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हिमतरु साहित्यिक विशेषांक की प्रद्युम्न कुमार सिंह द्वारा की गयी समीक्षा

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युवा कवि प्रद्युम्न कुमार सिंह ने हिमतरू के उस साहित्यिक विशेषांक को पढ़ कर एक टीप लिखी है जो युवा कवि गणेश गनी पर केन्द्रित किया गया था।गद्य-लेखन से ही किसी भी रचनाकार की भाषिक समृद्धता और सम्पन्नता का आंकलन किया जा सकता है। इस क्षेत्र में प्रद्युम्न अभी नवागत हैं और अपने को साबित करने के क्रम में उन्हें आगे काफी परिश्रम करना होगा। युवा साथियों को लेखन के लिए प्रोत्साहित करने को ले कर ‘पहली बार’ ब्लॉग शुरू से ही प्रतिबद्ध रहा है और आज भी इस दिशा में लगातार सक्रिय है। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है प्रद्युम्न की एक टीप जो उन्होंने हिमतरू के साहित्यिक विशेषांक को केन्द्रित कर लिखी है। हिमाचल के काव्य हस्ताक्षर गणेश गनी
(गणेश भरद्वाज) प्रद्युम्न कुमार सिंह
आज 'हिमतरु' पत्रिका का अक्टूबर २०१५ का अंक पढ़ा। इसे पढ़ कर लगा कि गणेश गनी समकालीन कविता के निश्चित रूप से सशक्त हस्ताक्षर हैं। पत्रिका में एक आलेख ‘कविता आत्मा का संगीत है’ शीर्षक से प्रकाशित है, जो बहुत ही भावपूर्ण है। इसमें गनी जी ने वह तत्व खोजने का प्रयास किया है जिसे अक्सर लोग अनदेखा करते जा रहे हैं। वह है प्रेम,प्रेम वह तत्व है …

नववर्ष पर जर्मन भाषा के कवियों की चुनिन्दा कवितायेँ

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नव वर्ष पर जर्मन भाषा के कुछ कवियों की चुनिन्दा कविताएँ प्रतिभा उपाध्याय ने अनुवाद कर पहली बार के लिए उपलब्ध कराया था लेकिन कुछ व्यक्तिगत एवं तकनीकी दिक्कतों के चलते मैं इसे नव वर्ष के आरम्भ में नहीं लगा पाया था. लेकिन हमारे यहाँ तो पूरे जनवरी नव वर्ष की बधाईयाँ देने का चलन रहा है. इसी क्रम में इन कविताओं को हम पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं . तो आ इ ए पढ़ते हैं  जर्मन भाषा के कुछ कवियों की चुनिन्दा कविताएँ. जिनका खूबसूरत अनुवाद किया है प्रतिभा उपाध्याय ने .


नववर्ष पर जर्मन भाषा के कवियों की चुनिन्दा कविताएँ

अनुवाद:प्रतिभा उपाध्याय

नववर्ष की शुभकामनाएं पेटर रोज़ेग्ग(Peter Rosegger) ******************************************
थोड़ी अधिक शान्ति और कम विवाद थोड़ी अधिक दयालुता और कम द्वेष थोड़ा अधिक प्यार और कम घृणा थोड़ी अधिक सच्चाई हो – तो कुछ हो!
इतनी अधिक बेचैनी के बजाय थोड़ा चैन हमेशा केवल ‘मैं’ के बजाय थोड़ा अधिक ‘तुम’ भय और लाचारी के बजाय थोड़ा सा साहस और कार्य करने की शक्ति हो- तो अच्छा हो! यातना और अँधेरे में थोड़ा सा अधिक प्रकाश कोई प्रबल चाह नहीं, थोड़ा सा त्याग और ढेर सारे फूल –जितनी देर तक हो सके…