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राजेश उत्‍साही का आलेख - बाल साहित्य : चुनौतियाँ और संभावनाएँ :

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हमारे यहाँ बच्चों की शिक्षा के मायने सिर्फ यही है कि वह स्कूल जाए। पाठ्यक्रम की किताबें पढ़े। होम-वर्क करे। और अच्छे नम्बरों से परीक्षा पास करे। इस बंधी-बधाई दुनिया में थोड़ा मोड़ा टेलीविजन के कार्यक्रम, थोड़ा फेसबुक और व्हाट्स-अप भी अपनी जगह बना लेते हैं। लेकिन इस दुनिया में बाल-साहित्य के लिए प्रायः कोई जगह नहीं होती। अगर कोई बच्चा बाल साहित्य पढने में अपनी उत्सुकता दिखाता है तो (अभिभावकों की समझ के अनुसार) समझिए, बिगड़ने की राह पर चल पड़ा है। जबकि सच इसके बिल्कुल उलटा है। बाल-साहित्य बच्चों की मौलिक सोच को आगे बढाता है और उनके कल्पना के दायरे को ऐसे रंगों से भरने में कामयाब होता है जिससे वह सच्चे अर्थों में एक बेहतरीन इंसान बन सके। मेरा खुद का यह अनुभव रहा है। सौभाग्यवश बचपन में मुझे 'नंदन', 'पराग', 'चम्पक', 'चंदामामा', 'लोट-पोट', 'सुमन-सौरभ' और 'बाल-भारती' जैसी उम्दा बाल पत्रिकाएँ पढने को नियमित रूप से मिलीं जिससे मुझे मौलिक रूप से कुछ सोचने-समझने और लिखने के लिए प्रेरणा मिली