अरुणाभ सौरभ की लम्बी कविता 'आद्य नायिका' की जगन्नाथ दुबे द्वारा की गयी समीक्षा



अरुणाभ सौरभ

लम्बी कविताएँ किसी ऐसे लम्बे विचार प्रक्रिया की परिणति होती हैं जिसे लम्बी कविताओं में ही व्यक्त किया जा सकता है। लम्बी कविताएँ साध पाना आसान नहीं होता। उसे साधने के लिए कथ्य के साथ-साथ लय, छन्द, बिम्ब के साथ-साथ शब्द योजना का ध्यान भी रखना होता है। जान-बूझ कर शब्दों को ठूस-ठूस कर भरने मात्र से लम्बी कविता नहीं बनती। लम्बी कविता में भी शब्दों की मितव्ययिता का वही मतलब है जो छोटी कविताओं में। युवा कवि अरुणाभ ने इधर 'आद्य नायिका' शीर्षक से एक लम्बी कविता लिखी है जो चर्चा में रही है और जिसे पक्षधर ने पुस्तिका के रूप में प्रकाशित भी किया है। युवा साथी जगन्नाथ दुबे ने इस कविता की समीक्षा की है। प्रस्तुत है जगन्नाथ दुबे की समीक्षा 'विचार फिर-फिर मारा गया हत्या हुई कला की'        

विचार फिर-फिर मारा गया हत्या हुई कला की



जगन्नाथ दुबे

युवा कवि अरुणाभ सौरभ की लम्बी कविता 'आद्य नायिका' इधर बीच चर्चा में है। अपने स्वरूप में हिन्दी की यह सबसे लम्बी कविता पक्षधर पत्रिका की विशेष प्रस्तुति के रूप में प्रकाशित हुई है। इस कविता का केन्द्र-विन्दु दीदारगंज की वह यक्षिणी है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह मौर्यकालीन एक स्त्री की प्रस्तर मूर्ति है जो 1917 में गंगा नदी के पास खुदाई में प्राप्त हुई है। इस मूर्ति की प्राप्ति के बाद से अब तक लोक-मानस में भी मूर्ति की तमाम कथाएं बस चुकी हैं जिनमे सबसे प्रभावी कथा यह है कि यह मूर्ति मौर्य युग की सर्वाधिक सुंदर यक्षिणी की मूर्ति है जो दीदारगंज की यक्षिणी के नाम से प्रसिद्ध है। अरुणाभ इस मौर्ययुगीन प्रस्तर मूर्ति के ऐतिहासिक और मिथकीय रूप को एकमेक करके कुछ इस तरह पेश करते हैं कि वह ऐतिहासिक और मिथकीय से ज्यादा समकालिक लगने लगता है।  विशाल मौर्य साम्राज्य के पतन और शुंग वंश के उदय की पृष्ठभूमि की  जैसी व्याख्या अरुणाभ यहाँ करते हैं वह उनकी वर्गीय पक्षधरता और राजनैतिक चेतना को स्पष्ट करता है। शुंग वंश का अभ्युदय भारतीय इतिहास में एक सामान्य घटना नहीं है। जिस तरह पुष्यमित्र ने राजाज्ञायें जारी कर के बौद्ध भिक्षुओं के सर कलम करवाये उसे हो सकता है एक इतिहासकार भुला दे या इतिहास के नए व्याख्याता उसे उलट दें लेकिन एक स्व-विवेकी कवि-मन तो उस कृत्य के लिए पुष्यमित्र को कभी नहीं क्षमा कर सकता। वृहद्रथ के ट्रेजिक अंत और पुष्यमित्र के अमानवीय उदय के बीच मानवीय-मूल्य, संस्कृति, कला और साहित्य  के समक्ष जिस तरह के संकटों की शिनाख्त आद्य नायिका में की गयी है वह आज की तारीख में ज्यादा मौजू लगती है। यक्षिणी के सौंदर्य पर मुग्ध उसका प्रेमी यक्ष उसे एक ऐसी दुनिया में ले जाना चाहता है जहाँ मगध जैसी अमानवीयता न हो। वह उसे यक्ष लोक ले जाना चाहता है। वह इस तरह की अमानवीयता से डरा हुआ है। उसे आशंका है कि यह यक्षिणी जिसके स्वभाव में ही है सवाल करना उसकी ये हत्यारे शासक हत्या कर देंगे। वह कहता है –

इसीलिए यह यक्ष 
तुम्हें
इस
हत्याओं के देश से
स्वतन्त्र करने
कहीं दूर ले जाने
आया है।

इस पूरे प्रकरण में यक्ष के कहे को ऐतिहासिक या मिथकीय आख्यान की शक्ल से अलग जरा एक प्रेमी की नजर से पढ़ने की कोशिश कीजिये। एक ऐसा समाज जिसमे प्रेम करने पर तमाम तरह की बंदिशें लगी हुई हों इसे उस समाज के एक प्रेमी की पीड़ा के रूप में पढ़ना क्या अपने तमाम लोकतान्त्रिक होने की घोषणाओं पर सवालिया निशान नहीं है? यह कविता अपने समय और समाज के कई ऐसे जरुरी सवालों को उठाती है जिस पर अनिवार्य रूप से बहस होनी ही चाहिए। अपने कथ्य में ऐतिहासिक होने के बाद भी अपने सरोकार में यह कविता युगीन संदर्भों और सवालों को ही प्रमुखता से उठाती है। अपने अंतिम रूप में यह कविता न तो मौर्य साम्राज्य को एक जनपक्षधर और आदर्श साम्राज्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास करती है और न ही पुष्यमित्र शुंग को एक खलनायक घोषित करने की कोशिश ही करती है। ऐसा इसलिए भी कह रहा हूँ क्योंकि ऊपरी तौर पर कविता की व्याख्या इन्ही आधारों पर होने की गुंजाइश बनती दिख रही है लेकिन उसकी भीतरी तहों में जाने पर यह बहुत साफ़ तौर पर दीखता है कि कविता किसी ऐतिहासिक राजवंश की महिमा का बखान या किसी व्यक्ति की आलोचना नहीं है बल्कि दो भिन्न तरह की विचार-सरणियों के भीतर से अपना युग-बोध निर्मित करने की एक सफल कोशिश है। कविता के भीतर कई जगह पुष्यमित्र शुंग की बहुत तीखी आलोचना दिखती है। उसे कोई चाहे तो एक खास वर्ग की आलोचना कह सकता है लेकिन कविता अपनी मजबूत वर्गीय  चेतना के बाद भी युग-बोध का निर्माण और विकास करती है और किसी भी युग का युग-बोध सामासिकता पर बल देता है। वह वर्गीय चेतना के साथ सामासिक सामाजिक-संरचना के निर्माण और विकास की बात करता है। 

अरुणाभ की इस कविता को हिन्दी की लम्बी कविताओं की परम्परा में ही रख कर समझने से इसका  ठीक-ठीक अर्थ खुलता है। दुनिया भर की तमाम भाषाओँ में लम्बी कविताएं आधुनिक युग की देन हैं। आधुनिक-पूर्व युग में लम्बी कविता के स्थान पर महाकाव्य लिखे जाते रहे हैं। इसे उलट कर ऐसे भी कह सकते हैं कि महाकाव्यों  के ध्वंस से लम्बी कविताओं का जन्म हुआ। महाकाव्य के अंत और लम्बी कविता के प्रारम्भ की अपनी खास वजहें हैं जिन पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। उस पर बात का यहाँ कोई सीधा संदर्भ भी नहीं बनता इस लिए उसपर बात फिर कभी यहाँ सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि प्रत्येक समय का रचनाकार अपने युगीन यथार्थ को व्यक्त करने के लिए नए काव्य-रूपों की तलाश करता है। लम्बी कविता आधुनिक रचनाकार की उसी तलाश का परिणाम है।

हिन्दी में लम्बी कविताओं के प्रस्तोता के रूप में अगर हम निराला का नाम लें तो उनकी कम से कम तीन  लम्बी कवितायेँ (राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति और तुलसीदास) हमारे सामने मौजूद हैं। पंत की कविता परिवर्तन और पहले आ चुकी थी और कई अलोचकों ने उसे हिन्दी की पहली लम्बी कविता होने का दावा किया है।  राम की शक्तिपूजा से ले कर अब तक हिन्दी में सैकड़ों लम्बी कविताएँ लिखी जा चुकी हैं और लगातार लिखी जा रही हैं।

पिछले दो-तीन वर्षों के अंदर अनुज लुगुन की 'बाघ और सुगना मुंडा की बेटी', हुकुम ठाकुर की 'युद्ध', शरद कोकास की 'देह', अरुण कमल की 'प्रलय', सुधांशु फ़िरदौस की 'कालिदास का अपूर्ण कथागीतऔर अरुणाभ की विवेच्य कविता 'आद्यनायिका' प्रमुखता से उद्धृत की जाने वाली कविताएँ हैं।  इन विभिन्न संदर्भों पर लिखी गयी कविताओं को एक साथ पढ़ने से हमारे अपने समय का एक बहुत साफ़ चित्र उपस्थित होता है। इन कविताओं में जो एक बात मुझे कामन दिखती है और ऐसा नहीं है कि वह बात छोटी कविताओं में या अन्य विधाओं में नहीं है पर इनमे ज्यादा मजबूती से उभर कर सामने आती है वह है इनका मुखर राजनैतिक-सरोकार। ये कविताएँ अपने राजनैतिक-सरोकारों में बहुत स्पष्टवादी हैं। कविताओं से यहाँ उद्धरण दे पाना मुश्किल है पर इन्हें पढ़ते हुए ये चीजें आसानी से लक्षित की जा सकती हैं।

अरुणाभ की कविता आद्यनायिक का कई तरह से पाठ किया जा सकता है। कई बार तो मुझे लगता है कि इस एक कविता में कई कवितायेँ शामिल हैं। यह कविता न होकर कविताओं का एक कोलाज हो जिसमे कई तरह की कविताएँ हों। यह इस लिए नहीं कि कविता में कहीं से झोल जैसा कुछ हो जहाँ से इन्हें अलगाया जा सके यह इस लिए क्योंकि इसमें कहन के कई रूप विद्यमान हैं। जैसे कविता का पांचवा हिस्सा जिसमे सुग्गी का संदर्भ आता है कविता का यह हिस्सा बेहद नाटकीय है। कोई चाहे तो इसका नाट्य-रूपांतरण  करके एक नुक्कड़ नाटक का रूप दे सकता है। इसी तरह कविता का छठा हिस्सा गहन वैचारिक हिस्सा है। यही वह हिस्सा भी है जहाँ मुक्तिबोध की कहन शैली का प्रभाव स्पष्ट तौर पर रेखांकित किया जा सकता है। यहाँ यह ध्यान रखने की जरूरत है कि यह प्रभाव नकल के शिल्प में न हो कर अपने पुरखे कवि के दाय के रूप में आया है।

बारह खण्डों में बंटी हुई इस कविता को हिन्दी की सबसे लम्बी कविता होने का गौरव प्राप्त है। यह कविता अपनी बनावट में जितनी विस्तृत है अपनी बुनावट में उतनी ही गहरी भी। अरुणाभ जहाँ यक्षिणी का नख-सिख वर्णन करते हैं वहां और जहाँ यक्ष अपना परिचय देता है वहां कविता में आवेग सबसे ज्यादा प्रबल रूप में व्यक्त हुआ है। 

यक्षिणी के सम्पूर्ण रूप-सौंदर्य का बखान कर चुकने के बाद यक्ष कहता है –

तुम मौर्य काल की 
सबसे सुंदर प्रतिमा
जिसकी निर्बन्ध सुंदरता

के आगे
वैशाली की आम्रपाली तुच्छ है
चाणक्य की चतुराई व्यर्थ है
व्यर्थ धनानंद
व्यर्थ मुद्राराक्षस
व्यर्थ चन्द्रगुप्त
निरर्थक अजातशत्रु का
अखंड साम्राज्य
निरर्थक
बिम्बिसार
निरर्थक सम्राट अशोक
निरर्थक बुद्धत्व
निरर्थक मौर्यकाल।
तुम्हारे होठों के कोर से आती
क्षीण हंसी-रेखा के आगे
फीका है धम्मम-शरणम्।

अब कोई चाहे तो सवाल कर सकता है कि इस तरह की आसक्ति का क्या आशय? या कि यह तो सर्वथा एक गैर-आधुनिक मानसिकता का परिचायक है लेकिन उसे यह भी ध्यान रखना होगा कि कविता की ये पंक्तियाँ आगे आने वाली अमानवीय मानसिकता  को व्यक्त करने में सहायक होंगी। जिस यक्षिणी के बारे में यक्ष का यहाँ यह कथन है उस यक्षिणी के रहवास मगध की क्या दशा बना डाली है वहां के शासकों ने उसे आगे के खण्डों में कविता बहुत मजबूती से रेखांकित करती है।

कविता में पुष्यमित्र शुंग सर्वथा एक अमानवीय  प्रवृत्ति का परिचायक है। उसके सत्ता सँभालते ही पूरी व्यवस्था में अराजकता का माहौल पैदा हो गया। ब्राह्मणों ने पूरी सामाजिक व्यवस्था पर अधिकार कर लिया। उसने अलग राय रखने वालों का सर कलम करने का आदेश दे दिया। इसी तरह के और भी बहुत सारे कार्य हुए जो उसकी नृशंसता को ही दर्शाते हैं। यह सब कुछ पुष्यमित्र के समय में हुआ था या नहीं यह तो बहुत ठोस तरीके से नहीं कह सकता लेकिन पुष्यमित्र का रूपक आज ज्यादा कारगर साबित हो रहा है।

इस कविता को पढ़ते हुए कुछ सवाल सहज ही मन में उठते हैं जैसे कि पहला सवाल तो यही कि कविता का शीर्षक आद्यनायिका ही क्यों? वह भी तब जबकि इस रूपवती यक्षिणी के बहाने कवि का ध्येय कुछ और ही कहने का है। कविता का ध्वन्यार्थ उसके सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों में है। (यह तो आप भी मानेंगे ही कि कविता में ध्वन्यार्थ ज्यादा महत्वपूर्ण  होता है।) तो फिर आद्यनायिका शीर्षक कुछ खटकता नहीं है? ये तो साफ है कि कवि का लक्ष्य  मौर्यकालीन ऐतिहासिकता पर बात करना नहीं है। न ही वह यक्षिणी और यक्ष की कथा ही कहने को बैठा है। हो सकता है औरों की नजर में इस कविता के और तमाम आशय हों लेकिन मैं तो साफ़ कहना चाहता हूँ कि आद्यनायिका एक विशुद्ध सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों से जुडी हुई कविता है। किसी व्यक्ति का महत्व यहाँ उतना ही है जितना कि  समाज में एक व्यक्ति की सामाजिक हिस्सेदारी होती है। मुझे  उससे ज्यादा की गुंजाइश बनती हुई नहीं दिखती। 

अरुणाभ अपने सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों को ले कर कई जगह बहुत मुखर हो कर सामने आते हैं। ऐसी जगहों पर वे 'ओ स्साला बिहारी' कविता में व्यक्त गुस्से की याद ताजा कर जाते हैं। अपने पृष्ठीय आंकड़े मे यह नब्बे पृष्ठ के आस पास की लम्बी कविता है। इतनी लम्बी कविता को  साध पाना किसी युद्ध सरीखी चुनौती से कम नहीं है। जिस तरह की लयात्मक गतिमयता इस कविता में हासिल हुई है वह दुर्लभ है। समकालीन हिन्दी कविता को जितना कुछ पढ़ पाया हूँ उससे मेरी जो राय बनती है उस आधार पर राजनैतिक कविताओं में क्रांतिकारी और बहुत बड़ी-बड़ी घोषणाएं देखने को मिलती हैं।  युवा कवियों के यहाँ तो और भी ज्यादा लेकिन इस मामले में अरुणाभ बहुत समृद्ध कवि हैं। उनकी कविताओं में  कहीं से भी अतिरिक्त के आग्रह की बोझिलता या बहुत बड़ी-बड़ी क्रांतिकारी घोषणाएं नहीं मिलतीं। अरुणाभ बहुत सधी हुई भाषा में सटीक तरीके से अपनी बात कहने वाले कवि हैं।

जगन्नाथ दुबे

 
सम्पर्क

जगन्नाथ दुबे
शोध छात्र हिन्दी विभाग 
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय 
वाराणसी-221005

मोबाईल- 9670107530

टिप्पणियाँ

  1. देवनाथ द्विवेदी8 जुलाई 2017 को 8:42 am

    जगन्नाथ दुबे की टिप्पणी पढ़कर आद्यनायिका को पढ़ना जरूरी हो गया है । कहाँ और कैसे ये संभव हो पाएगा ?

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रमाशंकर सिंह का आलेख 'उत्तर प्रदेश के घुमन्तू समुदायों की भाषा और उसकी विश्व-दृष्टि'