प्रज्ञा सिंह की कविताएँ


प्रज्ञा सिंह

इस दुनिया की खूबसूरती को बचाए रखने का काम वाकई रचनाकारों ने ही किया है. उन्होंने वह सौन्दर्य-दृष्टि बचाए रखी है जिसमें ताकतवर विधायक के महलनुमा घर की बजाए झोपड़ियों को झिलमिल सितारे की तरह देखने का हुनर है. यह सौन्दर्य दृष्टि यूँ ही प्राप्त नहीं होती. कवयित्री प्रज्ञा सिंह ने इस दृष्टि को प्राप्त किया है. उन्हें पता है कि आज जो अपने भारत की तस्वीर है वह मेहनतकश लोगों के दम पर बनी संवरी है. इसीलिए वे यह चुभने वाला सवाल पूछ पाती हैं 'अगर भारत माता गौरांगी हैं/ तो ये सांवली कत्थई औरतें कौन है?' आज पहली बार पर प्रस्तुत है कवयित्री प्रज्ञा सिंह की कुछ नयी कविताएँ जिनमें अपना एक अलग सौन्दर्य बोध आपको जरुर दिखाई पड़ेगा.        


प्रज्ञा सिंह की कविताएँ 

सौन्दर्य-बोध

शहर में घर
एक विधायक का
उसकी रेलिंग में
एक स्टील का राड
किसी मजदूर के
धैर्य सा गडा है
ये बेहूदा सौन्दर्य-बोध ससुरा
कि हर बार की तरह
इस बार भी जिद पर
अड़ा है
कि इस शानदार महल के
आस-पास झोपड़ियों का
झिलमिल सितारा जड़ा है


हम भलमनसाहत की बहुत गहरी खाईयों में सोये हुये लोग

किसी पुराने घाव की
टीस की तरह
उभरता है सूरज
नियत समय
स्थान पर
नियत हैं सारी मक्कारियां
बेइमानियां
व्यवस्था की मशीन
किसी खुंखार शेर की तरह
गुर्राती है
तंग हथेलियों की कैद में
पसीजती रेजगारियां
पान की पीक की तरह
एक मेज से दूसरी मेज पर
थूकते हुये लोग
सूर्य पर नहीं थूकना चाहते
सूर्य के ठीक नीचे
अपना भौचक मुंह थामे
एक बेबस आदमी
कतराता है
अपना ही बांया हाथ
दायें हाथ को सौंपने से
संदेह है
(
कहां नहीं है)
कि पता नहीं कब दायां हाथ
गधे में बदल जाये
और बायें हाथ को
घास की तरह चरने लगे
पता नहीं कब दायीं आंख
बायीं आंख के चरित्र पर
सवाल उठा दे
हालांकि सवाल उठाने की
सही जगह पर फिरा
दिये गये हैं बुलडोजर
उत्तर की आंख पथराये
एक जमाना हुआ
सभ्य और शालीन बने रहना
विवशता है
या हैं ही हम भलमनसाहत की
बहुत गहरी खाईयों में
सोये हुये लोग
कुछ तय नहीं होता
(
कौन तय करेगा)



ये सांवली कत्थई औरतें कौन है?

ये श्वेत वसन धारिणी
गौरांगी
भारत  माता कौन है?
मैंने खेत की मेडों पर
डगमग कदम वाली
सांवली कत्थई औरतों को देखा है
उनकी झुलसी पीठ पर
दोपहर के सूरज को
छोटे बच्चे सा झूलते देखा है
मैं ने देखा है
उन्हें गीतों के लय पर
धान रोपते
मैं ने उनके अधखुले सूखे स्तनो को चूसते भूखे बच्चों को देखा है
मैं पूछती हूँ
अगर भारत माता गौरांगी हैं
तो ये सांवली कत्थई औरतें कौन है?


ये अचानक ही हुआ

तुम चाहते हो कि मैं दुनियां से प्यार करूं
मेरी सात पुश्तों ने यही चाहा था
मैं भी चाहती थी कि
टीस की तरह उठती यातनाओं की
सारी कहानियां भुला दी जायें
और दुनियां के सबसे बेहतरीन
प्रेम गीत को फिर से
गुनगुनाया जाये
मेरे अज्ञात दोस्त
मैं चाहती थी
और दिल से चाहती थी
कि बरगद की तरह तुम्हारा हाथ
मेरे कंधे पर उग आये
मैं चाहती थी
(मेरे चाहने से कारागारों की दिवारें नहीं दरकतीं)
ऐसे ही जैसे कि कोई भी चाहता है
कि बोगेनबेलिया की सघन झाङियां में
बचा रहे
छोटी चिड़िया के घोंसले भर जगह
अजीब बात है कि तुम मेरी ही तरह सोचते थे
खेत जोतने में जुटे  बैल के जुआठ की
तरह कंधे बदलने के लिये
हम प्रेम करना चाहते थे
ये अचानक ही हुआ कि फनफनाते हुये
गेंहुअन सांप की तरह एक दूसरे
की पूंछ पर हमने पैर धर दिया
और  संभावनाओं के बारे में सोचना बंद कर दिया




एक दिन

हवा थी
पानी था
और एक जिद थी
कि तहखानों में कैद
हंसी को हम आजाद करेंगे
फाख्तों की फङफङाहट की
जैसी खिलखिलाहटों से भर देंगे
आकाश का हृदय
हम सन्नाटे से भरे जंगलों को
हरे पत्तों के गीत से पाट देंगे
बस एक दिन की दूरी पर होती हैं मंजिलें
और पैरों के आकार कहीं भी गढ लेते हैं रास्ते
खूटियों में अटके थे दाने
बेसबब चिङिया की दरख्वास्त इस मेज से
उस मेज पर भटकती रही
एक दिन हम कहीं दरख्वास्त नहीं देंगे
एक दिन अभिशापित देवताओं के
अनिधिकृत हस्तक्षेप को खारिज करेंगे
और हत्यारी खूटियों को चीर कर
निकाल लायेंगे चिङियां का दाना


शहर सोता नहीं

दबे पांव आती है
शहर में रात
और लगभग लगभग झपट्टा मारते हुये
शहर को अपने आगोश में भर लेती है
शहर तो श्राप है कि
शहर  सोता नहीं है
पूरा का पूरा पैसे में
बदल जाने की जिद में
दिन से रात
और रात से दिन के बीच
हांफता हुआ शहर
चौराहों पर टांगता है
उजालों की लालटेन
जिसकी रोशनी बहुत कम
दूर जा कर
खरगोश की तरह दम तोङ देती है
और यहां एक सेल्समैन की मां
गली की आखिरी छोर तक रोप देती है
अपनी आंखें
दरवाजों को बन्द करने के भ्रम में
खुला छोङ देती है


मैं चाहती हूं

सुन्दरी!
तुम्हारे बालों में लगी
हरी धानी क्लिपें
दुनियां में बहुत कम चीजें हैं
जो बिल्कुल सही जगह पर हैं
जैसे मां के हाथ में बच्चे की अंगुली
जैसे पेड़  से बिछडे पत्ते  का
एक कतरा हरापन
चीजें बहुत तेजी से अपना रंग और
आकार खो रहीं हैं
लगभग बेमानी होता जा रहा है
चीजों का एक दूसरे के साथ होना
बहुत मुश्किल हो गया है
शहर में छाते और बरसात को
एक साथ देखना
किसी दोस्त को पास से देखना
ऐसे में जब एक आदमी
अपने भीतर के आदमी को लेकर
संशयग्रस्त है
सुन्दरी
मैं चाहती हूं
तुम्हारे बालों में हरी धानी क्लिपें
हमेशा बनी रहें



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.) 

टिप्पणियाँ

  1. सभी कविताएँ बहुत अच्छी हैं। बेचैन करती ,सवाल पूछती कविताएं हैं जिनसे हाथ छुड़ाकर निकलना मुश्किल है।
    बधाई बहुत।

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