संध्या सिंह की कविताएँ



 
संध्या सिंह
स्त्री और पुरुष हमारी इस मानवीय सभ्यता के दो अनिवार्य ध्रुव हैं. यह विडम्बना ही है कि अनिवार्यता के बावजूद पुरुष सोच में स्त्रियों के प्रति एक भेदभावकारी दुराग्रह आज तक जड़ जमाए हुए है. स्त्रियों को अपने ऊपर अवलंबित समझ कर यह पुरुष वर्ग साधिकार यह तय करने लगता है कि स्त्री क्या करे, क्या न करे. क्या सोचे क्या न सोचे. क्या पहने क्या न पहने. किस समय घर से निकले, किस समय घर के अंदर रहे. हाँ, अपने संदर्भ में पुरुष इस तरह के कोई भी प्रतिबन्ध बर्दाश्त नहीं कर पाता. सौभाग्यवश आज हिन्दी कविता में स्त्री स्वर मुखर रूप में दिखाई दे रहे हैं. इन कविताओं में स्त्री मन की कथा-व्यथा ही नहीं, उनका अपना आत्माभिमान, समानता एवं स्वतन्त्रता जिस तरह उभर कर सामने आती है वह हमें सोचने के लिए विवश करती हैं कि गंगा में बहुत सा पानी बह चुका है. कवयित्री संध्या सिंह ने अपनी कविताओं में स्त्री मनोभावों को बेहतरीन तरीके से शब्दबद्ध किया है. तो आइए आज ‘पहली बार’ पर पढ़ते हैं संध्या सिंह की कुछ नयी कविताएँ.              


संध्या सिंह की कविताएँ              

दीवार

स्त्री ...
बैठक और शयन कक्ष के बीच की
एक दीवार,
जिसके एक ओर
सीलन पर पोत दिया गया है
एक शोख रंग,
माथे पर ठोक दी गयी
एक मोटी कील पर 
टांग दिया गया है 
एक रूमानी 
वज़नदार तैल चित्र,
भीतर झरते
पलस्तर को भूल कर
वाल हैंगिंग से लदी
अतिथियों के समक्ष 
मुस्कुराती है 
दीवार, 
दूसरी ओर .... 
नमी से भुरभुरी हुई परत
साँस लेने पर झरती है
कतरा कतरा,
मगर फिर भी
अपने सीने पर गड़ी मजबूत खूंटी पर
संभालती है
मुखिया का वज़नदार कोट,
गिरने नहीं देती
उसका बटुआ और ऐनक,
इत्मिनान से लहराने देती है
पंखे की हवा के साथ
उसका मफलर भी,
उसकी नींद को संभाल कर
बेआवाज़ दरकती है दीवार,
बैठक से शयन कक्ष तक की दूरी
बार-बार तय करने वाले
चमकदार जूते
अपनी ठक-ठक के बीच
जान भी नहीं पाते
कि इन दो परतों के बीच
ईंट-ईंट धड़कती है 
दीवार ...!


भूगोल

बड़ा दुर्गम और लंबा है
स्त्री के मुस्कुराते होंठ
और पनीली आँखों के बीच का रास्ता  
एक तरफ  
पानी से लबालब भरी हुई
गहरी खाई हैं 
जिनमे झांकने पर
तुम नाप नहीं पाओगे
उसके जज़्बात की गहराई 
दूसरी तरफ  
धुंध की पन्नी से लिपटे पहाड़ है
जिन्हें ताकने पर    
तुम नहीं आँक पाओगे 
उसके सपनों की ऊंचाई 
कहीं कहीं खुले में
कुछ शिलालेख भी गड़े हैं 
रहस्य खोलते हुए
उसकी ‘हाँ’ और ‘ना’ के मनोविज्ञान का
मगर तुमने तो वो लिपि आती ही नहीं 
हाँ, रास्ते में
उसकी व्यस्तताओं का
एक विशाल किला भी है
जिसके हर गुम्बद पर लहराती है 
उसकी मूर्खताओं की पताका
क्यों कि
किले के तहखाने में 
तुम्हारे प्रेम के संदूक के भीतर
उसने छुपा कर रख दिए हैं
अपने विदुषी होने के सारे प्रमाण पत्र
मगर तुम मत उतरना नीचे
सीढ़ियों पर काई जम चुकी है
और ताले पर जंग
तुम सिर्फ गुम्बद पर लगी झंडियाँ देखते हुए गुज़र जाना
बल्कि बेहतर होगा
तुम छोड दो ये पैदल का रास्ता       
और निश्चिन्त हो कर करते रहो हवाई सफ़र
स्त्री के ऊपर से
देखते रहो दूरबीन से ही  
उसकी देह का मानचित्र
और ढूंढते रहो 
कुछ गलत स्पष्टीकरण  
उसकी सही जिज्ञासाओं के
कुछ खोखले तर्क
उसके ठोस सवालों के
और कुछ अवैध हनन
उसके वैध अधिकारों के
क्यों कि
जायज़ और नाजायज़ 
पूरी तरह निर्भर करता है
सिर्फ पुरुष और स्त्री होने पर


स्त्री पुराण 

मैं अगर तुम्हारी बात 
न सुन पाऊँ 
तो मेरे कानों में 
तेल डला होगा 
तुम अगर मेरी बात 
न सुन पाओ 
तो मेरी ही जुबान को मारा होगा 
लकवा भी
तुम्हे कुछ न दिखाई दे 
तो अन्धेरा 
मुझे कुछ नजाए न आये
तो नेत्र दोष
तुम अगर लड़खडाओ 
तो आँगन टेढ़ा 
मैं अगर डगमगाऊँ
तो मदहोश
तुम मेरी कमियाँ गिनाओ
तो शुभचिन्तक
मैं तुम्हारे दोष निकालूँ
तो निंदक
मैं अगर पाषाण 
तो अहिल्या
तुम अगर पत्थर
तो भगवान
चलो जाने दो
ये अंतहीन स्त्री पुराण

हरी दूब 

स्त्री 
अब नहीं बहने देती सपनों को
जूठे बर्तन पर गिरती 
नल की धार में,
और न ही उड़ने देती है अपने ख़्वाब 
गैस पर खौलते पानी की 
भाप के साथ,
पंरात में आटा गूंथ कर रखते समय 
वो रोज़ लिखती है आसमान 
भीतर तक घुसा कर उंगलियों को,
वो रोज़ बनाती है तितली 
सफ़ेद रायते पर
मसाला छिड़कते वक्त   ,
अपने सर के पल्लू से 
वो अक्सर बनाया करती हैं पंख 
अपने कन्धों पर
एकांत में,
कूकर की सीटी 
उसे खेल के मैदान में बजायी गयी 
रेफरी की व्हिसल लगती है,
और वो 
घूँट-घूँट मिलते धीमे ज़हर के बावजूद 
रोज़ सींचती है 
अपनी जिजीविषा का पौधा 
अपनी जिद की अन्जुरी से,
अहंकार के घोड़े की टाप से 
धूल उड़ाते मर्दाने काफिले को 
भनक तक नहीं 
कि किनारों पर पर फ़ैल चुकी है स्त्री
हरी भरी दूब की तरह  ......!


ये प्रदूषण का कौरव 
विकास की चौसर पर 
जीत गया है फैंके हुए पासे,
नतीजन
कंक्रीट का दुःशासन 
खींचने लगा है 
उन्मुक्त हो कर 
धरती का हरा परिधान,
धरती घूम रही है द्रोपदी की तरह
गुहार लगाती हुई 
हर एक चक्कर पर 
खुल रही है 
उसके हरे मखमली लिबास की 
एक एक चुन्नट 
और हम
बैठ गए हैं 
हारे हुए पांडव की तरह 
आंख मीच कर 
धरती के 
निर्वस्त्र होने से 
ठीक पहले 
वृहन्नला बन कर


परिचय

नाम- संध्या सिंह

जन्म – २० जुलाई १९५८

जन्म स्थान – ग्राम - लालवाला, तहसील देवबंद, जिला सहारनपुर.
 
 शिक्षा  - स्नातक विज्ञान मेरठ विश्वविद्यालय 

सम्प्रति  - समय समय पर अनेक पत्र पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित, हिन्दी के प्रचार प्रसार से जुडी साहित्यिक गतिविधियों में एवं काव्य पाठ में निरंतर सहभागिता, हिन्दी संस्थान, दूरदर्शन पर, निजी चैनल में एवं व्यवसायिक समृद्ध मंचों पर भी काव्य पाठ तथा कई पत्रिकाओं के परामर्श मंडल में सम्पादन सहयोग, इसके अतिरिक्त स्वतन्त्र लेखन

प्रकाशित पुस्तकें - दो साझा संकलन कविता समवेत परिदृश्य’ एवं ‘अनुभूतियों के इंद्रधनुष’ काव्य संग्रह का सह संपादन, दो प्रकाशित काव्य संग्रह आखरों के शगुन पंछी’ एवं गीत संग्रह ‘मौन की झनकार’. इसके अतिरिक्त एक काव्य संग्रह ‘उनींदे द्वार पर दस्तक’ और ‘सीलन पर धूप’ प्रकाशनाधीन.

पुरस्कार – अपने प्रथम नवगीत संग्रह पर ‘अंकुर’ पुरस्कार २०१६ से पुरस्कृत एवं अनेक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर निरंतर सम्मानित

संपर्क -

ई मेल - sandhya.20july@gmail.com

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की है.) 

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें