्से भी हैं और सपनें भी 
और उन सपनीली राहों पर चलने का अदम्य साहस 
कितने रास्तों से लौटे और कहा कि 
नहीं यह रास्ता नहीं जाता उस ओर 
जिधर जाना था हमें 

यह राह नहीं है तुम्हारी साथी 
लौट आओ...
हम एक नए रास्ते पर चलेंगे 
एक साथ


सम्पर्क

अशोक आजमी   

मोबाईल - 08375072473 

टिप्पणियाँ

  1. वर्मा जी एक व्यक्ति नहीं बल्कि चलता-फिरता विश्वकोश हैं |आज हमें उनकी और ज्यादा जरुरत है |

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  2. yh stya he ki koe ajr -amr nhi hota.
    jb tlk sas he tb tlk aas he
    unke kiye kam unhe jilayge
    unki kaya ka chchy to nisichit he.

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  3. वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है ...

    अशोक जी, व्यक्ति आधारित कविताओं में आपकी यह कविता बेहद अच्छी लगी। लाल बहादुर सर से जो मिले हैं, वो इस कविता के मानी शायद ज्यादा गहराई से समझ सकें। लेकिन जो नहीं मिले, वो भी आपकी कविता पढ़कर उन्हें बहुत-सारा जान जाएंगे। बेहद उम्दा लिखा है आपने।

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