अदनान कफ़ील अय्यूबी दरवेश की कविताएँ

अदनान कफ़ील अय्यूबी दरवेश



नाम: अदनान कफ़ील 'दरवेश

जन्म: 30 जुलाई 1994 
जन्म स्थान: ग्राम/ पोस्ट- गड़वार, ज़िला- बलिया, उत्तर प्रदेश 
शिक्षा: दिल्ली विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस आनर्स में स्नातक 
सृजन: छिटपुट प्रकाशन 
 

अदनान कफ़ील अय्यूबी दरवेश महज 21 वर्ष की उम्र के हैं लेकिन उनकी कविताओं में पर्याप्त परिपक्वता दिखायी पड़ती है. हाल ही में मेरी नजर 'समावर्तन' के हालिया अंक पर पड़ी जिसमें अनुभवी सम्पादक निरंजन श्रोत्रिय ने रेखांकन के अंतर्गत अदनान की कविताओं को प्रस्तुत किया है. अदनान की कविताओं पर निरंजन जी ने एक लम्बी टिप्पणी भी लिखी है. निरंजन जी की इस टिप्पणी के साथ मैं 'समावर्तन' में प्रकाशित अदनान की कविताएँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. वे कविताएँ जो उम्मीद से लबरेज हैं. तो आइए आज पढ़ते हैं अदनान की कविताएँ.
        

युवतम कवि अदनान की उम्र महज़ २१ वर्ष है लेकिन उनकी कविताओं में परिपक्वता की ऊष्मा छितरी हुई है. यह परिपक्वता अनुभवजन्य भले ही न हो लेकिन प्रेक्षण, अध्ययन और संवेगों द्वारा उपार्जित अवश्य है. अदनान एक ओर जहाँ वायवीय और गहनतम अनुभूतियों को अपनी कविता का अंग बनाते हैं वहीँ दूसरी ओर बदलाव की अदम्य जिजीविषा को अपनी कविता की मूल प्रतिज्ञा. 'पीठ पर घास की तरह उगना', 'बाँस की तरह उठना', 'जड़ों की तरह समाना', 'और राख की तरह झड़ना' जैसे चमत्कृत करने वाले बिम्ब उनकी कविता में विन्यस्त हैं. जब आकाश जैसे असीम वायवीय वितान को वे दो हिस्सों में बाँटते हैं तो दरअसल इस तरह 'अपने-अपने आकाश' की अवधारणा को एक प्रतिबद्धता के तहत स्वीकारते हैं. कवि के लिए आकाश थकान का विलोम भर है. ‘आँख’. कविता में माँ के हाथों में आँखें उगाने का मार्मिक बिम्ब ममत्व को जहाँ नए सिरे से टटोलता है वहीँ ममता के स्पर्श को एक काव्यात्मक आभा प्रदान करता है. ‘सारी गोलियाँ दाग देना चाहता हूँ’ जैसी अपेक्षाकृत लम्बी कविता में कवि की आकाँक्षाओं का पुरज़ोर उद्घोष है लेकिन साथ ही एक यथार्थवादी और हताशा का भाव भी कि ‘मेरे चाहने से क्या होता है साथी’.

कवि जिस दुनिया के निर्माण की अपेक्षा कर रहा है वह असंभव सी लगती भले ही हो लेकिन है तो अंततः मनुष्य और उसकी कविता का अभीष्ट? “मैं उस नीम की खण्डित आत्मा से फिर मिलना चाहता हूँ/ जिसकी नर्म डालियों में मैं झूला झूलता था/ मैं दुकानों में बंद सारी गेंदें निकाल कर बिखेर देना चाहता हूँ साथी/ लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है साथी? मैं तो बिना डोरी के पतंगें उड़ाना चाहता हूँ...”. सत्य का अन्वेषण और सच के इज़हार का आग्रह इस युवा कवि के व्यक्तित्व का सार है. ज़ुबाने काट लेने की हद्द तक सच बोलने की ज़िद्द दरअसल एक कवि की वह प्रतिबद्धता है जो उसे सदैव मानवीय बनाए रखती है. न्यून या तुच्छ होने के हीनता-बोध से कवि पूर्णतः मुक्त है क्यूंकि उसका अंतिम उद्देश्य व्याप्त अँधेरे से मुक्त होना है. कहना न होगा कि अन्धकार से मुक्ति की यही आकाँक्षा अंततः कवि का भी अभीष्ट है. युवतम कवि अदनान की कविताओं में क्रांति की चेतना अंतर्व्याप्त है. उसमें जनगीत का जोश भी है और साथ ही एक ज़रूरी काव्य विवेक भी. इसीलिए वे महज़ नारे न हो कर परिवर्तन की जिजीविषा से भरे क्रांति गीत भी हैं. कवि को कविता का दायित्व-बोध होना परम आवश्यक है. इस भान से वह अपनी कविता को अनावश्यक रूप से स्थूल, वायवीय, आभासी और अनावश्यक रूमानियत से मुक्त रख पाता है. अदनान अपनी कविता को कल्पना की ऊँची उड़ान से मुक्त कर ज़मीनी हक़ीक़त तक बांधे रखते हैं. ‘शैतान’ कविता के माध्यम से यह युवा कवि अपनी राजनीतिक चेतना और समझ का परिचय देता है. सत्ताधीश द्वारा ओढ़े गए मुखौटे को नोच कर वह उसके असली चेहरे और चरित्र को उद्घाटित करता है. 

युवा कवि अदनान कफ़ील दरवेश एक संभावनाशील युवा कवि है. यदि इस कवि ने अपनी काव्य-प्रतिभा को संवेदन और यथार्थजन्य अनुभव का ताप दिया तो कविता का निखरते जाना सुनिश्चित है. युवा कवि अदनान के लिए यह समय अपनी संवेदना को महीन, अपनी भाषा को परिष्कृत और अपने अनुभवों को सघन करने का समय है. ‘तुम्हारे हर दफा चले जाने के बाद/ मैं तुम्हारे लौट आने की सम्भावना को बचा लूँगा’ जैसी पंक्तियाँ लिखने वाले इस कवि के भीतर काफी संभावनाएँ हैं. बस, कवि को इन्हें बचाने की ज़रूरत है.



-निरंजन श्रोत्रिय

( संपादक ‘समावर्तन’)



अदनान कफ़ील अय्यूबी दरवेश की कविताएँ




एकालाप

तुम्हें मेरी हथेली में
फूल की तरह खिलना था
और मुझे तुम्हारी पीठ पर
घास की तरह उगना था
तुम्हें मेरे वजूद के आस-पास
बाँस की तरह उठना था
और मुझे
जड़ों की तरह समाना था
मुझे राख की तरह झड़ना था
और तुम्हें
गंध की तरह बिखरना था
लेकिन कहाँ हो पाया ये सब ?
मैं मुठ्ठी की तरह खुला
और तुम
भाप की तरह उड़ गयीं.....

(रचनाकाल: 2015)
दिल्ली


आकाश

तुम्हारे लिए ही होगा आकाश
असीम, अनंत या नीला समंदर
हमारे लिए तो आकाश हमेशा से
गिप्पल के चौकोर खानों जितना ही था
दो फिट का खण्डित आकाश ही
शायद हमारी नियति रही
तुम्हारे लिए ही होगा आकाश
कोई झील-सा
कि जिसमें
नायिका के मोतियों के हार के दाने
बिखरे हों
बेतरतीब, बेहिसाब
हमारे लिए तो आकाश
एक रंग भर था
जैसे पीला-गुलाबी-चम्पई
सच पूछो तो हमारे लिए
आकाश
थकान का विलोम था बस....

(रचनाकाल: 2015)
दिल्ली 

आँख

मेरी बूढ़ी माँ को मोतियाबिंद की शिकायत है
लेकिन उसकी आँखें अँधेरे में भी देख लेती हैं
जब मैं लेटता हूँ उसके बगल में
तो वो मुझे टटोलती है
जैसे ढूंढ रही हो अपनी कोई खोयी हुयी चीज़
और बिना कहे जान लेती है
कि मेरे पेट में दर्द है या सर में थोड़ा बुखार
मुझे पहचानने के लिए वो कोई
चश्मा भी नहीं लगाती
मुझे छू कर समझ लेती है कि मैं हूँ
सब कहते हैं
कि मेरी माँ अंधी है
लेकिन मैं कहता हूँ
कि हम सब अंधे हैं
केवल मेरी माँ को छोड़ कर
मेरी माँ ने तो अपने हाथो में आँख उगा लिए हैं
और हम सब अपनी आँख
कहीं रख कर भूल गए हैं .....

(रचनाकाल: 2015)
दिल्ली 

 
सारी गोलियाँ दाग देना चाहता हूँ

मैं उस बकरी से फिर मिलना चाहता हूँ
जिसका मीठा दूध मेरी शिराओं में दौड़ रहा है
मैं अपने तोते की जीभ को फिर से छूना चाहता हूँ
मैं उस बकरे को याद करता हूँ जो मेरी पीठ पर चढ़ जाता था
जब मैं अमरुद तोड़ता था
मैं उस बुढ़िया से फिर मिलना चाहता हूँ
जिसकी आँखों को बुखार ने जकड़ लिया था
जो मुझसे अक्सर अपनी कोठरी का ताला खुलवाती थी
जो मुझसे अक्सर अपना स्टोव जलवाती थी
मैं दुनिया के हर ताले को खोल देना चाहता हूँ साथी
और फिर हर चाभी को ज़मीन में छुपा देना चाहता हूँ
मैं उस लड़की से फिर मिलना चाहता हूँ
जो अपने हिस्से का गुड़ मुझे चटा देती थी
मैं उस नीम की खण्डित आत्मा से फिर मिलना चाहता हूँ
जिसकी नर्म डालियों में मैं झूला झूलता था
मैं दुकानों में बंद सारी गेंदे निकाल कर बिखेर देना चाहता हूँ साथी
लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है?
लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है साथी?
मैं तो बिना डोरी के पतंगें उड़ाना चाहता हूँ
खलिहान में साइकिल दौड़ाना चाहता हूँ
लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है?
लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है साथी?
जहाँ आकाश आज भी बालिश्त भर ही है
जहाँ सपनों की पीठ पर आज भी चाबुक के गहरे निशान हैं
ये मेरे विचार हैं या भुने चने
मैं नहीं कह सकता
मैं तो रात के ढाई बजे ही जग जाता हूँ साथी
और अपने आन्दोलन में चींखता हूँ
लेकिन मेरे चींखने से क्या होता है?
मेरे चींखने से क्या होता है साथी?
मैं तो नदियों के हर ताले तोड़ देना चाहता हूँ
मैं तो इंच-इंच ज़मीन को प्लावित कर देना चाहता हूँ
मैं बाँस के कंधे ढूंढ़ता हूँ रोने के लिए
लेकिन मेरे रोने से क्या होता है साथी?
जब गोदामों में अनाज की कोई कमी नहीं होती
फिर भी एक बच्चा
महज़ पाँच साल का नन्हा बच्चा
अपने अँगूठे क्यूँ चूसता है?
जब फैक्ट्रियों में कलम इफ़रात तादाद में मौजूद हैं और किताबें भी
तो फिर वो बस्ती के आख़िरी बच्चे तक क्यूँ नहीं पहुँचतीं?
मजदूरों के ही हाथ में घट्ठे क्यूँ पड़ते हैं साथी?
एक लड़की इतना क्यूँ रोती है?
मैं इतना क्यूँ रोता हूँ?
क्या आकाश का देवता अँधा है?
हर चमचमाती साईकिल ताले में क्यूँ बंद है?
हम भाषा क्यूँ गढ़ते हैं ?
हम शब्द की सीमाएँ क्यूँ बनाते हैं?
रूई के फाहे-सा ख़रगोश का बच्चा
तो शब्द नहीं उछालता
जब उसे भूख लगती है
कुत्ते का छोटा-सा बच्चा बहुत छोटा-सा
क्या अलार्म लगा कर सोता है?
हम कँटीले तारों से अपनी ज़मीने क्यूँ सुरक्षित करते हैं?
हमारे घर में दीवारें क्यूँ होतीं हैं साथी?
मैं तो हर दीवार में छेद कर देना चाहता हूँ
जिससे यहाँ-वहाँ जाने में कोई तकलीफ़ न हो
लोहे की मोटी-मोटी जंज़ीरें और असलहे क्यूँ बनते हैं?
आदमी को मारने के लिए ही न!
आदमी-आदमी को क्यूँ मारता है साथी?
मैं तो हर बन्दूक गला देना चाहता हूँ
मैं तो हर टैंक तोड़ देना चाहता हूँ
लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है?
लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है साथी?
मैं तो अपने बकरे के पास लौट जाना चाहता हूँ
मैं तो अपने तोते के पास लौट जाना चाहता हूँ
मैं तो अपनी बकरी के साथ हँसना चाहता हूँ
मैं तो बेफ़िक्र पतंगें उड़ाना चाहता हूँ
मैं तो उस लड़की के हाथ से गुड़ चखना चाहता हूँ
जो मुझे अपने हिस्से का गुड़ चटा देती थी
मैं तो बोरसी में भुने आलू खाना चाहता हूँ
मैं तो लट्टू नचाना चाहता हूँ
मैं तो अपने कंचे और चमचमाती साईकिल की दुनिया में
फिर से लौट जाना चाहता हूँ
जहाँ धनुवा और मेरे माथे एक जैसे सफ़ेद लिफ़ाफ़े से होते थे
जहाँ मैं और बर्तन वाले की लड़की ओक्का-बोक्का खेलते थे
क्यूँकि हमारे माथे एक जैसे थे
लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है?
लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है साथी?
लेकिन मैं सोचता हूँ रात के ढाई बजे
कि जब आगे बढ़ना एक सामान्य प्रक्रिया है
तो पीछे लौटना क्यूँ नहीं?
मैं तो नींद और सपने की हर संभावना को बचा लेना चाहता हूँ
मैं तो सुनहले जीवन की हर सम्भावना को बचा लेना चाहता हूँ
मैं तो बेफ़िक्र मुस्कुराने की हर संभावना को बचा लेना चाहता हूँ
मैं तो साथ चलने की हर संभावना को बचा लेना चाहता हूँ
लेकिन सत्ता और पूँजी के ये ख़तरनाक-लिजलिजे-बदसूरत दलाल
किसी भी ख़ूबसूरत-चमकीली और मुलायम चीज़ की
हर संभावना को नष्ट कर देना चाहते हैं
मैं तो इनके सीने में पृथ्वी का सारा बारूद भर देना चाहता हूँ
मैं तो इनके सीने में सारी गोलियाँ दाग देना चाहता हूँ ....
लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है?
लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है साथी?

(रचनाकाल: 2015)
दिल्ली


चराग़ बुझा दो

ये चराग़ बुझा दो
मैं तुम्हें अँधेरे में देखना
ज़्यादा पसंद करता हूँ
क्यूंकि अँधेरे में
मेरे भीतर का आदमी
तुम्हें एक आदमी की तरह देखता है
एक औरत की तरह नहीं .....

(रचनाकाल: 2015)
दिल्ली


एक क्रांतिकारी का क़ुबूलनामा
(हमीद-उर-रहमान के लिए)

मैं कुछ भी नहीं था
हाँ,  शायद मैं कुछ भी नहीं था
मेरी बातें साफ़ और सपाट थीं
बिलकुल बारिश से धुले आकाश की तरह
जिन्हें तुम अतिबौद्धिक,  दार्शनिक,  उन्मादी,  सनकी
और न जाने क्या-क्या नाम देते थे
मेरा आक्रोश कोई क्षणिक उत्तेजना कत्तई नहीं थी
मैं तो उन वर्षों की दबी-कुचली भावनाओं की
एक प्रतिध्वनि मात्र था
मैं तो भोर की ठंडी हवा के एक झोंके की तरह था
नयी सुबह की एक हल्की-सी लकीर भर था
हाँ,  मैं कोई रौशनी का चिराग़ नहीं था
एक अदना चिंगारी मात्र ही तो था
लेकिन मुझे अपने तुच्छ होने का
लेशमात्र भी दुःख नहीं था
क्यूंकि मैं फिर भी अँधेरे से
लाख गुना बेहतर था...

(रचनाकाल: 2012)
दिल्ली

आख़िरी जंग

हमें लड़नी होगी एक आख़िरी जंग
उनके ख़िलाफ़ कि जिनके घरों में ही
उगते हैं ऐश-ओ-इशरत के गुलाब
याद रक्खो!
कि जब ख़त्म हो जाएँगी
तुम्हारे बंदूकों की गोलियाँ
और उस वक़्त तुम भागोगे अपने क़िलों की तरफ़
उस वक़्त हम लड़ेंगे
एक आख़िरी जंग
अपने आबा-ओ-अजदाद की जंग लगी हथियारों से
पत्थरों से
अपनी फ़ौलादी बाहों से
और उखाड़ेंगे तुम्हारे क़िले
लेंगे उस दिन
हर एक ज़ुल्म का हिसाब
याद रक्खो!
उस आख़िरी दिन से इन्सान
अपनी पूरी आदमियत में जियेगा...

(रचनाकाल: 2012)
दिल्ली


अंतिम फैसला 

हमारी मेहनत हमारे गहने हैं
हम अपना श्रम बेचते हैं
अपनी आत्मा तो नहीं?
और तुम क्या लगा पाओगे हमारी क़ीमत
तुम तो हमें हमारा हक़ नहीं देते
क्यूंकि तुम मुफ़्त खाने वाले हो
तुम हमें डराते हो, सताते हो
लेकिन भीतर ही हमसे डरते भी हो
तुम हमें लाठी और बन्दूक की नोक पे रखते हो
लेकिन याद रक्खो!
हम अगर असलहे उठाएँ
तो हम दमन नहीं फ़ैसला करेंगे!

(रचनाकाल: 2012)
दिल्ली


  झूठों के शिलालेख

वो लिखेंगे झूठ
शिलाखण्डों पर
ताकि सभ्यता के
समाप्त हो जाने के बाद भी
बचा रह जाये
उनका 'झूठा-सच'
लेकिन साथी
हम लिखेंगे सच
चाहे रेत ही क्यूँ न हो अपने पास
साथी हम बोलेंगे सच
जब तक कि
हमारी ज़ुबाने नहीं काट ली जातीं.

(रचनाकाल: 2014)
दिल्ली


संभावना

मैं हर बार
तुम्हें ग़लत नाम से पुकारूँगा
ताकि तुम हर बार लौट कर आओ
मेरी भाषा और व्याकरण का संस्कार करने
और इस तरह
तुम्हारे हर दफ़ा चले जाने के बाद
मैं तुम्हारे लौट आने की सम्भावना को
बचा लूँगा ....

(रचनाकाल: 2015)
दिल्ली

अब नहीं लिखूंगा प्रेम

मैं अब नहीं लिखूंगा प्रेम
मैं अब नहीं भरूँगा
कल्पना की ऊँची उड़ानें
नहीं लिखूँगा कि चाँद
तेरे मुखड़े की शुआओं से दमकता है
आकाश तेरी बाहों का फैलाव भर है
रात तेरी ज़ुल्फों की कालिख-सी है
नहीं लिखूंगा तेरी गर्दन को सुराही-सा
तेरी चाल को नागन-सा
तेरी कमर के लोच को बेल-सा
मैं बजाय इसके
लिखूंगा भूख,  प्यास,  आँसू,  पसीना
मैं लिखूंगा आग,  लोहा,  बेंत
मैं लिखूँगा अफ़्सुर्दा चेहरे
छिली रूहें,  छितराई आँखें
मैं लिखूँगा किसी औरत की चींख
मैं लिखूँगा बारूद,  गोले
जंग-जंग-जंग
मैं लिखूंगा बूट
बूट तले पिसती हथेलियाँ
नाली में गिरी जुम्मन मियाँ की टोपी
सुघरी की जली लाश
मैं लिखूँगा भाले,  तलवार
अत्याचार-अत्याचार-अत्याचार
मैं लिखूँगा घुटती साँसे
श्मशान सी शांति
मैं लिखूँगा पत्थर पे बैठे
एक कवि की चुप्पी
हाँ साथी मैं लिखूँगा ये सब
अब बस
कि प्रेम नहीं लिख सकूँगा
हाँ,  अब प्रेम नहीं लिख सकूँगा ....

(रचनाकाल: 2014)
दिल्ली
 

शैतान

अब वो काले कपड़े नहीं पहनता
क्यूंकि तांडव का कोई ख़ास रंग नहीं होता
अब वो आँखों में सुरमा भी नहीं लगाता
अब वो हवा में लहराता हुआ भी नहीं आता
ना ही अब उसकी आँखें सुर्ख और डरावनी दिखतीं हैं
वो अब पहले की तरह चीख़-चीख़ कर भी नहीं हँसता
ना ही उसके लम्बे बिखरे बाल होते हैं अब.
क्यूंकि इस दौर का शैतान
इंसान की खाल में खुलेआम घूमता है
वो रहता है हमारे जैसे घरों में
खाता है हमारे जैसे भोजन
घूमता है टहलता है
ठीक हमारी ही तरह सड़कों पर.
इस दौर का शैतान बेहद ख़तरनाक है साथी
वो अपने मंसूबे जल्दी ज़ाहिर नहीं करता
वो दिखाता है एक झूठी दुनिया का ख्वाब
रिझाता है अपनी मीठी-चुपड़ी बातों से
लेकिन उसका असली सच
वही है जो संसार की क्रूर किताबों और काले इतिहास के पृष्ठों पर दर्ज है
इस दौर के शैतान ने अपने पारंपरिक प्रतीकों और चिन्हों की जगह
इन्सान की तरह मुस्कुराना सीख लिया
जी हाँ श्रीमान!
वो मुस्कुरा रहा है गली के नुक्कड़ पे
सब्ज़ी मंडी में
रेलवे स्टेशन और एअरपोर्ट पे
वो मुस्कुरा रहा है स्कूल में
वो मुस्कुरा रहा है ऊँची कुर्सियों पर
यहाँ तक कि वो मुस्कुरा रहा है हमारे घरों में
और हमारे बहुत भीतर भी....

(रचनाकाल: 2014)
दिल्ली
  

ग़ाज़ा हमले के बाद

फ़लस्तीन के मक़तल से
खून रिसते-रिसते
मेरे कमरे के फर्श तक
पहुँच आया है.
मेरे कमरे की दीवार पर
उस बच्चे की आँख चिपक गयी है
जो कल रात
गाज़ा में क़त्ल कर दिया गया
जिसने अभी
उम’ भी कहना नहीं सीखा था...

(रचनाकाल: 2015)
दिल्ली 

सम्पर्क - 

पता: 
अदनान कफ़ील, S/O ई. ज़ेड. जावेद
ग्राम/ पोस्ट- गड़वार,  
ज़िला- बलिया,  
उत्तर प्रदेश

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)

मोबाईल - 09990225150

ई-मेल : thisadnan@gmail.com

टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 02 मार्च 2016 को लिंक की जाएगी...............http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद! 

    उत्तर देंहटाएं
  2. अदनान को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।अदनान जिस उम्र में हैं उस उम्र में इतनी अच्छी कविताएं लिख लेते है, यह हिंदी कविता के लिए बहुत अच्छी बात है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. अदनान की कवितायें अद्भुत हैं .. इस छोटी उम्र के कवि को सलाम भेजती हूँ .

    उत्तर देंहटाएं
  4. Adnaan jiyo !! Khushi hui aapko padhkar...
    Meri ashesh Shubhkaamnayen svikaar Karen. Dhanyavaad Bhai Santosh ji ye shaandaar kavitain padhvaane ke liye...
    - Kamal Jeet Choudhary ( J&K )

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