रमाशंकर सिंह की कविताएँ


रमाशंकर सिंह


आत्मवृत्त के नाम पर कुछ खास नहीं है सिवाय इसके कि गोण्डा जिले के एक छोटे से गांव में जन्म। अन्न उपजाने वाले पिता के कारण भूखे तो कभी नहीं रहे, लेकिन गरीबी और लाचारी को बहुत गहरे तक महसूस किया है। पहली कविता साकेत कालेज की पत्रिका साकेत ‘सुधा’ में 2002 में छपी थी, फिर ‘वाक’ में  2009  में और ‘कथादेश’ में 2012 में कविताएं छपी हैं। ‘कथादेश’ में सुभाष कुशवाहा के सम्पादन छपी कविता ‘रथचक्र’ उड़ीसा में पास्को संयंत्र से बेदखल लोगों के बारे में थी जिसे पाठकों ने बहुत सराही थी विशेषकर इसके स्वर और संवेदना की सघनता के लिए। एक दो समीक्षाएं भी छपी हैं। अभी हाल ही में घुमंतू समुदायों की भाषा पर काम किया है जो ओरिएंट ब्लैकस्वान से एक सम्पादित पुस्तक में आने वाला है। इसके सम्पादक बद्री नारायण और प्रधान सम्पादक गणेश नारायण देवी हैं। फिलहाल प्राकृतिक संसाधनों पर दलित समुदायों की हकदारी और उनके सतत हाशियाकरण पर शोध कर रहा हूँ जो अगले साल तक पूरा हो जाएगा। छात्र राजनीति में गहरी रूचि।

कवि अपने समय की विसंगतियों पर प्रहार तो करता ही है साथ ही उसे समय-समय पर स्वयं अपनी भी विसंगतियों की पड़ताल करनी पड़ती है ऐसा दुःसाहस बिरले ही कर पाते हैं हमारा यह कवि नया होते हुए भी खुद की पड़ताल करने का साहस रखता है वह इस बात से भलीभांति अवगत है कि स्वयं की बेहतरी के लिए वह रोजगार की जो जद्दोजहद कर रहा है उसमें तमाम ऐसे दायित्व हैं जिसे वह पीछे छोड़ आया है इसी क्रम में वह महसूस करता है कि उसे 'बेईमान बनने की कहानी के बारे में' / लिखनी हैं कई कविताएँ' आज कुछ इसी तरह का तेवर रखने वाले कवि रमाशंकर सिंह की कविताएँ पहली बार के पाठकों के लिए

रमाशंकर सिंह की कविताएँ  
 

सुशीला के लिए एक कविता

यह कविता सुशीला के लिए है
कि यह कविता उनके
उन सारे गीतों के लिए है
जो खो गये हैं
जौनपुर से इलाहाबाद के रास्ते में
कि यह कविता उनके
उन सारे विस्थापनों के खिलाफ हैं
जो सदियों से हो रहे हैं
सुशीला और उनकी माँओं के साथ
और अब उसकी बेटियों के साथ
गाँव से शहर
शहर से शहर
दर ब दर
कि यह जगह इलाहाबाद में हाथी पार्क चौराहा हो सकती है
या इस देश के मुख्यमंत्रियों के घर के पीछे
प्रधानमंत्री के घर के आगे
जहाँ सुशीला और उसकी बेटियाँ बांस छीलती हैं
छीलती हैं अपनी पीड़ा
बांस की पतली खपच्चियों के संग संग
वो अपने अंदर की स्त्री को छीलती हैं
वो बांस की सीढि़याँ बनाती हैं
जो स्वर्ग तो नहीं ले जातीं
लेकिन रोटी देती है।

चेहरा

ऐसा जाना भी क्या जाना
कि मन मेँ अटके रहते हो
एक फांस बन कर
जैसे पैर मेँ चुभा काँटा
नासूर बन जाए
कि चोर को परेशान करता है
उसकी दाढ़ी का तिनका ..........

कि अब शीशे मेँ
अपना चेहरा भी नहीँ दिखता
मैँने तुम्हारा चेहरा पहन लिया है.

पहला काव्य-पाठ

यह मेरा पहला काव्य पाठ है
थोड़ी सी प्रशंसा थोड़ा सा प्रोत्साहन चाहिए
थोड़ा सा शुभ शुभ बोल दो मेरे लिए
दो चार ताली बजा दो कि
मैं तुम्हारा जरखरीद गुलाम हो जाऊँगा मेरे स्रोताओं
मैं अपनी रीढ़ की हड्डी घर छोड़ आया हूँ
छोड़ आया हूँ घर
अपने सारे शब्दों के अर्थ
 सच को सच बखानने वाले शब्द
उनके रंगों के ऊपर कालिख पोत दी है मैंने
कि न आ सकें दुःख दर्द अपमान पीड़ा देने

लेकिन यह चलेगा नहीं
कि एक दिन कवि की रीढ़ मजबूत हो जाएगी
सच को सच कहने की हिमाकत करने लगेगा कवि
भर जाएंगे शब्दों में अर्थ
वापस आ जाएंगे रंग
कि उधियाये छत्ते से जैसे निकलती हैं मधुमक्खियाँ
निकलेंगे वैसे ही शब्द
और उनके डंक से जिंदा हो जाएगा कवि।

साफ-साफ

स्मृतियों से कहीं ज्यादा
अब विस्मृतियाँ करती हैं व्याकुल
खुद की ही रची साजिशाना चुप्पी व्याकुल करती है
व्याकुल करती है
मित्रों को अकेला छोड़ आने की दगाबाजी
जब उन्हें मेरी सबसे ज्यादा जरूरत थी
दिन रात डसती हैं
भुला दी गयी ढेर सारी कविताएँ
जो लिखनी थीं दिवंगत पिता के प्रति
अम्मा के लिए
क्वार की धूप में सूख रहे बैलों
और बड़े भैया के लिए
सबको अकेला छोड़ आकर
अपने पेट के जुगाड़ में
बेईमान बनने की कहानी के बारे में
लिखनी हैं कई कविताएँ

लिखनी हैं कई कविताएँ
उन क्षणों के बारे में
जब मुझे कहना था
कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ
तुम्हारे साथ कदम दर कदम चलना चाहता हूँ

लिखना यह भी है
कि मैं तुमसे करता हूँ घृणा
मैं नहीं शामिल तुम्हारे गिरोह में

पहचान 2

तुम्हारी नाक जैसी मेरी नाक है
वे सूँघ नहीं पाते
कि मिट्टी कब तैयार होगी
धान रोपने के लिए
तुम्हारे कान जैसे मेरे कान हैं
वे सबकी आवाज सुन नहीं पाते
जैसे तुम सुन लेते थे
सुग्गों की
बैलों की
कि कब बरखा होगी सुन लेते थे टिटहरी की टेर में
तुम्हारी आँखों पर गयी हैं मेरी आँखें
लेकिन उनमें पानी नहीं बचा है
जितना पानी तुम्हारी आवाज में था
तुम्हारे माथे जैसा मेरा माथा
लेकिन वह ऊँचा नहीं
साहबों की चापलूसी में घिस गया है

तुम्हारे जैसा लगता हूँ हँसने पर
लेकिन इतना काइयांपन है
कि अकेले में डर लगता है

मुक्ति दे दो ओ पिता
अपने रूप रंग से मुझे

तुम्हारी पहचान मेरी आत्मा में धँस गयी है
घूमा नहीं जाता अब
शहर दर शहर
तुम्हारा चेहरा पहन कर।

सम्पर्क-
मोबाईल-08953479828

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं .)

टिप्पणियाँ

  1. Shaandaar kavitain! Haardik badhai v shubhkaamnain mitra... Dhanyavaad Bhai Santosh jee.
    - Kamal Jeet Choudhary

    उत्तर देंहटाएं
  2. धीरज मिश्र14 दिसंबर 2014 को 5:08 pm

    बहुत शुभकामनाएँ सुन्दर कविताएँ यथार्थ से परिचय कराती।

    उत्तर देंहटाएं
  3. कहने का नया तरीका है इन कविताओं में। मोहती हैं ये
    सुधीर सिंह

    उत्तर देंहटाएं
  4. रमा शंकर सिंह को तो मै जानता हूं लेकिन उनके भीतर एक कवि का आवास है यह उनकी पहलीवार में कविताये पढकर लगा ।सुशीला के लियेएक कविता..पहला कविता पाठ..कविता अच्छी है.लगता नही कि ये कवितायें किसी ताजातरीन कवि द्वारा लिखी गई है.उनकी काव्य यात्रा के लिये शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  5. Sudhir Singh

    धन्यवाद संतोष भाई कि रमाशंकर की कवितायेँ पढवाई।
    एकदम नई कहन की कवितायेँ हैं ये जो मुहावरा और अंदाज हिंदी में बिलकुल नया सा है। जैसे - 'मैंने तुम्हारा चेहरा पहन लिया है'
    या
    'मै अपनी रीढ़ की हड्डी घर छोड़ आया हूँ'
    या 'डंक से जिन्दा हो जायेगा कवि'
    सलाम इस कवि को !!

    उत्तर देंहटाएं
  6. Sanjay Kumar Shandilya

    बहुत अच्छी कविताएँ ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. Akhilesh Singh

    ये कवितायें आपकी आत्मा में उतरती हैं .... मन को झकझोरती ही नहीं सहलाती भी हैं ....सालती भी हैं ... ये कवितायें कवि के आक्रोश के उत्स से निकलती हैं ...जहां कवि पहले खुद को नोच लेना चाहता है ...खुद को झटकता है.... प्रताड़ित करता है ..और इसी प्रक्रिया में वह ..समय की भीषणता के बरक्स खड़ा होता है .... पूर्णतः आश्वस्त शब्दों के साथ .... कवि यह भी देखता कि वह सब कुछ नही कह पा रहा है ... इसलिये गुंजाइशों को पूर्ण सहमति देता है .... कवि दुख में
    मुस्कुराने के अपील के साथ नही आता ....वह यह बताता है कि अधिक तकलीफें अधिक काम ...और अधिक काम से तकलीफ .... इन स्थियों के क्या अर्थ हैं ..,....
    ज्यादा कुछ नही ...बस इतना ही ...कि अपने प्रिय कवि के एक एक शब्द के लिए मेरे अपने अर्थ हैं .............

    उत्तर देंहटाएं
  8. आप सभी को धन्यवाद .
    अपने आपको कहने के लिए जो मजबूरी उपजती है ... उस विवशता में से कुछ बातों को थोड़ा सा आपके साथ साझा कर पाया

    उत्तर देंहटाएं
  9. अनिल कुमार सिंह18 दिसंबर 2014 को 10:47 pm

    बहुत अच्छी कवितायेँ रमा .

    उत्तर देंहटाएं
  10. सामाजिक और व्यक्तिगत मर्म को बेधने वाली कविताएँ हैं. रमा शंकर की कुछ कविताएँ तो तो बहुत देर तक मन मे बनी रहती हैं. चेहरे के इतने प्रतिरूपों पर पहली बार कविता पढ़ी . कवि से ज़्यादा कुम्हार लगता है इसका रचनाकार . बधाई और विश्वास भी कि वह भविष्य मे और भी सुंदर कविता लिखेगा - Anvita Shree

    उत्तर देंहटाएं
  11. bahut Sundar, Rama Shanakar ji - App aisi kavitayen likhte rahiye......

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत अच्छी कविताएं है आगे भी इसी तरह लिखते रहिये ।शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  13. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  14. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रमाशंकर सिंह का आलेख 'उत्तर प्रदेश के घुमन्तू समुदायों की भाषा और उसकी विश्व-दृष्टि'