सिंजू पी. वि. का आलेख ‘कहानीकार मार्कण्डेय : किसानों एवं खेतिहर मज़दूरों के तरफदार’


मार्कण्डेय जी


भारत एक कृषि प्रधान देश है। यह जुमला हम बचपन से ही सुनते आए हैं। आज भी यदा-कदा इस जुमले को दोहराया जाता है। यह सच्चाई है कि कृषि में औद्योगीकरण और सेवा क्षेत्र से अधिक लोग आज भी लगे हुए हैं। यह अलग बात है कि किसानों की स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती गयी है। एक आंकड़े के अनुसार प्रति वर्ष लगभग पांच हजार किसान आत्महत्याएँ कर लेते हैं जिसके मूल में मुख्यतः उनका कर्ज के जाल में फंसे होना होता है। आजादी के 69 साल बीतने के बावजूद किसान की बदतर स्थिति और बदतर हुई है। सिंचित क्षेत्र बढाने के प्रयास न के बराबर किये गए। विडम्बना यह है कि आज भी देश का अधिकाँश किसान अपनी खेती के लिए बारिस पर निर्भर है। बारिस न होने की स्थिति में किसानों की खेती चौपट हो जाती है और फिर उसके सामने आत्महत्या के अलावा दूसरा चारा नहीं रह जाता। दुखद स्थित यह है कि आज का भारत बड़ी तेजी से उदारवाद की आंधी में बहा जा रहा है। उदारवाद जो वस्तुतः अपनी प्रकृति में ‘उजाड़वाद’ है। हमारी सरकारें भी अब पूंजीपतियों के हितों के लिए किसानों की भूमि औने-पौने मूल्यों पर अधिग्रहित कर के उन्हें देने के लिए सन्नद्ध है। ऐसे में आज देश का किसान निरुपाय है। वह खेती छोड़ कर रोजी के दूसरे उपाय खोजने लगा है। आजादी के बाद किसानों की दुरावास्थाओं को जिन रचनाकारों ने जोरो-शोर से उठाया उनमें कहानीकार मार्कण्डेय का नाम प्रमुख है। दो मई मार्कण्डेय जी का जन्मदिन है। उन्हें याद करते हुए हमने पहले हिमांगी त्रिपाठी का आलेख प्रस्तुत किया था इसी श्रंखला में आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं सिंजू पी. वि. का यह आलेख ‘कहानीकार मार्कण्डेय :  किसानों एवं खेतिहर मज़दूरों के तरफदार’। किसी ब्लॉग पर प्रकशित होने वाली सिंजू की यह पहली रचना है ध्यातव्य है कि सिंजू मलयालीभाषी हैं और हिन्दी में मार्कण्डेय जी की रचनाओं पर शोध कार्य कर रही हैं। तो आइये आज पढ़ते हैं सिंजू का यह आलेख।
                       
कहानीकार मार्कण्डेय :  किसानों एवं खेतिहर मज़दूरों के तरफदार

सिंजु पी.वि.
    
भारत एक कृषिप्रधान देश है। यहाँ की 70 प्रतिशत जनता कृषि और उससे सम्बन्धित व्यवसाय से जुडी हुई हैं। इस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था की नींव कृषि पर आधारित है। इस अर्थव्यवस्था की धुरी है किसान। लेकिन आज उन किसानों की जिन्दगी कठिन संघर्ष से गुज़र रही है। सालों से किसान कड़ी मेहनत करके अन्न उगाता आ रहा है, और प्रकृति के अनुकूल जीवन बिता कर एक नैतिक समाज का पालन करता आ रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव, औद्योगीकरण तथा विज्ञान के प्रचार-प्रसार की वजह से खेती में भी तीव्र परिवर्तन आने लगा। धीरे-धीरे खेती व्यवसाय में तबदील होने लगी। नवउपनिवेशवादी आर्थिक नीतियाँ जैसे उदारीकरण, निजीकरण आदि के तहत अर्थव्यवस्था मुनाफा केंद्रित हो गयी।  पूरी दुनिया भूमंडलीकृत बाज़ार में बदलने लगी। विकास योजनाओं के नाम पर देशी-विदेशी कॉरपरेट कंपनियों के लिए कृषि योग्य ज़मीन का अधिग्रहण होने लगा। इसके फलस्वरूप किसान का अस्तित्व खतरे में पड़ गया। धीरे-धीरे इस वैश्वीकृत दुनिया में कृषि और किसान की अहमियत खतरे में पड़ने लगी। ऐसे माहौल में इस विषय पर गंभीरता से विचार करना लाजिमी है।

जिस समय साहित्य के श्रेत्र में मार्कण्डेय का प्रवेश हुआ, तब अधिकतर कहानीकार शहरी जीवन या कस्बाई जीवन की कहानियाँ लिख रहे थे।  लेकिन मार्कण्डेय ने अपनी कहानियों में गंवाई किसान और खेतिहर मज़दूरों को जगह दिया। आवाम के प्रति अपनी पक्षधरता को रेखांकित किया। खेती-बाड़ी के क्षेत्र में दो वर्ग मौजूद हैं। एक किसान, दूसरा भूमिहीन किसान अर्थात मज़दूर। किसान जो अपनी ज़मीन के छोटे-टुकडे पर अपने परिवार के श्रम के साथ अन्न उगाता है। “खेतिहर मज़दूर, ज़मीन के मालिक तो थे नहीं, बल्कि हलवाही-चरवाही के एवज़ में पाये एकाध बीघा पर पाए खेतों की ही उनकी किसानी थी। उन्हें मज़दूर-धतूर ही माना जाता था।”1 मार्कण्डेय की चर्चित कहानियों में किसान-खेतिहर मज़दूरों की ही तादाद ज्यादा है। ‘कल्यानमन’, ‘भूदान’, ‘दाना-भूसा’, ‘दौने की पतियाँ’, ‘बीच के लोग’, ‘मधुपूर के सिवान के एक कोना’ आदि जैसी कहानियों में मार्कण्डेय इन्हीं की हिमायत करते स्पष्ट नज़र आते हैं। इसलिए मार्कण्डेय को किसान एवं खेतिहर मज़दूरों के तरफदार कहानीकार मानना चाहिए। उनकी कहानियों के ज़रिए स्वातंत्र्योत्तर कृषक जीवन का सही एवं वास्तविक आंकलन हम कर सकते हैं।

किसान के लिए उसकी भूमि ही सब कुछ है। चाहे कितनी बड़ी विपत्ति आ जाये वह अपनी भूमि से दूर होने की बात को स्वीकार नहीं कर सकता।  इसे कोई हड़पना चाहे, यह कैसे संभव है। मार्कण्डेय की ‘भूदान’ कहानी में चेलिक नामक किसान का अपनी ज़मीन के लिए संघर्ष को यों दिखाया है – “सारा गाँव चेलिक को समझा रहा है। काहे को विपत लेते हो सिर पर, काहे लड़ते हो। पर नहीं, तो नहीं! चेलिक पकड़ा गया और उसके चमड़ों में बाँस की खपच्चियाँ, पीठ पर हंटर, कमर पर लकड़ी का कुन्दा। बेहोश हो गया।  मुँह से फेचकुर आने लगा, पर भूँय तो भूँय। धरती है माता, माता को कैसे दें।”2 नीलहे साहब और कारिन्दा उसकी भूमि हड़पना चाहते हैं। उसका बेहद शोषण करते हैं। लेकिन चेलिक अपनी ज़मीन के लिए मर मिटने पर तुला है वह पूरी ताकत लगा कर अपनी भूमि को बचाने का प्रयत्न करता है।  आखिरकार अपने प्रयास में वह सफल भी हो जाता है।

किसी भी किसान समस्या को भूमि से अलग रख कर नहीं देखा जा सकता। वास्तव में असंतुलित भू-वितरण ही इन सबकी धुरी है।  स्वातंत्र्योत्तर देश के सत्ता के सूत्र पूंजीवादी ताकतों के हाथ जाने के कारण असमान भूमि-वितरण की समस्या अधिक भयावह बनती गई जिससे किसान की अभावमय जिन्दगी और विकराल बन गई। मार्कण्डेय की ‘कल्यानमन’ और ‘भूदान’ कहानियाँ इस सन्दर्भ में विशेष महत्वपूर्ण हैं। इन कहानियों की रचना उस समय हुई थी जब भूमि सुधार योजना की बात हो रही थी, विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं का सूत्रपात हो चूका था। विनोबा भावे के नेतृत्व में भूदान-आन्दोलन भी अपने जोरों पर था। भूमि-हीन किसान इस आशा में इंतज़ार करने लगे थे कि अब उनके नाम पर भी ज़मीन मिल जाएगी। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उनकी यह आकांक्षा बहुत जल्द निराशा में बदल गयी। भूमि सुधार के कानून से ज़मीन किसान के नाम सिकमी ज़रूर लग गयी। लेकिन बड़े जमींदारों से तंग हो कर किसानों ने कागज़ पर दस्तखत दे कर अपनी जान बाचना ही मुनासिब समझा। ‘कल्यानमन’ कहानी इस तथ्य की बखूबी उजागर करती है। कल्यानमन सोलह बीघे का एक तालाब है, जिस में लम्बे अर्से से मंगी सिंघाड़े की खेती होती आ रही है। इस तालाब को बड़े ठाकुर ने मंगी को बखरी में पानी भरने के एवज़ में दिया था। मंगी ने जब यह सुना कि जिसकी जोत होगी भूमि उसी को हो जाएगी, तो वह बहुत खुश थी। कल्यानमन तालाब उसके नाम सिकमी भी लग गया। लेकिन उसके बाद यह ख़ुशी दुःख में तब्दील हो गयी। ठाकुर का बेटा, हर हाल में कल्यानमन को हथियाना चाहता है। इस के लिए वह तरह-तरह की चाल चलता है। मंगी प्रतिरोध करती है फिर भी वह चिंतित दिखती है- “अँखियाँ तो फूट गई है सुरजियन की, कि यह अन्हेर भी नहीं देखते खेती चमार करेगा, परताल ठाकुर के नाम से होगी। बीच में पटवारी इधर से भी खाएगा, उधर से भी खायेगा। अब तो बेभूय का किसान खाद हो गया है खाद। बस बह खेत बनाता है।”3 मंगी का यह कथन मौजूदा कृषि से जुड़े संबंधों पर तीखी टिप्पणी है। अंत में ठाकुर मंगी के इकलौते बेटे पनारू को अपनी माँ के खिलाफ भड़का कर अपनी तरफ कर लेता है। अपने प्रति बेटे का व्यवहार मंगी को भीतर से तोड़ देता है। वह बेटे को समझाता है कि “जानता नहीं कि ये लोग ज़मीन के लिए, आदमी की गर्दन भी काट सकते हैं। .....भला बची है एक बिस्सा भूय किसी मंजूर-धतूर के पास? सभी तो खेत-जोत रहे थे। कोई मार खा कर इस्तीफा लिख गया, तो किसी को बहका कर सादे कागद पर अंगूठे की टीप ले ली, इन लोगों ने। किसी को सौ-दो-सौ दे कर सादे कागद पर अंगूठे की टीप ले ली, इन लोगों ने। किसी को सौ दो सौ देकर टरकाया। नहीं रह गया, कुछ?”4 मंगी के मुख से मानो देश का शोषित किसान अपनी व्यथा को मुखर करता हुआ दिखायी पड़ता है। प्रस्तुत कहानी से स्पष्ट होता है कि समाज में जिनका कब्ज़ा पहले से बना आ रहा है। वे ही आज भी बिना श्रम किए सारे सुख भोग रहे हैं।

जिनके पास ज़मीन नहीं है उन्हें ज़मीन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विनोबा भावे के नेतृत्व में बनाई गयी पद्धति है भूदान। असल में इस भूदान पद्धति की परिणति भी वही हुई जो अन्य योजनाओं की हुई थी। ‘भूदान’ कहानी में रामजतन को हलवाही में ठाकुर से एक बीघे ज़मीन मिली थी। अब वह ज़मीन उसके नाम सिकमी लग गयी है। ठाकुर उस ज़मीन को हथियाना चाहता है। वह रामजतन को धमकाता है तथा भूदान पद्धति से भूमि दिलाने के लालच देता है। इस प्रकार वह भूमि हड़प लेता है। ठाकुर अच्छी तरह जानता है कि किसान के पास उनसे मुकदमा लड़ने का सामर्थ्य नहीं है। इसलिए ठाकुर के कहने पर किसान को अपनी ज़मीन छोड़ना पड़ता है। कहानी में रामजतन अपनी हालत का बयान यों करता है – “हाँ दादा, ठाकुर ने दस बिगहा भूँयदान में दिया है। कहने लगे ‘क्यों मुझसे रार मोल लेते हो, आखिर में मुकदमा लड़ा कर परेशान कर दूँगा और तुम्हें मेरे खेत की सिकमी से हाथ खींचना पड़ जाएगा। चुपचाप इस्तीफा दे दो, मैं तुम्हें पाँच बिगहे भूदान से दिला दूँगा।’ मुझे बात अच्छी लगी दादा और जानते हो, मेरे पास उनसे मुक़दमा लड़ने की सामरथ नहीं है।”5 भूदान की ज़मीन के चक्कर में रामजतन अपने नाम पर लगी एक बीघे भूमि ठाकुर को वापस देता है। आख़िरकार रामजतन को भूदान की पाँच बीघे ज़मीन मिल भी जाती है। लेकिन ठाकुर के जिस दान से उसे भूमि मिली थी वह केवल पटवारी के कागज़ पर थी। कहानी केवल भूदान पद्धति के छल को उजागर नहीं करती वरन् यह स्पष्ट करती है कि सामंतों ने इसे अपनी सिकमी के नाम पर चली गयी भूमि को पुनः हासिल कर लेने के लिए एक कारगर हथियार के रूप में इस्तमाल किया है। जहाँ तक मार्कण्डेय की कहानियों का सवाल है “उनकी पैनी निगाहों ने यूँ तो गाँव की धरती को उसकी सारी समस्याओं के साथ प्रस्तुत किया है; किंतु गाँवों के सामंती ढाँचे से सीधी जुडी हुई जो भूमि और भूमि संबंधों की समस्या है, वह उनकी कहानियों में प्रमुख बनकर उभरी है। ये कहानियाँ गहराई पर जा कर इस एक तथ्य को पूरी अहमियत के साथ उभार कर सामने लाती है कि आज़ादी के इतने अर्से बाद भी इस समस्या का कोई कारगर हल नहीं निकला।”6

कृषक संस्कृति में पशु पालन का गहरा महत्व है। किसान की जिंदगी में पशुओं का संबंध उत्पादन के अलावा भावना से भी जुड़ा होता है। उन्हें अपने बैल संतानों की तरह प्यारे होते हैं। मार्कण्डेय की कहानी ‘सवरइया’ बैल और किसानी परिवार के बीच के आत्मीय लगाव को दर्शाती है। जिस दिन सवरइया (बैल) महाराजिन के घर आया था। उसके लिए नए रंग-बिरंग पगहे आदि खरीदे गए थे। गरीबों को भोजन भी दिया गया था। सवरइया के बीमार पड़ने पर कन्नों के पिता सारी रात खूँटा पकडे बैठता रहता है। महाराजिन उसकी पुत्रवत् देखभाल करती है। पति के मरने के बाद पट्टीदार महाराजिन के साथ छल करके उसकी खेती को छीन लेता है। साथ ही सवरइया को भी हडपने की चाल चलता है। पट्टीदार कर्ज उतारने के लिए इस कदर तंग करते हैं कि महाराजिन विवश होकर बैल को उसे देने की बात सोचती है। बैल को बेचने की बात तो वह कदापि नहीं सोच सकती। अंत में वह शीशफूल बेचने का निश्चय करती है। वह सोचती है –“शीशफूल रख दूँ, क्या करुँगी? लेकिन वही तो उनकी निशानी है, तो क्या सवरइया, सवरइया.......?  नहीं, इसे नहीं बेच सकती।”7 बैल के लिए महाराजिन अपने स्वर्गीय पति की आखिरी निशानी शीशफूल गिरवी रखती है। फिर भी सवरइया महाराजिन से छीन लिया जाता है। उसे खो कर महाराजिन जड़वत हो जाती है। उधर सवरइया भी अपनी मालकिन से अलग होकर खाना पीना त्याग देता है। महाजन सभ्यता में शोषण से पशु तक को मुक्ति नहीं है। ‘संवरइया’ प्रेमचंद की ‘दो बैलों की कथा’ शीर्षक कहानी की याद दिलाती है और प्रेमचंद की परंपरा के साथ मार्कण्डेय के रिश्ते को रेखांकित करती है।

किसान की मेहनत पर किसी को कोई संदेह नहीं। खेत में हाड़तोड़ मेहनत करके ही वह अपने जीवन को आगे बढ़ाता है। मेहनत किसानी जीवन की संस्कृति है। मार्कण्डेय की ‘दौने की पत्तियाँ’ कहानी मेहनती किसान की यथार्थ तस्वीर पेश करती है। कहानी में लिखा गया है – “वह मेहनत कर के खाता है। पसीना जला कर मिट्टी से अन्न जुटाता है। फिर उसके लिए दुःख कैसा।”8 किसान अपने खेती-बाड़ी में कड़ी मेहनत करने के बावजूद बेहद खुश रहता है। क्योंकि खेत के साथ उनका आत्मीय लगाव होता है। लेकिन खेत के बाहर उसका मन उतना नहीं जमता। खेत के बाहर काम करने पर वह जल्दी ही थक जाता है। ‘भूदान’ कहानी में ठाकुर के कुचक्र से भोला को हलवाही छोड़ना पड़ती है। वह मज़दूर बन कर नहर की खुदाई में फावड़ा चला रहा है। “....फावड़ा चलाते चलाते उसका शरीर सुख कर काँटा हो गया है।  महीने भर से साँस की बीमारी के कारण वह चारपाई में पड़ा हाँफ रहा है, बार-बार उसकी साँसे बढ़ जाती है। उसका शरीर  काँपने लगता है।”9 किसान का मन खेत से इस कदर जुड़ता है कि मेहनत की थकावट भी वह भूल जाता है।

किसान की ऐसी बदहाली है कि वह कड़ी मेहनत करने के बावजूद साल भर के लिए अन्न जुड़ा नहीं पाता। ऊपर से लगान की कर्ज और सुखा एवं बाढ़ का प्रकोप। जिस से उनका जीवन और अभावग्रस्त बन जाता है।  ‘बादलों का टुकड़ा’ महाजन के कर्ज से दबे एक भूमिहीन किसान के अभावमय जीवन की ओर इशारा करता है। चिलचिलाती धूप, चारों ओर सूखा और घर में कुपोषित की तरह छोटा सर और सपाट पेट वाला बीमार बच्चा कुनाई बिस्तर पर पड़ा है। वह लगातार पतली आवाज़ में रोता रहता है। एक ओर कुनाई भूख के कारण जिन्दगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा है तो दूसरी ओर उसका बाप भूख की आग से पेट में उठनेवाली मरोड़ से हैरान दिखता है। वह भली-भांति जानता है कि यह भूख की आग पानी से नहीं बुझेगी।  फिर भी वह बार-बार पानी पी कर जीवित रहने की कोशिश करता है। बच्ची के लिए थोड़ी दूध देने वाली बकरी को कारिंदा कर्ज की वसूली के रूप में खोल कर ले जाता है। कहानी में एक ओर अकाल और भूख तथा दूसरी ओर लगान की कर्ज से दबे इस किसान परिवार का चित्र पाठक को द्रवित किए बिना नहीं रहता। यह महज एक किसान परिवार की नहीं अपितु ऐसे अनेकों परिवार की कहानी है। अभावग्रस्त जीवन बिताने के लिए वह अभिशप्त है।

मौसमी परिवर्तन की वजह से खेती चौपट होती है और किसान को बहुत नुकसान सहना पड़ता है। प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले किसान की खेती-बाड़ी के नुकसान के लिए सिर्फ प्रकृति को ही दोषी ठहरना सही नहीं है किसान की बदहाली के लिए हमारी शासन व्यवस्था भी जिम्मेदार है।  सिंचाई की उचित प्रबंध करना तथा विकास योजनाओं से किसान को लाभ उठाने का मौका देना चाहिए। लेकिन सरकार किसानों की परेशानियों को नज़रअंदाज़ करती रहती है। ‘बातचीत’ कहानी में सरकार की निष्क्रियता की ओर आवाज़ उठायी गयी है। इस कहानी में गजाधर रामु से कहता है – “जानते हो, जिस देश का राजा पापी होता है, वहीं झुरा पड़ता है, अकाल आता है। भुखमरी होती है। जल्दी-जल्दी गहना-गीठों बेच कर ऊसर-पापर तो लिखा लिया। उसमे धान क्या होगा। ख़ाक! सरकार से कहो, पानी का भी इन्तिजाम करें।”10 अकाल और भुखमरी से पीड़ित किसान सरकार की तरफ से सहायता की प्रतीक्षा में रहता है। लेकिन उनके नसीब में निराशा ही लिखी है।

सरकार की तरफ से सिंचाई की व्यवस्था होती है तो भी वह ठीक तरह से लागू नहीं होती। इस तथ्य की पड़ताल मार्कण्डेय की ‘दौने की पत्तियाँ’ कहानी में की गई है। कहानी में इसका चित्रण है कि पंचवर्षीय पद्धति के अंतर्गत गाँव में नहर आती है। अमीर तिवारी के खेत पर आकर काम रुक जाता है। अपने बारह बिगहा खेत को बचाने के लिए तिवारी इंजीनियर को घूस दे कर तथा मंत्री से सिफारिश करवा कर नहर का रुख बदलवा देता है।  जिस से भोला का पूरा खेत नहर के पेट में समा जाता है, जिसे वह पाँच वर्षों तक आधे पेट खाकर खरीदा था। “योजना विकास के परिप्रेक्षय में भष्टाचार के ऐसे उदहारण अपवाद नहीं है और भोला कोइरी जैसे कोटि-कोटि दीन-हीन जन स्वातंत्र्योत्तर विकास के रथ-चक्रों में पिस गए हैं। उनके पास उत्कोच के लिए धन-दौलत तो क्या अपने लिए दौने की पत्तियाँ भी नहीं रह गई।”11 भारत की राजनीति पर पूँजीपतियों और नौकरशाही की पकड ने विकास योजनाओं को लागू करने में बाधाएँ उत्पन्न कर दी। स्वातंत्र्योत्तर भारत में बनाई गयी ज्यादातर विकास योजनाऐं विफल ही रही हैं।

‘बीच के लोग’ मार्कण्डेय की 1975 में प्रकाशित अंतिम कहानी संग्रह की महत्वपूर्ण कहानी है। इस कहानी तक आते-आते किसान खेत मज़दूरों का जीवन संघर्ष कुछ बदली हुई परिस्थितियों में दिखाई देता है। कहानी में बीच के लोग के रूप में है फउदी दादा। मनरा पढ़े-लिखे युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है। रामबुझावन मनरा का पिता है। वह पिछले आठ बरस से खेत-जोत रहा है। सिकमी कानून के अनुसार तीन साल के बाद ज़मीन जोतेदारों के नाम पर होगा। सामंत हरदयाल उस ज़मीन को हथियाने पर तुले है। मनरा इसका विरोध करता है जिस से गाँव में सामन्तों के प्रति संघर्ष होने वाला है.....। लेकिन बीच में ही फउदी दादा समझौते के लिए टपक पड़ता है।  मनरा सब की चाल समझता है। उसके सामने फउदी दादा को बीच से हटना पड़ता है। मनरा कहता है – “अच्छा हो कि दुनिया को जस की तस बनाए रखने वाले लोग अगर हमारा साथ नहीं दे सकते तो बीच से हट जाएँ, नहीं तो सबसे पहले उन्हीं को हटाना होगा। क्योंकि जिस बदलाव के लिए हम रोपे रोजे हुए हैं, वे उसी को रोके रहना चाहते हैं।”12 मनरा का यह कथन किसानों के बीच उठने वाली वह चेतना है जो जस की तस के स्थान पर परिवर्तनकामी है। प्रस्तुत वक्तव्य पात्र का नहीं लगता, बल्कि खुद मार्कण्डेय का सन्देश प्रतीत होता है।

स्वातंत्र्योत्तर भारत के खेतिहर समाज को जिस गंभीरता से मार्कण्डेय ने  अपनी कहानियों का आधार बनाया है, वह उस समय की अनिवार्यता थी।  आज भी यह खेतिहर समाज तरह–तरह के संकटों से गुज़र रहा है। पिछले कुछ सालों में किसानों से हज़ारों एकड़ ज़मीन राष्ट्र के औद्योगिक विकास के लिए छीनी गई है। विकास के लिए अपने पुरखों की खेती बेच देने से किसानों का अपना कौन सा हित सिद्ध होगा? किसानों के बच्चे ऐसे पढ़-लिख नहीं पाते है कि उन्हें अच्छी नौकरी हासिल होती। कृषि क्षेत्र से विस्थापित जन अमानवीय स्थितियों में काम करने के लिए मज़बूर हैं। कर्ज से दबे किसानों की आत्महत्या की तादाद भी बढ़ गयी है। ऐसे मौके पर आज गलती से भी भारत को कृषि प्रधान देश कहना जायज़ नहीं होगा, जब कि आज भारतीय आबादी के एक बड़े हिस्से की आजीविका कृषि से जुडी है।  किसान महसूस कर रहे हैं कि राष्ट्र उनके साझे खड़ा नहीं है। ऐसे सन्दर्भ में इस हालात के बदलाव के लिए किसान संगठित हो रहे हैं। नंदीग्राम और सिंगूर की घटनाएँ हमें सोचने के लिए मज़बूर करती हैं कि, क्या बिना चीखे चिल्लाए और बिना खून बहाए, इस लोकतांत्रिक राष्ट्र में किसानों को कुछ भी नहीं मिल सकता? विकास योजनाओं के आलोक में भी अँधेरे में रहने के लिए अभिशप्त है किसान एवं खेतिहर मज़दूर। इनकी खोज खबर लेने वाले मार्कण्डेय को किसान-खेतिहर मज़दूरों के तरफदार कहानीकार के अलावा और क्या कहा जा सकता है? मार्कण्डेय की यह किसान चेतना काबिले तारीफ़ है।   

 
संदर्भ

1.     प्रकाश त्रिपाठी (संपादक), मार्कण्डेय, परंपरा और विकास, पृ : 146  
2.     मार्कण्डेय, मार्कण्डेय की कहानियाँ, भूदान, पृ : 276
3.     मार्कण्डेय, मार्कण्डेय की कहानियाँ, भूदान, पृ : 192
4.     मार्कण्डेय, मार्कण्डेय की कहानियाँ, भूदान, पृ : 192
5.     मार्कण्डेय, मार्कण्डेय की कहानियाँ, भूदान, पृ : 276
6.     डा. शिव कुमार, दर्शन साहित्य और समाज, पृ : 184
7.     मार्कण्डेय, मार्कण्डेय की कहानियाँ, सवरइया, पृ : 25
8.     मार्कण्डेय, मार्कण्डेय की कहानियाँ, दौने की पत्तियाँ, पृ : 199-200 
9.     मार्कण्डेय, मार्कण्डेय की कहानियाँ, भूदान, पृ : 278
10.   मार्कण्डेय, मार्कण्डेय की कहानियाँ, बातचीत, पृ : 206
11.    डॉ. विवेकी राय, स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कथा साहित्य और ग्राम जीवन, पृ : 194
12.     मार्कण्डेय, मार्कण्डेय की कहानियाँ, बीच के लोग, पृ : 495



सम्पर्क-
शोध छात्रा
कोच्चिन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय
कोच्चिन – 22, केरल।

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